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OBC Creamy Layer विवाद: अमित शाह के बयान और केंद्र सरकार की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी पर उठे सवाल, OBC समाज ने मांगा जवाब

by Admin
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नई दिल्ली | 7 नवंबर 2026

OBC समाज के क्रीमी लेयर (Creamy Layer) से जुड़े नियमों को लेकर केंद्र सरकार की भूमिका पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। हरियाणा में क्रीमी लेयर की सीमा ₹6 लाख से बढ़ाकर ₹8 लाख करने और वेतन (Salary) व कृषि आय (Agriculture Income) को इससे बाहर रखने की घोषणा करने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अब इस मुद्दे पर सवालों के घेरे में हैं।

दरअसल, 16 जुलाई 2024 को हरियाणा के महेंद्रगढ़ में आयोजित ‘पिछड़ा वर्ग सम्मान सम्मेलन’ में अमित शाह ने तत्कालीन हरियाणा सरकार के फैसले की जानकारी देते हुए कहा था कि क्रीमी लेयर की सीमा ₹6 लाख से बढ़ाकर ₹8 लाख की गई है और इसमें वेतन तथा कृषि आय को शामिल नहीं किया जाएगा। इस फैसले की पुष्टि केंद्र सरकार की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में भी की गई थी।

लेकिन दूसरी ओर, केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) की न्यायालयीन पैरवी और OBC अभ्यर्थियों से जुड़े मामलों में केंद्र के रुख को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से फिर गरमाया मामला

11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने Union of India बनाम Rohith Nathan सहित संबंधित मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया था कि PSU और निजी क्षेत्र में कार्यरत अभिभावकों की सैलरी को अकेले आधार बनाकर उनके बच्चों को OBC क्रीमी लेयर में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के लिए निर्धारित मानदंडों और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों को भी महत्वपूर्ण माना।

इसके बाद 6 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की स्पष्टीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने 11 मार्च के फैसले की मूल व्याख्या बरकरार रखी। कोर्ट ने फैसले को केवल भविष्य में लागू करने की केंद्र की मांग भी स्वीकार नहीं की। हालांकि, न्यायालय ने पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों और चयन प्रक्रियाओं को दोबारा खोलने के संबंध में अलग स्पष्टीकरण दिया।

इस घटनाक्रम ने OBC आरक्षण और क्रीमी लेयर नीति को लेकर केंद्र सरकार की जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है।

अमित शाह और DoPT के रुख में अंतर क्यों?

इस पूरे मामले में अब OBC समाज की ओर से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार से सार्वजनिक स्पष्टीकरण की मांग की जा रही है।

मुख्य सवाल यह है कि जब हरियाणा में वेतन और कृषि आय को क्रीमी लेयर की गणना से बाहर रखने की बात सार्वजनिक रूप से कही गई, तो केंद्र सरकार की न्यायालयीन पैरवी में इस विषय पर अलग रुख क्यों सामने आया?

इसके साथ ही राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

NCBC और संसदीय समिति से भी जवाबदेही की मांग

इस विवाद को लेकर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की अध्यक्ष साध्वी निरंजन ज्योति से स्वतः संज्ञान लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगने की अपील की जा रही है।

वहीं, संसद की OBC कल्याण संबंधी समिति के अध्यक्ष गणेश सिंह से भी मांग की जा रही है कि वे इस मामले में DoPT को तलब करें और OBC अभ्यर्थियों के हितों से जुड़े सवालों पर सरकार से जवाब मांगें।

OBC समाज ने सरकार के सामने रखे चार बड़े सवाल

  1. अमित शाह के सार्वजनिक बयान और DoPT की न्यायालयीन पैरवी में अंतर क्यों है? क्या केंद्र सरकार की नीति और राजनीतिक नेतृत्व के बयान एक-दूसरे से अलग हैं?
  2. NCBC स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेता? क्या राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगकर स्थिति स्पष्ट करेगा?
  3. संसदीय OBC कल्याण समिति की भूमिका क्या होगी? क्या गणेश सिंह की अध्यक्षता वाली समिति DoPT के अधिकारियों को तलब कर इस पूरे मामले पर स्पष्टीकरण मांगेगी?
  4. देशभर में एक समान क्रीमी लेयर नीति कब लागू होगी? क्या केंद्र सरकार पूरे देश के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नीति बनाएगी?

भाषण नहीं, संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप नीति चाहिए

OBC समाज का कहना है कि आरक्षण केवल राजनीतिक घोषणाओं और सम्मेलनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका लाभ वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है।

क्रीमी लेयर के नियमों में अस्पष्टता के कारण अभ्यर्थियों को नौकरी, चयन और आरक्षण के लाभ से जुड़े मामलों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

अब सवाल केवल हरियाणा का नहीं, बल्कि पूरे देश के OBC अभ्यर्थियों के अधिकारों और केंद्र सरकार की आरक्षण नीति की स्पष्टता का है।

OBC समाज की मांग है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, DoPT और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय इस पूरे मामले पर अपना आधिकारिक पक्ष स्पष्ट करें।

OBC समाज को केवल भाषण और घोषणाएं नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप स्पष्ट सरकारी नीति और उसका ईमानदार क्रियान्वयन चाहिए।

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