- नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश में निजी परिसर में धार्मिक प्रार्थना आयोजित करने के लिए किसी तरह की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
उच्च न्यायालय दो ईसाई निकायों- ‘मारानाथा फुल गोस्पेल मिनिस्ट्रीज’ और ‘एमैनुअल ग्रेस चैरिटेबल ट्रस्ट’ की एक जैसी दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था जिनमें निजी परिसरों में प्रार्थना सभाएं आयोजित करने की अनुमति मांगी गई थी. बार एंड बेंच के अनुसार, जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के जवाब का संज्ञान लेने के बाद उक्त आदेश पारित किया. राज्य सरकार ने बताया कि कानून में अनुमति लेने का ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.
अदालत ने कहा, ‘राज्य सरकार के जवाब में यह स्पष्ट किया गया है कि निजी परिसरों में धार्मिक प्रार्थना आयोजित करने को लेकर याचिकाकर्ताओं पर कोई रोक नहीं है.’ सरकार द्वारा यह भी कहा गया है कि राज्य के सभी निकायों द्वारा राज्य भर के सभी नागरिकों को धर्म या किसी अन्य आधार पर भेदभाव किए बिना कानून का समान संरक्षण प्रदान किया जाता है.
अपने फैसले में न्यायालय ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार का हिस्सा रहे इस कार्य को करने के लिए कानून के तहत किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह इस शर्त के अधीन है कि धार्मिक प्रार्थना सभा केवल संपत्ति के निजी परिसर के भीतर ही आयोजित की जाए.
अदालत ने आगे कहा, ‘हालांकि, यदि कोई ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहां प्रार्थना सभा को सार्वजनिक सड़क या सार्वजनिक संपत्ति पर करना आवश्यक हो, तो ऐसी स्थिति में, यह न्यायालय याचिकाकर्ता को कम से कम पुलिस को सूचित करने और यदि आवश्यक हो तो कानून के तहत आवश्यक अनुमति प्राप्त करने का आदेश देता है.’
गौरतलब है कि बीते 18 जनवरी को उत्तर प्रदेश पुलिस ने बरेली ज़िले के एक गांव से 12 लोगों को बिना आधिकारिक अनुमति के खाली पड़े मकान में नमाज अदा करने के आरोप में हिरासत में लिया था.
पुलिस के अनुसार, प्रारंभिक जांच में पता चला कि यह संपत्ति हनीफ नामक व्यक्ति की थी और 16 जनवरी को शुक्रवार की नमाज के लिए इसका अस्थायी रूप से उपयोग किया गया था. पुलिस ने बताया कि पूछताछ करने पर वहां मौजूद लोग कोई लिखित अनुमति या वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके.
हालांकि मकान मालकिन ने मीडिया को बताया था कि उनका घर खाली पड़ा था और उन्होंने ही स्थानीय लोगों को अपने घर में नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी थी.


