महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं. पुणे से लेकर मुंबई तक के सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि चाचा-भतीजे यानी शरद पवार और अजित पवार फिर से एक साथ आ सकते हैं
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़े बदलाव की आहट है. पुणे से लेकर मुंबई तक राजनीतिक गलियारों में यह खबर आग की तरह फैल गई है कि चाचा-भतीजे यानी शरद पवार और अजित पवार फिर से एक होने जा रहे हैं. पिछले कुछ दिनों से एनसीपी के दोनों गुटों के एक साथ आने की चर्चा लगातार चल रही थी. पहले कहा जा रहा था कि नगर पंचायत और नगर परिषद चुनावों के मद्देनजर शरद पवार और अजित पवार एक साथ आएंगे. हालांकि, उस वक्त एनसीपी के दोनों गुटों के एक साथ आने का मौका नहीं बन पाया. लेकिन अब पुख्ता खबर आई है कि आगामी नगर निगम चुनावों से पहले एनसीपी के दोनों गुट एक साथ आ सकते हैं.एनसीपी के दोनों गुटों के विलय को लेकर हुई गुप्त बैठकें पूरी हो चुकी हैं. अब जानकारी मिल रही है कि सिर्फ आधिकारिक घोषणा बाकी है. पुणे के पूर्व महापौर दत्ता धनकावड़े ने इस संबंध में एक बेहद बड़ा बयान दिया है, जिससे हलचल मच गई है. धनकावड़े ने कहा कि यह घोषणा किसी भी क्षण की जा सकती है. उन्होंने सबसे अहम बात यह कही कि शरद पवार गुट के उम्मीदवार अब ‘घड़ी’ (Clock) चिन्ह पर चुनाव लड़ेंगे. दत्ता धनकावड़े ने कहा, दोनों एनसीपी गुट एक साथ आने वाले हैं. इस पर कोई असहमति नहीं है. दोनों गुटों के बीच बातचीत पूरी हो चुकी है. अब सिर्फ घोषणा बाकी है. अंतिम घोषणा जल्द ही की जाएगी और हमें कुछ अच्छी खबर मिलेगी.
इसके साथ ही आज कई पूर्व पार्षदों ने एनसीपी ज्वाइन कर ली है. धनकावड़े ने बताया कि वार्ड नंबर 38 एनसीपी का गढ़ है और उन्होंने विश्वास जताया कि यहां के सभी पांचों उम्मीदवार अच्छे बहुमत से निर्वाचित होंगे. मुंबई में ‘सिल्वर ओक’ पर मंथन और वो ‘फोन कॉल’ दूसरी ओर, मुंबई में भी गतिविधियां तेज हो गई हैं. सवाल यह है कि क्या राज्य की नगरपालिकाओं में अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन करना चाहिए या नहीं? इस फैसले पर चर्चा के लिए मुंबई में शरद पवार के आवास पर वरिष्ठ नेताओं की हाई-प्रोफाइल बैठक चल रही है. इस बैठक में जयंत पाटिल, प्रदेश अध्यक्ष शशिकांत शिंदे और राजेश टोपे मौजूद हैं.
अजित पवार की राजेश टोपे से बात
सूत्रों के मुताबिक, बैठक के दौरान ही अजित पवार ने राजेश टोपे से फोन पर इस विषय पर चर्चा की है. अजित पवार के इस फोन कॉल और पुणे में धनकावड़े के बयान ने महायुति के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है. अगर दोनों पवार एक होते हैं, तो राज्य के समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे.
शरद पवार की ‘महायुति’ में अप्रत्यक्ष एंट्री
अगर दोनों गुटों का विलय होता है और अजित पवार शिंदे-फडणवीस सरकार में उप-मुख्यमंत्री बने रहते हैं, तो इसका सीधा मतलब यह होगा कि शरद पवार भी महायुति के साथ आ जाएंगे. यह बीजेपी के लिए सबसे अच्छी स्थिति होगी क्योंकि इससे लोकसभा और विधानसभा में विपक्ष पूरी तरह टूट जाएगा. शरद पवार का विरोध खत्म होते ही महायुति अजेय हो सकती है.
अजित दादा की घर वापसी और सरकार पर संकट
दूसरा और महायुति के लिए मुश्किल पहलू यह हो सकता है कि पवार फैमिली एक होने के लिए अजित पवार महायुति (भाजपा-शिंदे) का साथ छोड़ दें. अगर अजित दादा अपने विधायकों के साथ वापस शरद पवार के खेमे में लौटते हैं, तो महायुति के लिए थोड़ी चिंता की बात होगी. हालांकि सरकार पर कोई असर नहीं होगा.
‘पवार पावर’ का नया गेम
तीसरी संभावना यह है कि यह ‘एकता’ केवल नगर निगम और स्थानीय चुनावों तक सीमित रहे. पुणे जैसे गढ़ को बचाने के लिए चाचा-भतीजा स्थानीय स्तर पर एक हो जाएं (हम एक हैं का नारा देकर), लेकिन राज्य स्तर पर अजित सरकार में बने रहें. इससे महायुति में भ्रम की स्थिति पैदा होगी, भाजपा और शिवसेना (शिंदे) को समझ नहीं आएगा कि पवार उनके दोस्त हैं या दुश्मन, और अंततः सीटों के बंटवारे में पवार गुट (संयुक्त) ज्यादा सीटों पर कब्जा कर लेगा.


