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क्या हो अगर मुसलमान भाई “‘उर्दू भाषा ” पर अपना हक़ जताने लगे ?

क्या हो अगर मुसलमान भाई “‘उर्दू भाषा ” पर अपना हक़ जताने लगे ?

” बाबा” शब्द पर अपना हक़ जताने वाले हिन्दू भाईयों ने बड़ी मुश्किल पैदा कर दी है मुझ जैसे लोगों के लिए,यूँ ही बैठे बैठे ख़याल आया , क्या हो अगर मुसलमान भाई ‘उर्दू ‘ पर अपना हक़ ज़माने लगे ?

” बाबा” शब्द पर अपना हक़ जताने वाले हिन्दू भाईयों ने बड़ी मुश्किल पैदा कर दी है मुझ जैसे लोगों के लिए,यूँ ही बैठे बैठे ख़याल आया , क्या हो अगर मुसलमान भाई ‘उर्दू ‘ पर अपना हक़ ज़माने लगे ?
अगर ऐसा हुआ तो मिर्ज़ा ग़ालिब हमारे ना रह जायेंगे , मीर तक़ी मीर, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़,साहिर लुधियानवी , अल्लामा इक़बाल और जौन एलिया के शेरों में हम ज़िन्दगी के रंग ना ढूंढ पाएंगे ?मेहंदी हसन, गुलाम अली, और जगजीत सिंह की आवाज़ के जादू से ” ग़ैर मुसलमान ” अनछुए रह जायेंगे ? फरीदा खानम, आबिदा परवीन और बेगम अख्तर, पंकज उधस और तलत अजीज इनकी आवाज़ की संज़ीदगी को छूने का हक़ क्या खो बैठेगा ” ग़ैर मुसलमान ” ?

जिन लोगों की म्यूजिक गैलरी में किशोर कुमार और लता मंगेशकर के गीतों से ज़्यादा ख़जाना गज़ल्स का हो ,क्या लुटा देना होगा उन्हें वो ख़जाना ‘गैर मुसलमान’ होने की वज़ह से ? मुझे याद है ,कॉलेज के दिनों में ग़ालिब के शेऱ ज़ुबानी याद रखनेवालों की कमी नहीं थी, और दिल का हाल बयां करने के लिए आज भी शेऱ से बेहतर जरिया नहीं….

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए’तिबार होता

ताउम्र उर्दू भाषा के सागर से मोती चुन कर पिरोई हुई ग़ज़लें हिन्दुस्तानियों के लिए जीने का सहारा बन जाती है , क्या मोतियों की ये मालाएं हमारे लिए नहीं रहेंगी अगर ‘मुस्लमान भाई’ उर्दू पर अपना हक़ ज़माने लगे ?

मीर तक़ी मीर लिखते हैं …..

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

वो यह भी लिखते हैं कि ….

क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़

इश्क़ ही इश्क़ है जहाँ देखो
सारे आलम में भर रहा है इश्क़

इश्क़ है तर्ज़ ओ तौर इश्क़ के तईं
कहीं बंदा कहीं ख़ुदा है इश्क़

शब्दों की इतनी खूबसूरत बुनाई से कौन प्यार नहीं करेगा ? ये कैसे मुमकिन हो पायेगा दूर रहना शायरी के सागर से उन लोगों के लिए जो प्यार में हैं इस भाषा के….फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने लिखा है मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग, ये ग़ज़ल न जाने किती बार गयी होगी हम और आप ने ! अब फिल्म के गीत गाते समय भी क्या ये ध्यान रखना होगा की लिखने वाले कलम को पकड़ने वाला हाथ हिन्दू था या गैर हिन्दू ?

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात

तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए

यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

साहिर लुधियानवी द्वारा लिखे गीत और ग़ज़लें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की आत्मा का एक भाग है , एक तरफ प्यार के चरम को व्यक्त करते उनके अल्फाज तो दूसरी तरफ देशभक्ति और इंसानियत पर प्रहार करते नुकीले शब्द , उनकी कलम से निकली हर बात से प्यार करनेवाले लोग क्या करेंगे अगर ‘मुस्लमान भाई’ उर्दू पर अपना हक़ जताने लगे….

“कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है,
कि ज़िंदगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छांव में गुज़रने पाती,
तो शादाब हो भी सकती थी…”

“मैं जो जिंदगी हूँ तो वो भी हैं अना का कैदी,
मेरे कहने पर कहाँ उसने चले आना है…

“भूल से मोहब्बत कर बैठा, नादाँ था बेचारा,
दिल ही तो है हर दिल से ख़ता हो जाती है…”

“कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया,
बात निकली तो हर बात पे रोना आया..

ये देश है वीर जवानों का… और साथी हाथ बढ़ाना जैसे गीत लिखनेवाले साहिर की कलम की ताकत को इसलिए तो नाकारा नहीं जा सकता की वह हात गैर हिन्दू थे ?

मैं परेशां हो गयी ये भी सोचकर कि ग़म में आंखे मूंदकर गुलाम अली, जगजीत सिंह, मेहँदी हसन को सुननेवालों का क्या होगा, और अपनी ख़ुशी का इजहार करने के लिए शेर पढ़ने वालों का भी क्या होगा ? जिन लोगों के जख्मों पर मरहम का काम करती है उर्दू , उन लोगों की दवा का क्या होगा ? क्या होगा उन लोगों का जो महबूब के सामने आने पर बात काम और शेर ज्यादा पढ़ते हैं ?

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है
हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है

ज्वाला का काम करती शायरियाँ , मरहम का काम करती गज़ले , और प्रेम का इज़हार करती नज्में … इतनी समृद्ध भाषा और उसकी विरासत से क्या अनछुए रह जायेंगे हम ,अगर ‘मुसलमान भाई’ “उर्दू” पर अपना हक जताने लगे तो ?

भावना अमन

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