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अमेरिका में मोहन भागवत ने कहा- ‘भारत बुद्ध का देश’, बयान पर उठे सवाल; आलोचकों ने पूछा- हिंदुत्व की राजनीति और बुद्ध की समतामूलक विरासत में तालमेल कैसे?

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका दौरे के दौरान भारत की पहचान, हिंदुत्व और विविधता को लेकर दिए गए बयानों ने देश में नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। विदेश में भारत को बुद्ध की भूमि, विविधता और मानवता का देश बताने वाले भागवत के बयान को लेकर आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि RSS की हिंदुत्व-केंद्रित वैचारिक राजनीति और भगवान बुद्ध की समतामूलक तथा सामाजिक भेदभाव के विरोध की विरासत को किस तरह एक साथ देखा जाए।

नई दिल्ली, 3 सितंबर 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका दौरे के दौरान भारत की पहचान, हिंदुत्व और विविधता को लेकर दिए गए बयानों ने देश में नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। विदेश में भारत को बुद्ध की भूमि, विविधता और मानवता का देश बताने वाले भागवत के बयान को लेकर आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि RSS की हिंदुत्व-केंद्रित वैचारिक राजनीति और भगवान बुद्ध की समतामूलक तथा सामाजिक भेदभाव के विरोध की विरासत को किस तरह एक साथ देखा जाए।

भागवत ने अमेरिका में आयोजित कार्यक्रमों में भारत की ‘विविधता में एकता’ और मानवता पर जोर दिया। न्यूयॉर्क में उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में एकता में है और अलग-अलग धर्मों के बावजूद मानवता एक है। उन्होंने यहां तक कहा कि जो व्यक्ति यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, वह हिंदू नहीं है।

‘भारत बुद्ध का देश’ वाले संदेश पर क्यों उठ रहे सवाल?

भागवत के इस दृष्टिकोण को लेकर आलोचकों का सवाल है कि विदेश में भारत की पहचान को बुद्ध, सह-अस्तित्व और विविधता से जोड़ना एक सकारात्मक संदेश है, लेकिन भारत में RSS की वैचारिक राजनीति मुख्य रूप से हिंदू राष्ट्र और हिंदू सांस्कृतिक पहचान की अवधारणा पर जोर देती रही है।

RSS की अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर भागवत के 2025 के एक संबोधन को प्रकाशित करते हुए भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बताया गया था। उसमें उन्होंने कहा था कि भारत के हिंदू राष्ट्र होने की औपचारिक घोषणा आवश्यक नहीं है और इसे संगठन की वैचारिक दृष्टि के रूप में प्रस्तुत किया था।

यहीं से आलोचक सवाल उठाते हैं कि विदेश में भारत की पहचान को बुद्ध, बहुलता और मानवता के प्रतीकों से पेश करना और देश के भीतर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर जोर देना क्या दो अलग-अलग राजनीतिक संदेश नहीं हैं?

क्या भागवत बुद्ध को नहीं मानते?

इस सवाल पर तथ्य अलग तस्वीर पेश करते हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि मोहन भागवत बुद्ध को नहीं मानते। वे पहले भी अपने सार्वजनिक संबोधनों में भगवान बुद्ध का उल्लेख कर चुके हैं। फरवरी 2026 में उन्होंने भारत की सांस्कृतिक परंपरा का जिक्र करते हुए राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, विवेकानंद, दयानंद और गांधी जैसी विभूतियों का नाम लिया था।

इसलिए विवाद असल में ‘भागवत बुद्ध को मानते हैं या नहीं’ से ज्यादा इस बात पर है कि बुद्ध की विरासत को RSS की हिंदुत्व की अवधारणा के साथ किस तरह जोड़ा जाता है।

बुद्ध की विरासत और सामाजिक समानता का सवाल

भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को आम तौर पर करुणा, अहिंसा, समानता और सामाजिक भेदभाव के विरोध से जोड़ा जाता है। इसी वजह से सामाजिक न्याय और आंबेडकरवादी विचारधारा से जुड़े लोग अक्सर बुद्ध को समानता और जाति-विरोधी संघर्ष के महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में देखते हैं।

यही कारण है कि आलोचक भागवत के ‘बुद्ध की भूमि’ वाले संदेश को भारत में जाति व्यवस्था, सामाजिक असमानता और धार्मिक पहचान की राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं। उनका सवाल है कि अगर भारत की वास्तविक पहचान बुद्ध की करुणा, समानता और विविधता है, तो इन मूल्यों को देश के भीतर सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार में भी उतनी ही मजबूती से दिखाई देना चाहिए।

विदेश में बदली भाषा का आरोप

भागवत के अमेरिका दौरे को लेकर आलोचना का एक बड़ा बिंदु यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर RSS की ओर से भारत की एक ऐसी तस्वीर पेश की जा रही है जिसमें विविधता, सह-अस्तित्व और सभी धर्मों के सम्मान पर जोर है।

न्यूयॉर्क में भागवत ने कहा कि भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत है। उन्होंने भारतीय-अमेरिकी समुदाय से अपनी कर्मभूमि के प्रति जिम्मेदारी निभाने और भारत के मूल्यों को आगे बढ़ाने की भी अपील की।

आलोचक इसी को लेकर सवाल उठा रहे हैं कि क्या विदेश में भारत की ‘समावेशी’ छवि और देश के भीतर RSS की हिंदू राष्ट्र संबंधी विचारधारा के बीच पर्याप्त स्पष्टता है?

‘जय श्रीराम’ की राजनीति बनाम बुद्ध का संदेश?

सोशल मीडिया पर इस बहस को कुछ आलोचक ‘जय श्रीराम’ की राजनीति बनाम ‘बुद्ध की भूमि’ के रूप में भी पेश कर रहे हैं। हालांकि, इसे तथ्यात्मक रूप से भागवत या RSS के आधिकारिक बयानों का सीधा विरोधाभास कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि भागवत स्वयं पहले भी राम, कृष्ण और बुद्ध को भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के हिस्से के रूप में प्रस्तुत कर चुके हैं।

वास्तविक राजनीतिक सवाल यह है कि भारत की पहचान को हिंदुत्व, हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, बुद्ध की विरासत और संवैधानिक बहुलता—इन सभी के बीच किस तरह परिभाषित किया जाए।

बहस अब बयान से आगे बढ़ गई है

भागवत के अमेरिकी बयानों ने इस पुरानी बहस को फिर सामने ला दिया है कि भारत की पहचान धार्मिक बहुसंख्यक संस्कृति से तय होगी या उसकी बहुलतावादी और समतामूलक परंपराओं से।

भागवत जहां भारत को विविधता में एकता और मानवता का संदेश देने वाला देश बता रहे हैं, वहीं उनके आलोचक पूछ रहे हैं कि यही संदेश भारत के भीतर जातिगत भेदभाव, धार्मिक तनाव और सामाजिक असमानता के सवालों पर भी उतनी ही स्पष्टता से क्यों नहीं दिखाई देता।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिका में भागवत के बयानों ने RSS की विचारधारा, हिंदुत्व, बुद्ध की विरासत और भारतीय संविधान के बहुलतावादी मूल्यों के बीच संबंध को लेकर एक नई राजनीतिक बहस जरूर छेड़ दी है।

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