संविधान में जातिवाद को जड़ से समाप्त करने के लिए पूर्ण प्रावधान किए गए हैं। छुआछूत को अपराध घोषित कर सख्त कानून बनाए गए हैं और इसमें दंड का भी स्पष्ट प्रावधान है। फिर भी देश के कई हिस्सों में जातिवाद और छुआछूत की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं। ताजा मामला ओडिशा के केंद्रापाड़ा जिले का है।
दरअसल, ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले में एक छोटे से गांव नुआगांव में आंगनवाड़ी केंद्र पिछले तीन महीने से लगभग बंद पड़ा है। इसकी वजह है एक दलित युवती शर्मिष्ठा सेठी को हेल्पर-कम-कुक के पद पर नियुक्त किया जाना। रिपोर्ट है कि गाँव वाले जाति के आधार पर बच्चों को केंद्र पर नहीं भेज रहे हैं।
केंद्र में रसोइया के पद पर एक दलित महिला की नियुक्ति के विरोध में अभिभावकों ने इसका बहिष्कार कर दिया है. इस सामाजिक भेदभाव के चलते न केवल बच्चों की शिक्षा और पोषण व्यवस्था प्रभावित हुई है, बल्कि सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े हो गए हैं. वहीं, इस घटना से जिला प्रशासन के हाथ-पैर भी फूल गए हैं. अभिभावकों को मनाने की कोशिश की जा रही है.
शर्मिष्ठा सेठी 20 साल की हैं और उन्होंने ग्रेजुएशन किया है। वह शिक्षक बनना चाहती हैं, लेकिन उनका परिवार बेहद गरीब है। उन्होंने बहुत मेहनत के बाद यह नौकरी पाई। उनका कहना है कि 20 नवंबर 2025 को उनकी नियुक्ति हुई और अगले दिन से ही गांव वाले बच्चों को आंगनवाड़ी नहीं भेजने लगे। वे सत्तू, अंडे जैसी बच्चों के लिए मुफ्त पोषण सामग्री भी नहीं ले रहे हैं।
इस घटना पर सोशल मीडिया में काफी चर्चा एवं तनाव है. लोग इस घटना से आहत नजर आ रहे है. राज्यसभा में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस मुद्दे पर सरकार से सवाल किया।
4 महीने पहले हुआ था दलित लड़की का अपॉइंटमेंट
जिले के अधिकारियों ने करीब चार महीने पहले राजनगर ब्लॉक में घड़ियामाला ग्राम पंचायत के नुआगांव सेंटर में ग्रेजुएट सरमिस्ता सेठी को आंगनवाड़ी हेल्पर के तौर पर अपॉइंट किया था। इसके तुरंत बाद गांव की कमेटी ने दलित के अपॉइंटमेंट के विरोध में बच्चों को आंगनवाड़ी सेंटर भेजना ही बंद कर दिया। इस कमेटी में ज्यादातर ऊंची जाति के लोग थे। अधिकारी अभी तक इस रुकावट को खत्म नहीं कर पाए हैं, जिसमें करीब 60 बच्चों की किस्मत अधर में लटकी हुई है।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार शर्मिष्ठा ने बताया, ‘लोग इसलिए बच्चों को नहीं भेज रहे क्योंकि मैं दलित हूं। समाज बहुत आगे बढ़ चुका है, लेकिन अगर हम जातिवाद को नहीं छोड़ेंगे तो आगे नहीं बढ़ सकते।’ वे आगे पढ़ाई करना चाहती हैं और टीचर बनना चाहती हैं, लेकिन अब कोई उनकी बात नहीं सुन रहा। उनकी मासिक तनख्वाह सिर्फ 5000 रुपये है। इस काम में वे खाना बनाती हैं, बच्चों को खेल खेलवाती हैं और स्वास्थ्य जांच में भी हाथ बंटाती हैं।

इस गांव में करीब 45 परिवार रहते हैं, जिनमें सात दलित परिवार भी शामिल हैं। सरमिस्ता सेठी को ऊंची जाति के मां-बाप से खुले तौर पर विरोध का सामना करना पड़ा। उन्होंने ऊंची जाति के आंगनवाड़ी वर्कर लिजारानी पांडव से कहा कि उनके बच्चे दलित महिला के हाथ का बना खाना नहीं खाएंगे। जानकारी के अनुसार, गांव की कमेटी के हेड ने भी परिवारों को अपने बच्चों को सेंटर पर न भेजने की हिदायत दी है।
प्रेग्नेंट महिलाओं को रोकने वालों पर होगा एक्शन
लिजारानी पांडव ने बताया कि उन्होंने राजनगर ब्लॉक के चीफ डेवलपमेंट प्रोजेक्ट ऑफिसर (सीडीपीओ) को इस बारे में बताया है, जिन्होंने उन्हें भरोसा दिलाया है कि बच्चों और प्रेग्नेंट महिलाओं को सेंटर आने से रोकने वालों के खिलाफ एक्शन लिया जाएगा। सीडीपीओ दीपाली मिश्रा ने कहा कि कई ऊंची जाति के माता-पिता इस बात का विरोध कर रहे हैं कि उनके बच्चे एक दलित महिला के हाथ का बना खाना खाएं। उन्होंने कहा कि हम उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि मैंने और राजनगर तहसीलदार ने मंगलवार को गांव वालों से बात की, लेकिन मामला अभी भी सुलझा नहीं है।
जातिवाद अभी खत्म नहीं हुआ – समाज में शिक्षा, कानून और विकास के बावजूद गांवों में पुरानी सोच बनी हुई है। सिर्फ जाति के नाम पर बच्चे और माताओं का पोषण और शिक्षा खतरे में है। बच्चों का नुकसान सबसे बड़ा है। आंगनवाड़ी प्री-स्कूल शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य की शुरुआत है। 80 दिन बंद रहने से गरीब बच्चों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। एक दलित युवती जो पढ़ी-लिखी है, नौकरी पाकर आत्मनिर्भर होना चाहती है, लेकिन जातिवाद उसे अकेला कर देता है।

केंद्रापाड़ा के कलेक्टर राघवम अय्यर ने बताया कि उप-कलेक्टर ने मौके पर जाकर स्थिति का आकलन किया है और उनकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी. यह मामला न केवल सामाजिक भेदभाव की गंभीरता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि ऐसी मानसिकता बच्चों के अधिकारों और पोषण सुरक्षा पर सीधा असर डालती है. विशेषज्ञों का कहना है कि आंगनवाड़ी जैसी योजनाएं समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक पोषण और शिक्षा पहुंचाने के लिए हैं, और जातिगत आधार पर किसी कर्मचारी का विरोध करना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है. फिलहाल प्रशासन समाधान की कोशिशों में जुटा है, लेकिन यह घटना सामाजिक समरसता और समानता के लिए अभी लंबा रास्ता तय किए जाने की याद दिलाती है.
भेदभाव दूर क्यों नहीं हो रहा?
दलितों के साथ भेदभाव और उनका बहिष्कार भारतीय समाज की एक गहरी जड़ वाली समस्या है। यह मुख्य रूप से जाति व्यवस्था से जुड़ी हुई है। भारत में 1950 के संविधान से अछूत प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया गया है, और एससी-एसटी एक्ट जैसे कानून हैं, लेकिन इनका क्रियान्वयन कमजोर है। सांस्कृतिक मान्यताएं, अशिक्षा और सामाजिक पूर्वग्रह भेदभाव को बनाए रखते हैं। ये भेदभाव मानवाधिकारों का उल्लंघन है और समाज की प्रगति में बाधा है।
यह मामला बताता है कि संविधान में समानता लिखी है, लेकिन जमीन पर लागू करने में अभी बहुत दूर जाना बाकी है। उम्मीद है कि प्रशासन जल्द समाधान निकालेगा ताकि शर्मिष्ठा जैसी मेहनती लड़कियां सम्मान से काम कर सकें और गांव के बच्चे पढ़ाई जारी रखें। जातिवाद को जड़ से खत्म करना ही असली प्रगति है।


