Awaaz India Tv

संसद में सरकार ने बताया- 2021 से अब तक हाईकोर्ट में नियुक्त जजों में लगभग 80% ‘उच्च’ जाति से

संसद में सरकार ने बताया- 2021 से अब तक हाईकोर्ट में नियुक्त जजों में लगभग 80% ‘उच्च’ जाति से

राज्यसभा में डीएमके सांसद पी. विल्सन के एक सवाल के जवाब में संसदीय कार्य मामलों के केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि 2021 से जनवरी 2026 के बीच देश के हाईकोर्ट में कुल 593 जज नियुक्त किए गए. इनमें से केवल 26 अनुसूचित जाति, 14 अनुसूचित जनजाति और 80 अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं.

नई दिल्ली: देशभर के उच्च न्याययालयों में अलग-अलग समुदाय के प्रतिनिधित्व से संबंधित जजों की नियुक्ति को लेकर गुरुवार (5 फरवरी) को संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में सरकार ने जानकारी प्रस्तुत की, जिसमें कथित उच्च जातियों का स्पष्ट वर्चस्व देखा गया.

राज्यसभा में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) सांसद पी. विल्सन के एक सवाल के लिखित जवाब में संसदीय कार्य मामलों के केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि 2021 से जनवरी 2026 के बीच देशभर के हाईकोर्ट में कुल 593 जज नियुक्त किए गए. इनमें से केवल 26 अनुसूचित जाति, 14 अनुसूचित जनजाति और 80 अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं.

इसके अलावा सरकार द्वारा ये जानकारी भी दी गई कि इस अवधि में हाईकोर्ट में 37 अल्पसंख्यक वर्ग के जजों और 96 महिलाओं को न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया है.

अर्जुन मेघवाल ने जिम्मेदारी के हस्तांतरण के लिए न्यायपालिका की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘कार्यप्रणाली ज्ञापन (एमओपी) के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति की पहल कौन करेगा, यह पहले से तय है.

उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के प्रस्ताव को शुरू करने की जिम्मेदारी भारत के मुख्य न्यायाधीश की है, जबकि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रस्तावों की जिम्मेदारी संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की होती है.

हालांकि, उन्होंने आगे कहा कि सरकार न्यायपालिका में सामाजिक विविधता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है. सरकार लगातार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से आग्रह करती रही है कि जजों की नियुक्ति के लिए नाम भेजते समय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं से जुड़े योग्य उम्मीदवारों पर भी गंभीरता से विचार किया जाए, ताकि न्यायपालिका में बेहतर सामाजिक संतुलन बन सके.

मंत्री के जवाब पर प्रतिक्रिया देते हुए डीएमके नेता पी. विल्सन, जिन्होंने अगस्त 2012 से मई 2014 तक भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के रूप में कार्य किया, ने उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के ‘कम प्रतिनिधित्व’ पर चिंता जताई.

उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘हमारे संविधान के 76वें वर्ष में प्रवेश करते हुए उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संरचना में चिंताजनक रुझान बने हुए हैं, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व घट रहा है. उच्च न्यायालयों में विविधता की उल्लेखनीय कमी है, जो भारत के अद्भुत रूप से विविध और बहुलवादी समाज को प्रतिबिंबित नहीं करती है.’

उन्होंने आगे कहा कि कई सामाजिक समूह उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में कम प्रतिनिधित्व रखते हैं. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की भर्ती प्रक्रिया में स्पष्ट भेदभाव दिखाई देता है.

प्रतिशत में दिए गए आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि डेटा के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में से 4.38% अनुसूचित जाति (एससी) श्रेणी से, 2.36% अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी से, 13.49% ओबीसी श्रेणी से हैं, जबकि 79.76% न्यायाधीश ‘अगड़ी जाति’ से संबंधित हैं.

उन्होंने आगे बताया कि 2018 से 30 अक्टूबर, 2024 के बीच भी स्थिति उतनी ही निराशाजनक थी, जिसमें अनुसूचित जाति (एससी) से 3.07% (21), अनुसूचित जनजाति (एसटी) से 2.05% (14), ओबीसी से 11.99% (82) और शेष 82.89% (567) न्यायाधीश थे.

उन्होंने कहा कि इससे यह संकेत मिलता है कि दलितों के अधिकारों की पर्याप्त रूप से रक्षा नहीं की जा रही है. जिससे संभावित रूप से उल्लंघन और अतिक्रमण हो सकते हैं. लोगों को चिंता है कि कुछ वर्गों से संबंधित न्यायाधीशों का एक संकीर्ण, समरूप समूह समाज के विविध विचारों और मूल्यों को प्रतिबिंबित नहीं कर सकता है, विशेष रूप से संस्कृति और पीढ़ीगत अंतर से संबंधित मुद्दों पर, क्योंकि वे कानूनों की व्याख्या अपने स्वयं के पृष्ठभूमि के आधार पर करते हैं.

पी. विल्सन के अनुसार, ‘अधिक विविधतापूर्ण न्यायपालिका बहुत जरूरी है; इसके बिना, अल्प प्रतिनिधित्व वाले समूहों के अधिकार अधिक खतरे में पड़ जाते हैं, जिससे भेदभाव उत्पन्न हो सकता है. ऐतिहासिक रूप से शोषित समूहों से न्यायाधीशों की कमी स्पष्ट संकेत देती है; यह योग्यता की कमी या अनुपलब्धता के कारण नहीं है, बल्कि उनके साथ भेदभाव करने और उन्हें न्यायपालिका से दूर रखने का एक दृढ़ निर्णय है.’

उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में ओबीसी/एससी/एसटी को आनुपातिक प्रतिनिधित्व देने के लिए संवैधानिक संशोधन की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि ‘कुछ समूहों का अत्यधिक प्रतिनिधित्व’ वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली की निष्पक्षता और सामाजिक विभाजनों से परे भर्ती करने में इसकी विफलता पर सवाल उठाता है.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *