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यूपी में 2.4 करोड़ वोटरों का अंतर! चुनाव आयोग के भीतर भी मचा विवाद, 2027 चुनाव से पहले मतदाता सूची की होगी जांच

by Admin
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया है। पंचायत और विधानसभा की मतदाता सूचियों के आंकड़ों में लगभग 2.4 करोड़ मतदाताओं का अंतर मिलने के बाद चुनाव आयोग ने राज्यभर में मतदाता सूचियों का मिलान कराने का निर्देश दिया है। इस घटनाक्रम ने मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद उत्तर प्रदेश की विधानसभा मतदाता सूची में दो करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने को लेकर पहले से ही राजनीतिक और सामाजिक विवाद चल रहा है।

2.4 करोड़ मतदाताओं का अंतर कैसे सामने आया?

इंडियन एक्सप्रेस की 5 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश की ग्रामीण पंचायत मतदाता सूची में लगभग 12.58 करोड़ मतदाता दर्ज हैं, जबकि विधानसभा की ग्रामीण मतदाता सूची में करीब 10.20 करोड़ मतदाता हैं।

इस तरह दोनों सूचियों के बीच लगभग 2.38 करोड़ का अंतर सामने आया है।

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा ने अधिकारियों को पंचायत और विधानसभा मतदाता सूचियों का मिलान करने के निर्देश दिए हैं, ताकि पात्र नागरिकों के नाम विधानसभा की मतदाता सूची में शामिल किए जा सकें।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि दोनों सूचियां अलग-अलग चुनावी संस्थाओं द्वारा तैयार की जाती हैं।

क्या 2.77 करोड़ वयस्क मतदाता वोटर लिस्ट से गायब हैं?

इस मुद्दे पर प्रकाशित एक अन्य विश्लेषण में उत्तर प्रदेश की अनुमानित वयस्क आबादी और विधानसभा मतदाता सूची के बीच लगभग 2.8 करोड़ का अंतर बताया गया है।

हालांकि, इस आंकड़े को सीधे गायब या पात्र मतदाताओं की संख्या मानना सही नहीं होगा। जनसंख्या का अनुमान, मतदाता सूची की तारीख और वास्तविक पात्र मतदाताओं की संख्या अलग-अलग बातें हैं।

इसीलिए चुनाव आयोग द्वारा प्रस्तावित मिलान और सत्यापन प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है।

चुनाव आयोग के भीतर IT विभाग को लेकर विवाद

मतदाता सूची के विवाद के साथ-साथ चुनाव आयोग के अंदरूनी कामकाज को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के IT विभाग और अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे तथा मतदाता डेटा तक पहुंच को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

दोनों चुनाव आयुक्तों ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे थे।

विवाद का एक प्रमुख मुद्दा यह था कि क्या ECINet और उससे जुड़े IT सिस्टम के केंद्रीकृत नियंत्रण के कारण Electoral Registration Officers (EROs) के वैधानिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं?

ERO ही कानून के तहत अपने विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने, दावे और आपत्तियों पर निर्णय लेने तथा नाम जोड़ने या हटाने के लिए जिम्मेदार अधिकारी होते हैं।

चुनाव आयोग ने भी सुप्रीम कोर्ट में दिया जवाब

इस विवाद के बीच चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में कहा कि SIR से संबंधित फैसले आयोग के तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए थे।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि ECINet के माध्यम से किसी मतदाता का नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने का अंतिम निर्णय संबंधित ERO के आदेश के बिना नहीं किया जाता।

आयोग के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाई गई आपत्तियों के बाद संबंधित अधिकारी का कार्य-वितरण आदेश लागू नहीं किया गया था और IT विभाग की निगरानी की पुरानी व्यवस्था जारी रही।

इसलिए आयोग के अंदर मतभेद की खबरें वास्तविक हैं, लेकिन इसे आयोग में औपचारिक विभाजन या चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी साबित होने के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

अब राशन दुकानों और सरकारी विभागों की भी होगी भूमिका

उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची में पात्र लोगों के नाम जोड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाने की तैयारी है।

इसमें सरकारी राशन दुकानों, शैक्षणिक संस्थानों, ASHA कार्यकर्ताओं, ANM, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और महिला स्वयं सहायता समूहों की मदद ली जाएगी।

विशेष रूप से उन महिलाओं और युवाओं की पहचान करने पर जोर दिया जा रहा है, जिनके नाम विधानसभा की मतदाता सूची में दर्ज नहीं हैं।

2027 के चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची का यह मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

लोकतंत्र में प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अधिकार मिलना जरूरी है। इसलिए यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम प्रशासनिक या तकनीकी कारणों से सूची से बाहर न रहे।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पंचायत और विधानसभा की मतदाता सूचियों के मिलान के बाद कितने वास्तविक पात्र मतदाताओं के नाम छूटे हुए पाए जाते हैं और उन्हें कितनी जल्दी सूची में शामिल किया जाता है।

मतदाता सूची में पारदर्शिता ही निष्पक्ष चुनाव की पहली शर्त है। चुनाव केवल मतदान के दिन नहीं, बल्कि मतदाता सूची तैयार होने की प्रक्रिया से ही शुरू हो जाता है।

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