वाराणसी | जिस शहनाई की आवाज ने पूरी दुनिया में बनारस का नाम रोशन किया, जिस कलाकार को देश ने भारत रत्न से सम्मानित किया, आज उसी उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान की पुश्तैनी हवेली को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। वाराणसी के सराय हड़हा स्थित उनके पुराने मकान को तोड़कर पुनर्निर्माण किए जाने की खबर ने ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालांकि परिवार के कुछ सदस्य इस पुनर्निर्माण के समर्थन में हैं, वहीं परिवार के ही एक सदस्य ने इसका विरोध किया था। यह पूरा मामला केवल एक पुराने मकान को तोड़ने या नया बनाने का नहीं, बल्कि एक महान कलाकार की ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने का भी है।
जिस घर में गूंजती थी शहनाई, उससे जुड़ा है उस्ताद का इतिहास
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था। बचपन में वे बनारस आए और अपने मामा अली बख्श से शहनाई की शिक्षा ली। बनारस की गलियों, गंगा के घाटों और मंदिरों से उनका गहरा रिश्ता रहा।
सराय हड़हा की भीखाशाह गली स्थित पुश्तैनी मकान उनके जीवन की महत्वपूर्ण यादों से जुड़ा रहा। इसी मकान में वे शहनाई का रियाज किया करते थे। यहां उनका एक कमरा था, जो आज भी उनकी संगीत साधना की यादों से जुड़ा हुआ है।
परिवार के लिए यह मकान केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि उस्ताद के जीवन, संगीत और संघर्ष की निशानी है।
परिवार में ही क्यों हुआ विवाद?
1 नवंबर 2026 को प्रकाशित हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, मकान के पुनर्निर्माण को लेकर उस्ताद के दो पौत्रों के बीच विवाद हुआ था।
रिपोर्ट में यावर अब्बास उर्फ बॉबी का नाम सामने आया, जिन्होंने पुराने भवन को तोड़ने पर आपत्ति जताई थी।
यावर अब्बास का कहना था कि मकान को तोड़ने की कार्रवाई से पहले जरूरी दस्तावेज और अनुमति स्पष्ट होनी चाहिए। 2 नवंबर की अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, विरोध करने वाले परिवार के सदस्यों ने आरोप लगाया था कि बिल्डर के पास मकान तोड़ने के आवश्यक दस्तावेज और अनुमति नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि इस संबंध में कोई न्यायालय का आदेश सामने नहीं आया है।
परिवार के विरोध के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों पक्षों को शांत कराया। पुलिस ने संपत्ति से जुड़े दस्तावेज देखे और विरोध करने वाले पक्ष को अपना मामला अदालत में रखने की सलाह दी।
दूसरी तरफ परिवार के सदस्य क्या कह रहे हैं?
3 नवंबर की न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उस्ताद के पौत्र मोहम्मद सिब्तैन ने कहा कि मकान काफी जर्जर हो चुका है और उसका पुनर्निर्माण जरूरी है।
सिब्तैन के अनुसार, उन्होंने मकान के रजिस्ट्री संबंधी दस्तावेज पुलिस के सामने प्रस्तुत किए। उनके मुताबिक, इसके बाद विवाद सुलझ गया और निर्माण कार्य शुरू हुआ।
परिवार के कुछ अन्य सदस्यों ने भी पुनर्निर्माण का समर्थन किया है। उस्ताद के पौत्र और शहनाई वादक अफाक हैदर के हवाले से क्लेरियन इंडिया ने बताया कि परिवार के एक बेटे के परिवार को छोड़कर बाकी सदस्य पुनर्विकास के समर्थन में हैं।
इस तरह परिवार के भीतर भी मकान को लेकर एकमत राय नहीं रही है।
मकान का मालिकाना हक और सरकारी संग्रहालय की योजना
हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मकान उस्ताद के बड़े बेटे महताब हुसैन ने वर्ष 1941 में रजिस्ट्री के जरिए खरीदा था। महताब हुसैन के निधन के बाद उनके पुत्र मोहम्मद सिब्तैन के नाम पर नगर निगम का नामांतरण दर्ज होने की जानकारी पुलिस जांच में सामने आई।
दूसरी ओर वाराणसी नगर निगम ने भी उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान के मकान को संग्रहालय के रूप में विकसित करने की योजना बनाई थी।
नगर आयुक्त के मुताबिक, करीब एक करोड़ रुपये की परियोजना तैयार की गई थी। लेकिन परिवार के बीच विवाद और सभी संबंधित पक्षों की सहमति नहीं मिलने के कारण नगर निगम अपनी योजना आगे नहीं बढ़ा सका।
अब परिवार की ओर से पुनर्निर्माण के बाद संग्रहालय बनाने की बात कही जा रही है। योजना के मुताबिक, उस्ताद के रियाज से जुड़े कमरे और उनकी यादों को संरक्षित किया जाएगा।
क्या ऐतिहासिक मकान को बचाने का विकल्प नहीं था?
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मकान को पूरी तरह हटाने के बजाय उसकी मूल बनावट को सुरक्षित रखते हुए मरम्मत नहीं की जा सकती थी?
क्या सरकार और प्रशासन को परिवार के सभी सदस्यों के साथ बैठकर कोई ऐसा रास्ता नहीं निकालना चाहिए था, जिससे मकान की ऐतिहासिक पहचान भी बचती और परिवार की जरूरतें भी पूरी होतीं?
अगर कोई पुरानी इमारत जर्जर है तो उसे सुरक्षित रखने के लिए विरासत संरक्षण विशेषज्ञों, वास्तुकारों और इतिहासकारों की मदद ली जा सकती है।
बिस्मिल्लाह ख़ान का यह मकान किसी सामान्य व्यक्ति का पुराना आवास नहीं था। इसका संबंध भारत के संगीत इतिहास और बनारस की सांस्कृतिक पहचान से है।
मोदी के बनारस में विरासत बचाने की जिम्मेदारी किसकी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सांसद हैं। ऐसे में बनारस की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह मामला भाजपा या किसी अन्य राजनीतिक दल के पक्ष-विपक्ष से आगे का है।
सरकारों की जिम्मेदारी केवल नई सड़कें, इमारतें और परियोजनाएं बनाना नहीं है। पुराने इतिहास, महान कलाकारों की स्मृतियों और सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
बिस्मिल्लाह ख़ान की शहनाई ने धर्म और जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर भारत की पहचान बनाई। उनकी विरासत किसी एक परिवार या समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक पूंजी है।
आखिरी सवाल: नई इमारत बनेगी, लेकिन पुराना इतिहास कौन बचाएगा?
परिवार की ओर से संग्रहालय बनाने की योजना अच्छी पहल हो सकती है। लेकिन संग्रहालय बनाने और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने में अंतर है।
जरूरत इस बात की है कि पुरानी इमारत से जुड़ी यादें, रियाज का कमरा, वास्तुशिल्प और उस्ताद से जुड़ी मूल वस्तुएं सुरक्षित रहें।
सरकार, प्रशासन और परिवार को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुनर्निर्माण के नाम पर इतिहास की पहचान समाप्त न हो।
क्योंकि शहनाई की धुन दोबारा बजाई जा सकती है, नई इमारत दोबारा बनाई जा सकती है, लेकिन इतिहास से जुड़ी मूल विरासत एक बार खो जाए तो उसे वापस लाना आसान नहीं होता।
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का सम्मान केवल उनके नाम पर संग्रहालय बनाने से नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक विरासत को पूरी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ सहेजने से होगा।