हमारे अज्ञान की परिसीमा तो ये है कि दिन भर मोबाइल से चिपके रहने वाले हम, बच्चों से उम्मीद लगाए रखते है कि वे मोबाईल का इस्तेमाल बंद कर दें ? कैसे मुमकिन है कि जिस घर का हर वयस्क मोबाईल को किचन से लेकर बाथरूम तक साथ रखता हो, वहां का बच्चा मोबाईल से अछूता रह जाये ? सोचने वाली बात है कि आप और हम जब मोबाईल को निहारेंगे तब बच्चे क्या हमारे चेहरों को ताकतें बैठेंगे ?
गाझियाबाद में तीन बहानों की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया और सोचने पर मजबूर कर दिया कि ऐसा क्या किया जाए की बच्चों के हाथ से स्मार्ट फ़ोन छूट जाये ? बच्चों का व्यवहार बदलने के लिए स्मार्ट फ़ोन की जिम्मेदारी को अब कोई नकार नही सकता। पर उनके हाथ मे स्मार्टफोन थमानेवाले हाथ भी हमारे ही थे इस से भी तो इंकार नही किया जा सकता।
हम कहते है की बच्चे स्मार्ट फ़ोन का इस्तेमाल बंद करके किताबें पढ़े ,अपनी रुची के अनुसार किसी कला – गुण में खुद को निपुण करे, दोस्तों से मिलें , घरवालों से बातें करे….मगर क्या हमने कभी ये सोचा है कि यही पैमाना पालकों के लिए भी तो लागू हो सकता है !
कितनी गृहणियां सीना ठोक कर कह सकती है कि वे स्मार्ट फ़ोन का इस्तमाल बंद कर देंगी ? कितने नोकरीपेशा पालक स्वीकार करेंगे की ऑफिस के काम के अलावा स्मार्ट फ़ोन को हाथ नहीं लगाया जाएगा ? मुश्किल लगता है ना ये करना? कुछ लोगों को नामुमकिन भी लग सकता है।
मगर शांत दिमाग से सोचा जाये तो बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए इस से कम कोई कीमत आज की तारीख में नहीं है। कैसे मुमकिन है कि पालक सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक मोबाईल को सीने से लगाए रखें और बच्चों पर उसका कोई असर ही ना हो ? बच्चा स्कूल की तैयारी में लगता है तब पापा मोबाईल में खबरे पढ़ रहे होते हैं , दोपहर को बच्चा जब स्कूल से घर आता है तो माँ ‘चिल’ करने के लिए मोबाईल देख रही होती है ! रात में तो पूरा परिवार मोबाईल की आग़ोश में लीन होता है.
ऐसा नहीं कि बच्चे माता -पिता के पास प्यार जताने नहीं आते.. वे आते हैं , बिलकुल आते है अपनी मां के पास… अपने पिता के पास … उन्हे दिनभर की स्कूल की बातें बताने के लिए ! जरा सोचकर बताइये अस वक्त हम क्या करते है ? हम में से ज्यादातर पालक बच्चों को बड़े प्यार से समझाते हैं कि बेटा बड़े काम की ख़बर देख रहा हूँ / रही हूँ , थोड़ी देर में बात करते हैं। रिल्स, मूवी और सीरियल देखानेवाले पालक तो बच्चों को बाहों में लेकर बैठते हैं और मिलकर मोबाइल देखते हैं। और कुछ तो डिस्टर्बेंस टालने के लिए बच्चों को दूसरा मोबाईल थमा देते हैं ? ईमानदारी से सोचें तो उंगलियों पर गिने जाये इतने ही पालक अपना मोबाइल साइड में रखकर बच्चों की बात सुनते है. धीरे – धीरे बच्चों को मोबाईल की लत लग जाती है, और फिर हमारा संघर्ष शुरू होता है उसी मोबाईल से बच्चों को दूर कराने के लिए…
हमारे अज्ञान की परिसीमा तो ये है कि दिन भर मोबाइल से चिपके रहने वाले हम, बच्चों से उम्मीद लगाए रखते है कि वे मोबाईल का इस्तेमाल बंद कर दें ? कैसे मुमकिन है कि जिस घर का हर वयस्क मोबाईल को किचन से लेकर बाथरूम तक साथ रखता हो, वहां का बच्चा मोबाईल से अछूता रह जाये ? सोचने वाली बात है कि आप और हम जब मोबाईल को निहारेंगे तब बच्चे क्या हमारे चेहरों को ताकतें बैठेंगे ?
मोबाइल का अतिरिक्त इस्तेमाल यह केवल बच्चों पर विपरीत परिणाम डालने वाली समस्या नहीं रह गयी है, बल्कि अब इसने एक सामाजिक समस्या का रूप ले लिया है. अगर हम वाकई चाहते हैं कि बच्चे मोबाईल से दूर रहे, तो इसकी पहल भी पालकों को स्वयं से करनी होगी। माता – पिता के हाथ में जितना कम मोबाइल नज़र आएगा, उतना ही हम बच्चों को मोबाइल से दूर करने में सफल हो पाएंगे।
ऐसा नहीं कि मोबाइल का ज़्यादा इस्तेमाल केवल बच्चों के लिए हानिकारक है, अपितु किसी भी उम्र का व्यक्ति अगर बहुत ज़्यादा समय स्क्रीन पर बिताएगा तो उसे उसका खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा।अनेक रिसर्च के बाद वैज्ञानिकों ने यह माना है कि मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से स्वास्थ्य पर कई प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं, जिनमें आँखों में थकान, सूखेपन, धुंधली दृष्टि , सिरदर्द, गर्दन- कंधे में दर्द, और नींद में बाधा शामिल हैं। शोध के अनुसार, लंबे समय तक मोबाइल विकिरण के संपर्क में रहने से त्वचा रोग, कैंसर का डर, और बच्चों में मस्तिष्क कैंसर का खतरा हो सकता है।
हम सब यह जानते हैं मगर फिर भी मोबाइल के इस्तेमाल को कम करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाते। यह ठीक वैसा ही है जैसे सिगरेट के पैकेट पर लिखा होता है ” स्मोकिंग इस डेंजरस टू हेल्थ ” और ध्रूमपान करनेवाला व्यक्ति वह चेतावनी पढ़कर बिना कुछ सोचे समझे उस पैकेट में से सिगरेट निकलता है और बड़े शान से पीता है ! मुझे सवाल ये पड़ता है की क्या कभी भी उनमें से कोई यह सोचता होगा कि यह चेतावनी उसके ही लिए लिखी गयी है ? मोबाइल का अतिरिक्त इस्तेमाल करने वालों का भी हाल कुछ ऐसा ही हो गया है, वैज्ञानिक लाख रिसर्च कर लें,लाखों बच्चे मोबाइल के दुष्परिणाम के शिकार हो जाये मगर मोबाइल से दूरी बनाने की चेतावनी हमें अपने लिए है ऐसा कभी महसूस ही नहीं होता ? कभी पालक के रूप में ये ख्याल दिल में नहीं आता कि इन लाखों बच्चों में हमारे बच्चे तो शामिल नहीं होंगे एक दिन ? मोबाइल की वजह से स्वस्थ समस्याओं का सामना करनेवालों में क्या कभी हमारा नाम भी आ सकता है ?
बतौर पालक हर किसी के लिए अपने बच्चों से बड़ी प्राथमिकता कोई नहीं होती, मगर जब ‘आदत’ और ‘अपने’ इनमें कुछ चुनना पड़े तो आदतों का तराज़ू अक्सर भारी होता है. और इन आदतों से छुटकारा पाने के लिए हिम्मत और जिगर लगता है। अपने लिए और अपने बच्चों के लिए क्या हम अपनी आदतें बदलने को तैयार हैं ? यह सवाल हर माता – पिता ने ख़ुद को पूछने की ज़रूरत आज है .
घर के अंदर , बाहर गार्डन में , ट्रेन में , बस में, स्कूल वैन में, ट्यूशन के फ्री टाइम में, ऑफिस के ब्रेक में , अस्पतालों में अपना नंबर आने का इंतज़ार करते वक़्त, शादियों में – पार्टियों में , हर पब्लिक प्लेस पर हाथो में मोबाइल लिए वयस्क जब नज़रों को दिखाना बंद हो जायेंगे , आपको क्या लगता है, बच्चा तब भी मोबाइल की लत से परेशान होगा ? नहीं होगा ! क्योंकि तब मोबाइल का अतिरिक्त इस्तमाल हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा नहीं रह जाएगा। किसी भी सामाजिक समस्या की शुरुआत परिवार से ही होती है, और उस समस्या के समाधान की शुरुआत भी परिवार से ही होना मुमकिन है. वर्तमान में इस तरह के सामाजिक वातावरण और दृश्य की कल्पना करना सपने जैसा लग सकता है. लेकिन जिन लोगों को अपने बच्चों के भविष्य की, देश के भविष्य की चिंता है उन्हें पहले ख़ुद मोबाइल से दूरी बनाने का निर्णय लेना ही होगा. फ़िलहाल इसके अलावा दूसरा कोई पर्याय हमारे पास उपलब्ध नहीं है .
भावना अमन


