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लद्दाख में LG प्रशासन पर सोनम वांगचुक का बड़ा आरोप: वकीलों के ‘स्टिंग ऑपरेशन’ के अंश किए सार्वजनिक, राष्ट्रपति मुर्मू से हस्तक्षेप की मांग

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लेह/नई दिल्ली | लद्दाख के प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता, शिक्षाविद् और सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहने वाले सोनम वांगचुक ने केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के उपराज्यपाल (LG) विनय कुमार सक्सेना और उनके प्रशासन को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। वांगचुक ने दावा किया है कि उनके वकीलों द्वारा किए गए एक स्टिंग ऑपरेशन में उपराज्यपाल प्रशासन से जुड़े लोगों की कथित तौर पर बदनाम करने वाली सोशल मीडिया मुहिम में संलिप्तता के संकेत मिले हैं।

इस मामले को लेकर वांगचुक ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश जारी किया और अपने वकीलों द्वारा रिकॉर्ड की गई बातचीत के कुछ अंश सार्वजनिक किए। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित कई प्रमुख नेताओं को टैग करते हुए मामले में हस्तक्षेप की मांग की है।

वांगचुक का आरोप है कि लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों के युवाओं, पर्यावरण और स्थानीय लोगों के अधिकारों के लिए आवाज उठाने के कारण उन्हें लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके शैक्षणिक संस्थानों को प्रशासनिक स्तर पर परेशान किया जा रहा है।

क्या है पूरा स्टिंग ऑपरेशन विवाद?

सोनम वांगचुक के अनुसार, 14 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया पर ‘Ladakh Lens’ और ‘Ladakh Vision’ नाम से दो पेज सामने आए थे। उनका दावा है कि इन पेजों पर उनके खिलाफ सामग्री प्रकाशित की जा रही थी और साथ ही उपराज्यपाल प्रशासन की गतिविधियों का प्रचार किया जा रहा था।

वांगचुक का कहना है कि दोनों पेजों के नाम, डिजाइन, सामग्री और सामने आने के समय में समानता देखकर उनके वकीलों को संदेह हुआ। इसके बाद उनके वकीलों ने कथित तौर पर इन पेजों से जुड़ी एक क्रिएटिव एजेंसी के प्रतिनिधियों से संपर्क किया।

वांगचुक द्वारा जारी रिकॉर्डिंग के अंशों में एक व्यक्ति को कथित तौर पर एजेंसी और LG टीम के बीच संबंधों का उल्लेख करते हुए सुना जा सकता है। बातचीत में लद्दाख में संपर्क स्थापित कराने और पुणे की एक कंपनी के माध्यम से कामकाज किए जाने का भी जिक्र बताया गया है।

वांगचुक ने इन बातचीतों को अपने आरोपों के समर्थन में पेश किया है। उनका दावा है कि इस पूरे घटनाक्रम से पता चलता है कि उनके और लद्दाख के अन्य आलोचकों के खिलाफ एक संगठित ऑनलाइन बदनामी अभियान चलाया जा रहा था।

हालांकि, सार्वजनिक रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता, बातचीत में शामिल व्यक्ति की पहचान और LG प्रशासन से कथित संबंधों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

उपराज्यपाल और वांगचुक के बीच पर्यावरण को लेकर भी विवाद

यह विवाद केवल सोशल मीडिया अभियान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे लद्दाख के विकास, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय नीतियों को लेकर लंबे समय से जारी मतभेद भी हैं।

वांगचुक ने 13 अक्टूबर को मुंबई में आयोजित इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना द्वारा उनके पर्यावरण संरक्षण के काम पर सवाल उठाए जाने का उल्लेख किया।

उपराज्यपाल ने उनके पर्यावरण कार्यों और योगदान पर सवाल उठाए थे। इसके जवाब में वांगचुक ने सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों पर पत्थरों से बनाए जा रहे चेक डैम तथा अन्य निर्माण गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों पर चिंता जताई।

LG प्रशासन की ओर से इन संरचनाओं को पर्यावरण के अनुकूल पहल बताया गया है, जबकि वांगचुक का तर्क है कि स्थानीय पारिस्थितिकी और नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर इनके दीर्घकालिक प्रभावों का गंभीरता से अध्ययन होना चाहिए।

उनका कहना है कि लद्दाख जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में विकास के नाम पर किए जाने वाले किसी भी प्रयोग का मूल्यांकन स्थानीय पर्यावरण और समुदायों के हितों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

‘लद्दाख में लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं’

राष्ट्रपति को संबोधित अपने वीडियो संदेश में वांगचुक ने लद्दाख की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाए।

उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले छह वर्षों में लद्दाख के लोगों की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकारों में कमी आई है। उनके अनुसार, सोशल मीडिया पर छोटी-छोटी टिप्पणियों और लाइक्स को लेकर भी लोगों को पुलिस कार्रवाई, FIR और गिरफ्तारी का सामना करना पड़ सकता है।

वांगचुक ने कहा कि लद्दाख के नागरिकों को भी देश के अन्य हिस्सों के लोगों की तरह लोकतांत्रिक अधिकार, स्वतंत्रता और न्याय मिलना चाहिए।

उन्होंने लद्दाख की राजनीतिक आकांक्षाओं, स्थानीय लोगों की भागीदारी और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों के अधिकारों को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ जोड़कर देखने की जरूरत पर बल दिया।

हालांकि, उनके द्वारा लगाए गए व्यापक आरोपों के समर्थन में अलग-अलग घटनाओं और मामलों की स्वतंत्र जांच आवश्यक होगी।

HIAL और Desert Flower School को लेकर भी विवाद

सोनम वांगचुक से जुड़े शैक्षणिक संस्थानों पर प्रशासनिक कार्रवाई का मुद्दा भी इस विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

उनकी पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख (HIAL) की CEO और संस्थापक से जुड़ी प्रमुख पदाधिकारी हैं। HIAL लद्दाख में वैकल्पिक शिक्षा, स्थानीय ज्ञान, पर्यावरण और सतत विकास पर काम करने वाला संस्थान है।

इस संस्थान को फ्यांग थांग क्षेत्र में 1,076 कनाल भूमि 40 वर्षों की लीज पर आवंटित की गई थी। लेकिन 21 अगस्त 2025 को प्रशासन ने भूमि आवंटन रद्द कर दिया। इस फैसले को HIAL ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

प्रशासन का पक्ष है कि संस्थान निर्धारित समय में लीज डीड निष्पादित नहीं कर सका, प्रीमियम ग्राउंड रेंट जमा करने जैसी शर्तें पूरी नहीं हुईं और भूमि आवंटन के निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति भी नहीं हुई।

दूसरी ओर, गीतांजलि आंगमो का कहना है कि लीज प्रक्रिया में देरी प्रशासन की अपनी नीतियों और लीज नीति को अंतिम रूप देने में हुई देरी के कारण हुई थी। उनके अनुसार, संस्थान ने समय-समय पर आवश्यक आवेदन और पत्राचार किया था।

Desert Flower School को लेकर नया विवाद

इसी भूमि विवाद के बीच 4 नवंबर 2026 को लद्दाख प्रशासन ने HIAL से जुड़े Desert Flower School को लेकर नोटिस जारी किया।

प्रशासन ने स्कूल को हाईकोर्ट में मामला लंबित रहने के दौरान यथास्थिति बनाए रखने और अदालत के अंतिम निर्णय तक गतिविधियां शुरू न करने की सलाह दी। प्रशासन का कहना है कि बिना आवश्यक अनुमति और मंजूरी के कक्षाएं शुरू करना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

वहीं, वांगचुक और उनके सहयोगियों का आरोप है कि इस तरह की कार्रवाइयों से शैक्षणिक संस्थानों के कामकाज और बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है।

इस प्रकार भूमि लीज का कानूनी विवाद और स्कूल की गतिविधियों को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई अब इस पूरे मामले का एक अहम हिस्सा बन गई है।

IB प्रमुख से भी मांगी थी मदद

सोनम वांगचुक ने अपने बयान में एक महत्वपूर्ण बात का खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में वह स्टिंग ऑपरेशन की रिकॉर्डिंग सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे।

उनके मुताबिक, उन्हें चिंता थी कि इस तरह के मामले को सार्वजनिक करने से देश की प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय मनोबल पर असर पड़ सकता है।

इसी वजह से उन्होंने सबसे पहले यह सामग्री इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के प्रमुख के साथ साझा की और उनसे हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया।

वांगचुक का दावा है कि शुरुआत में कुछ संवाद हुए, लेकिन उसके बाद उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। उनका कहना है कि जब संबंधित स्तर पर कार्रवाई या जवाब नहीं मिला, तो उन्होंने मजबूरी में यह सामग्री देश के सामने रखने का निर्णय लिया।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राज निवास और लोक निवास से संबंधित उनके पास और भी सामग्री मौजूद है, लेकिन फिलहाल उन्होंने केवल कुछ चुनिंदा अंश ही सार्वजनिक किए हैं।

लद्दाख की भूमि, उद्योग, बिजली और पर्यटन नीति पर भी सवाल

वांगचुक ने केवल व्यक्तिगत बदनामी के आरोप तक अपनी बात सीमित नहीं रखी। उन्होंने लद्दाख की भूमि, औद्योगिक विकास, बिजली और पर्यटन से जुड़ी नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं।

उनका आरोप है कि मौजूदा नीतियों से स्थानीय समुदायों की अपेक्षा बड़े कॉरपोरेट हितों को अधिक फायदा पहुंच सकता है।

लद्दाख एक पारिस्थितिक रूप से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। यहां सीमित जल संसाधन, हिमनद, पारंपरिक चरागाह, स्थानीय कृषि और पर्यटन के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

वांगचुक का तर्क है कि स्थानीय लोगों की सहमति और भागीदारी के बिना बड़े विकास कार्यक्रम लागू करने से पर्यावरण और पारंपरिक जीवनशैली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

उन्होंने शराब नीति को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि गांवों में शराब की दुकानों और बार को अनुमति देने की प्रक्रिया में स्थानीय विरोध के बावजूद नीतिगत बदलाव किए जा रहे हैं।

हालांकि, इस विषय पर लद्दाख प्रशासन ने 28 अक्टूबर को आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया था। प्रशासन के अनुसार, नई आबकारी नीति वापस ले ली गई थी और पुरानी नीति बहाल की गई थी। प्रशासन ने यह भी कहा था कि पूरे लद्दाख में केवल एक शराब की दुकान चालू थी। इस मुद्दे पर वांगचुक और प्रशासन के दावों में अंतर है।

लद्दाख के भविष्य और सीमावर्ती क्षेत्रों के अधिकारों का सवाल

सोनम वांगचुक ने अपने संदेश में लद्दाख के साथ अरुणाचल प्रदेश जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों का भी उल्लेख किया।

उनका कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर उनके लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

लद्दाख की भौगोलिक स्थिति और सामरिक महत्व को देखते हुए यहां शासन, विकास, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों की राजनीतिक भागीदारी के बीच संतुलन बेहद जरूरी है।

वांगचुक ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वह इस पूरे मामले पर ध्यान दें और सुनिश्चित करें कि सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों को भी देश के अन्य नागरिकों की तरह समान अधिकार, स्वतंत्रता और न्याय मिले।

प्रशासन की प्रतिक्रिया और उठते सवाल

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पक्ष लद्दाख प्रशासन का भी है। प्रशासन और वांगचुक के बीच पहले भी HIAL की जमीन, संस्थान की गतिविधियों, वित्तीय अनुपालन और आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक मतभेद सामने आए हैं।

अक्टूबर 2025 में प्रशासन ने वांगचुक के खिलाफ कथित उत्पीड़न के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई उपलब्ध सूचनाओं और दस्तावेजों के आधार पर की गई थी। प्रशासन ने HIAL और अन्य संस्थाओं से जुड़े वित्तीय एवं नियामकीय मामलों की जांच का भी उल्लेख किया था।

वहीं, 7 नवंबर 2026 को सामने आए नए स्टिंग ऑपरेशन के आरोपों पर LG कार्यालय की तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं थी। इसलिए इस मामले में प्रशासन का पक्ष सामने आना भी जरूरी है।

अब केंद्र सरकार के सामने पांच बड़े सवाल

  1. क्या राष्ट्रपति भवन इस पूरे मामले का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच के निर्देश देगा?
  2. क्या केंद्रीय गृह मंत्रालय कथित सोशल मीडिया बदनामी अभियान और सरकारी अधिकारियों से संभावित संबंधों की जांच कराएगा?
  3. क्या सार्वजनिक किए गए स्टिंग ऑपरेशन की रिकॉर्डिंग की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच होगी?
  4. क्या लद्दाख के शैक्षणिक संस्थानों को लेकर चल रहे विवाद का समाधान कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ संवाद के जरिए निकाला जाएगा?
  5. क्या केंद्र सरकार लद्दाख के लोगों की राजनीतिक भागीदारी, पर्यावरण संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट नीति पेश करेगी?

लद्दाख में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी

लद्दाख केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारत का अत्यंत महत्वपूर्ण सीमावर्ती और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र है। यहां विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद आवश्यक है।

सोनम वांगचुक द्वारा सार्वजनिक किए गए स्टिंग ऑपरेशन के अंशों ने प्रशासनिक पारदर्शिता और सरकारी तंत्र की जवाबदेही को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इन आरोपों की सत्यता स्वतंत्र जांच के बाद ही स्थापित हो सकती है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय और लद्दाख प्रशासन इस पूरे विवाद पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाती है।

लद्दाख के लोगों को विकास के साथ लोकतांत्रिक अधिकार, पर्यावरण की सुरक्षा, शिक्षा और प्रशासन में पारदर्शिता भी चाहिए। इस पूरे विवाद का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और जवाबदेही से ही निकल सकता है।

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