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सर एलेक्जेंडर कनिंघम की 212वीं जयंती के अवसर पर…

सर एलेक्जेंडर कनिंघम की 212वीं जयंती के अवसर पर…

सर एलेक्जेंडर कनिंघम (23 जनवरी 1814 – 28 नवंबर 1893)

सर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम KCIE ब्रिटिश सेना के बंगाल इंजीनियर ग्रुप में इंजीनियर थे जो बाद में भारतीय पुरातत्व, ऐतिहासिक भूगोल तथा इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान् के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनको भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग का जनक माना जाता है। इनके दोनों भ्राता फ्रैन्सिस कनिंघम एवं जोसफ कनिंघम भी अपने योगदानों के लिए ब्रिटिश भारत में प्रसिद्ध हुए थे। भारत में अंग्रेजी सेना में कई उच्च पदों पर रहे और 1861में मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए। इन्हें इनके योगदानों के लिए 20 मई, 1870 को ऑर्डर ऑफ स्टार ऑफ इंडिया से सम्मानित किया गया था। बाद में 1878 में इन्हें ऑर्डर ऑफ इंडियन एम्पायर से भी सम्मानित किया गया। 1887 में इन्हें नाइट कमांडर ऑफ इंडियन एंपायर घोषित किया गया।

सर एलेक्जेंडर कनिंघम का जन्म 23 जनवरी 1814 को लंदन में हुआ था। 19 वर्ष की आयु में वे बंगाल इंजीनियर्स में शामिल हुए और ब्रिटिश सेना में 28 वर्षों तक सेवा करने के बाद मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए।1834 में भारत आने के बाद उनकी मुलाकात जेम्स प्रिंसिप से हुई, जो बाद में घनिष्ठ मित्र बन गए। प्रिंसिप उस समय कई शिलालेखों पर काम कर रहे थे और उनकी लिपि की खोज कर रहे थे। कनिंघम को भी भारतीय इतिहास में गहरी रुचि थी। ब्रिटिश सेना में उनका योगदान सराहनीय था, लेकिन खुदाई के दौरान की गई कई खोजों के कारण उनका नाम इतिहास में अंकित हो गया। 21 वर्ष की आयु में वाराणसी में सेना में कार्यरत रहते हुए, सारनाथ में मिट्टी में दबे कुछ अवशेषों पर उनका ध्यान गया। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों से प्राचीन महल होने की आशंका में खुदाई के लिए अनुमति और धन की मांग की। अनुमति तो मिल गई, लेकिन धन नहीं मिला।

कनिंघम ने इस उत्खनन के लिए अपना वेतन स्वयं वहन किया। इसमें प्राप्त शिलालेख प्रिंसेप द्वारा लिखा गया था और इसमें कहा गया था कि यह एक भव्य स्तूप था और बुद्ध ने यहीं पर अपना प्रथम उपदेश दिया था। 145 फुट ऊंचे स्तूप को देखकर कनिंघम ने प्रणाम किया। बाद में, उन्होंने सांची में स्थित स्तूप का उत्खनन किया, जिसमें चारों स्तूप और कई मूर्तियां शामिल थीं। उत्खनन से सारिपुत्त और मोग्लान के अस्थि-हड्डियां भी मिलीं। उन्होंने यहां के सभी स्तूपों का जीर्णोद्धार किया।

कनिंघम ने एक चीनी बौद्ध , हुयान त्सांग के यात्रा वृत्तांत के माध्यम से कई बौद्ध स्थलों की खोज की। उन्होंने कुशीनारा में बुद्ध के महा परिनिर्वाण स्थल की खोज की और महा परिनिर्वाण मुद्रा में 1500 वर्ष पुरानी बुद्ध प्रतिमा पाई। 1846 में, कनिंघम ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग को भारत में पुरातात्विक सर्वेक्षण शुरू करने का प्रस्ताव भेजा। उनके प्रयासों का फल मिला और 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना हुई तथा सर एलेक्जेंडर कनिंघम को इसका प्रथम महानिदेशक नियुक्त किया गया। इसके बाद उन्होंने भारत में उत्खनन को बढ़ावा दिया।

1881 में उन्होंने बोधगया में खुदाई शुरू की। वहाँ कनिंघम को सम्राट अशोक द्वारा निर्मित वज्रासन और बुद्ध की अस्थियाँ मिलीं। कनिंघम अत्यंत प्रसन्न हुए। हालाँकि नालंदा की खुदाई फ्रांसिस बुकानन ने की थी, कनिंघम ने पाया कि यह नालंदा विश्वविद्यालय की वास्तुकला थी। उन्होंने सबसे पुराने बौद्ध विश्वविद्यालय तक्षशिला की खोज की और खुदाई शुरू की जो बीस वर्षों तक चली। कनिंघम ने अयोध्या में खुदाई की और प्रमाणित किया कि यह एक पूर्व बौद्ध विहार था।

पुरातत्व विभाग के उच्च पदों पर रहते हुए अलेक्ज़ॅन्डर कॅनिंघम ने भारत के प्राचीन विस्मृत इतिहास के विषय में काफी जानकारी संसार के सामने रखी। प्राचीन स्थानों की खोज और अभिलेखों एवं सिक्कों के संग्रहण द्वारा उन्होंने भारतीय अतीत के इतिहास की शोध के लिए मूल्यवान् सामग्री जुटाई और विद्वानों के लए इस दिशा में कार्य करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। कनिंघम के इस महत्वपूर्ण और परिश्रमसाध्य कार्य का विवरण पुरातत्व विषयक रिपोर्टो के रूप में, 23 जिल्दों में, छपा जिसकी उपादेयता आज प्राय: एक शताब्दी पश्चात् भी पूर्ववत् ही है।

बाद की खुदाई में मिले कसौटी स्तंभ और उस पर बनी मूर्तिकला की पुष्टि होती है। कनिंघम ने कई प्राचीन बौद्ध स्थलों की खोज की और उन्हें दुनिया के सामने लाया। उन्होंने पूरे भारत में खुदाई की और कई प्राचीन वास्तुकारों को खोजा।अलेक्जेंडर कनिंघम 1885 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से सेवानिवृत्त हुए, लेकिन उनके द्वारा स्थापित आदर्श आज भी आधुनिक पुरातत्वविदों के लिए मार्गदर्शक हैं। उन्होंने प्राचीन भारत के कई शहरों और वहां के पुरातत्व स्थलों की खोज की। उन्होंने खुदाई में मिली हर वास्तुकला के सुंदर रेखाचित्र बनाए, जिनमें बारीक विवरण भी शामिल थे। आज भी उनके रेखाचित्रों का विश्व भर में अध्ययन किया जाता है। सम्राट अशोक का संपूर्ण शिलालेख और स्तंभों पर लिखे लेख कनिंघम द्वारा निकाले गए थे। यह शिलालेख लेखन का एक आदर्श उदाहरण है। कनिंघम ने कई पुस्तकें लिखीं, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई पुस्तक श्रृंखला ‘कॉर्पस इंस्क्रिप्शनम इंडिकारम’ को भारतीय इतिहास और पुरातत्व का मानक माना जाता है।

अलेक्ज़ॅन्डर कॅनिंघम ने प्राचीन भारत में आनेवाले यूनानी और चीनी पर्यटकों के भारतविषयक वर्णनों का अनुवाद तथा संपादन भी बड़ी विद्वता तथा कुशलता से किया है। चीनी यात्री युवानच्वांग (7वीं सदी ) के पर्यटनवृत्त का उनका सपांदन, विशेषकर प्राचीन स्थानों का अभिज्ञान, अभी तक बहुत प्रामाणिक माना जाता है। 1871 में उन्होंने ‘एंशेंट ज्योग्रैफ़ी ऑफ इंडिया प्रसिद्ध पुस्तक लिखी जिसका महत्व आज तक कम नहीं हुआ है। इस शोधग्रंथ में उन्होंने प्राचीन स्थानों का जो अभिज्ञान किया था वह अधिकांश में ठीक साबित हुआ, यद्यपि उनके समकालीन तथा अनुवर्ती कई विद्वानों ने उसके विषय में अनेक शंकाएँ उठाई थीं। उदाहरणार्थ, कौशांबी के अभिज्ञान के बारे में कनिंघम का मत था कि यह नगरी उसी स्थान पर बसी थी जहाँ वर्तमान कौसम (जिला इलाहाबाद) है, यही मत आज पुरातत्व की खोजों के प्रकाश में सर्वमान्य हो चुका है। किंतु इस विषय में वर्षो तक विद्वानों का कनिंघम के साथ मतभेद चलता रहा था और अंत में वर्तमान काल में जब कनिंघम का मत ही ठीक निकला तब उनकी अनोखी सूझ-बूझ की सभी विद्वानों को प्रशंसा करनी पड़ी है। सर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम KCIE का 18 नवंबर,1893 निधन को हुआ था।

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