गुरु पद्मसंभव समारोह का आयोजन पिछले वर्ष 2025 से ‘द लाइट ऑफ बुद्धिज्म फाउंडेशन इंटरनेशनल’ द्वारा उनके सम्मान में किया जा रहा है। इस वर्ष भी यह कार्यक्रम 11 से 16 जनवरी 2026 तक ओडिशा के डायमंड ट्रायंगल में आयोजित किया गया। हम आपके साथ इस समारोह की कुछ तस्वीरें साझा कर रहे हैं।
ओडिशा के ऐतिहासिक बौद्ध स्थलों, जिन्हें डायमंड ट्रायंगल (ललितागिरी, उदयगिरी, रत्नगिरी) कहा जाता है, 11-16 जनवरी 2026 को दूसरे गुरु पद्मसंभव समारोह (मोनलम) का भव्य आयोजन हो रहा है, जहाँ दुनिया भर से भिक्षु, विद्वान और श्रद्धालु गुरु पद्मसंभव की शिक्षाओं को याद करने, प्रार्थना करने और ओडिशा के समृद्ध बौद्ध विरासत को बढ़ावा देने के लिए एकत्र हुए हैं, जिसमें पवित्र मंत्रोच्चार, दीप प्रज्वलन और ज्ञान-संवाद शामिल हैं।
ज्ञात हो कि गुरु पद्मसंभव, जिन्हें गुरु रिनपोचे के नाम से भी जाना जाता है, का ओडिशा से गहरा संबंध है। उन्हें ‘उदियन गुरु’ कहा जाता है, क्योंकि उनका जन्मस्थान उदियाना (वर्तमान ओडिशा) माना जाता है, जो आज के ओडिशा के संबलपुर में स्थित है। उन्होंने बौद्ध धर्म को ओडिशा की इस पवित्र भूमि से तिब्बत तक ले जाने और वहां इसका प्रचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहां उन्हें ‘द्वितीय बुद्ध’ माना जाता है
।गुरु पद्मसंभव समारोह का आयोजन पिछले वर्ष 2025 से ‘द लाइट ऑफ बुद्धिज्म फाउंडेशन इंटरनेशनल’ द्वारा उनके सम्मान में किया जा रहा है। इस वर्ष भी यह कार्यक्रम 11 से 16 जनवरी 2026 तक ओडिशा के डायमंड ट्रायंगल में आयोजित किया गया। हम आपके साथ इस समारोह की कुछ तस्वीरें साझा कर रहे हैं।
फोटो साभार: विकास कुमार

पद्मसंभव एक प्रसिद्ध बुद्ध व्याख्याता था| इन्होंने 8वीं शती में तांत्रिक बौद्ध धर्म को भूटान एवं तिब्बत में ले जाने एवं प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी| इन्हें “गुरू रिन्पोछे” (बहुमूल्य गुरू) या “लोपों रिन्पोछे” के नाम से भी जाना जाता है| ञिङमा सम्प्रदाय के अनुयायी उन्हें द्वितीय बुद्ध मानते हैं।
कार्यक्रम में भाग लेने आए भिक्षुओं का कहना है कि , “दुनिया आज बहुत अस्थिर है और हम शांति के लिए प्रार्थना करना चाहते हैं. गुरु पद्मसंभव के अनुयायियों के दिलों में एक लंबा समय से यह आकांक्षा थी कि गुरु पद्मसंभव की याद में और उनकी शिक्षा के सम्मान में इस प्रकार का एक ऐतिहासिक आयोजन किया जाए.

ञिङमा, तिब्बती बौद्ध धर्म की पांच प्रमुख शाखाओं में से एक हैं। तिब्बती भाषा में “ञिङमा” का अर्थ “प्राचीन” होता है। कभी-कभी इसे ङग्युर भी कहा जाता है जिसका अर्थ “पूर्वानूदित” होता है, जो नाम इस सम्प्रदाय द्वारा सर्वप्रथम महायोग, अनुयोग, अतियोग और त्रिपिटक आदि बौद्ध ग्रंथों को संस्कृत इत्यादि भारतीय भाषों से तिब्बती में अनुवाद करने के कारण रखा गया। तिब्बती लिपि और तिब्बती भाषा के औपचारिक व्याकरण की आधारशिला भी इसी ध्येय से रखी गई थी।
आधुनिक काल में ञिङमा संप्रदाय का धार्मिक संगठन तिब्बत के खम प्रदेश पर केन्द्रित है।


इस आयोजन में भूटान, लाओस, थाईलैंड, अमेरिका और अन्य देशों से भी प्रतिनिधि शामिल हुए. इसके अतिरिक्त, कार्यक्रम के दौरान भव्य जुलूस और सार्वजनिक सभा का भी आयोजन किया गया, जिसमें हजारों लोगों ने भाग लिया. ओडिशा में उनके सम्मान में बड़े बौद्ध उत्सव और समारोह आयोजित किए जाते हैं, साथ ही उनकी भव्य प्रतिमाएं भी स्थापित की गई हैं।


