नई दिल्ली: केरल के कन्नूर सरकारी डेंटल कॉलेज के दलित छात्र नितिन राज की आत्महत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी प्रोफेसर डॉ. एम. कोडंडा राम को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने अग्रिम जमानत की मांग खारिज करते हुए कहा कि एक शिक्षक का अपने छात्र के साथ इस तरह का व्यवहार “अमानवीय” है और ऐसे मामलों में समाज को स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि शिक्षकों द्वारा छात्रों के साथ अपमानजनक व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “अभी हमारे दिमाग में सिर्फ एक ही शब्द आ रहा है—अमानवीय। एक शिक्षक अपने छात्रों से इस तरह कैसे बात कर सकता है?”
दलित छात्र ने अप्रैल में की थी आत्महत्या
यह मामला केरल के कन्नूर सरकारी डेंटल कॉलेज का है। बीडीएस के छात्र नितिन राज ने 10 अप्रैल 2026 को कॉलेज के पास एक इमारत से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। आरोप है कि आत्महत्या से पहले विभागाध्यक्ष डॉ. एम. कोडंडा राम ने जातिसूचक टिप्पणियां करते हुए छात्र का सार्वजनिक रूप से अपमान और उत्पीड़न किया था।
छात्र के पिता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने डॉ. राम समेत तीन लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मामला दर्ज किया।
निचली अदालत और हाई कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
डॉ. कोडंडा राम और एक अन्य प्रोफेसर डॉ. संगीता नाम्बियार ने अग्रिम जमानत के लिए पहले सत्र अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सत्र अदालत ने डॉ. नाम्बियार को राहत दी, लेकिन 25 अप्रैल को डॉ. राम की याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद उन्होंने केरल हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन 19 जून को हाई कोर्ट ने भी अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी गई?
आरोपी प्रोफेसर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने अदालत में दलील दी कि कथित जातीय अपमान और छात्र की आत्महत्या के बीच लगभग एक महीने का अंतर था। उन्होंने कहा कि आत्महत्या से ठीक पहले छात्र को एक लोन ऐप से जुड़े मामले में भी फटकार लगाई गई थी, इसलिए आत्महत्या का कारण वही घटना हो सकती है।
वकील ने यह भी तर्क दिया कि यदि इस तरह हर अनुशासनात्मक कार्रवाई को SC/ST एक्ट से जोड़ दिया जाएगा, तो शिक्षकों के लिए अनुशासन बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने दलील नहीं मानी
सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी छात्र का सार्वजनिक रूप से अपमान उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकता है।
पीठ ने कहा, “अगर क्लासरूम में किसी छात्र को इस तरह अपमानित किया जाता है, तो उसका क्या प्रभाव होगा? यही घटना उसके जीवन का निर्णायक मोड़ बन सकती है।”
जब बचाव पक्ष ने कहा कि प्रोफेसर अपनी गलती से सबक सीख चुके हैं, तो अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि “यह सिर्फ सबक सीखने का मामला नहीं है। शिक्षक इस तरह के व्यवहार के बाद बिना किसी परिणाम के नहीं बच सकते। समाज में स्पष्ट संदेश जाना जरूरी है।”
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए डॉ. एम. कोडंडा राम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षकों को अपने व्यवहार और उसके छात्रों पर पड़ने वाले प्रभाव का पूरा अहसास होना चाहिए तथा ऐसे मामलों में जवाबदेही तय होना आवश्यक है।