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20 बच्चों की जान बचानेवाली कंचन बाई मेघवाल को शहादत का दर्जा क्यों नहीं?

20 बच्चों की जान बचानेवाली कंचन बाई मेघवाल को शहादत का दर्जा क्यों नहीं?

देखिए न, इस देश में अब अंगुली काटकर भी शहादत का टैग लग जाता है। फोटो खिंचवाते हैं, वीडियो वायरल होते हैं, सम्मान मिलता है, सुर्खियां बनती हैं। लेकिन जब कोई महिला — दलित, गरीब, आंगनबाड़ी में खाना बनाने वाली, स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष — हजारों मधुमक्खियों के डंक सहकर 20 मासूम बच्चों को बचाती है, अपनी जान देकर उन्हें ढाल बनाती है, तो क्या मिलता है? नीमच, मध्य प्रदेश। रानपुर गांव। 3 फरवरी 2026। आंगनबाड़ी केंद्र। बच्चे खेल रहे थे। अचानक मधुमक्खियों का झुंड। चीखें। अफरा-तफरी। और बीच में कंचन बाई मेघवाल। 40-45 साल की उम्र। पति लकवाग्रस्त। तीन बच्चे। रोज़ का काम — बच्चों को खाना बनाना, परोसना। लेकिन उस पल में? वह नहीं भागी। हाथपंप पर कपड़े धो रही थीं। देखा तो दौड़ीं। दरी उठाई। तिरपाल उठाई। चटाई उठाई। एक-एक बच्चे को ढका। कमरे में पहुंचाया। खुद डंक खाती रहीं। सैकड़ों, हजारों डंक। शरीर जल रहा था। दर्द असहनीय। फिर भी नहीं रुकीं। आखिरी बच्चा सुरक्षित हुआ। तब जाकर गिरीं। अस्पताल पहुंचीं। लेकिन बच नहीं पाईं।

20 बच्चे बच गए। 20 परिवार बच गए। 20 भविष्य बच गए। और कंचन बाई? अमर हो गईं। लोग कह रहे हैं — माँ। वीरांगना। शहीद।  लेकिन सवाल वही है — शहादत का दर्जा क्यों नहीं?  देखिए न। जब सीमा पर गोली लगती है, तब शहीद। जब आतंकवादी हमले में जान जाती है, तब शहीद। जब राजनीतिक हत्या होती है, तब भी शहीद। लेकिन जब एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता — दलित महिला, मेघवाल समाज से — रोज़ के काम में बच्चों की ढाल बनकर मर जाती है? तब क्या? 

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने संज्ञान लिया। एक्स पर पोस्ट किया — दुखद, हृदयविदारक। 4 लाख रुपये की आर्थिक सहायता का ऐलान। बच्चों की पढ़ाई का खर्च सरकार उठाएगी। राजस्थान की डिप्टी सीएम दीया कुमारी ने सलाम किया। सोशल मीडिया पर पोस्ट। श्रद्धांजलि। कुछ अखबारों में खबर

फिर भी… शहादत का आधिकारिक दर्जा? राष्ट्रव्यापी सम्मान? संसद में चर्चा? राष्ट्रपति से पदक? वह नहीं। क्यों? क्योंकि शहादत का सर्टिफिकेट मुख्यधारा जारी करती है। और मुख्यधारा में शहादत वो है जो कैमरे पर हो, जो राजनीति में फिट बैठे, जो “राष्ट्र” की इमेज को चमकाए। सीमा पर गोली। संसद में हमला। बड़े-बड़े मंच। लेकिन आंगनबाड़ी के छोटे से आंगन में? ग्रामीण भारत के उस कोने में जहां मधुमक्खियां हमला करती हैं, और एक दलित महिला अपनी जान से बच्चों की ढाल बन जाती है? वह “हादसा” कहलाता है।

“मातृत्व का बलिदान” कहलाता है। “प्रेरणादायक कहानी” कहलाता है। लेकिन शहादत? नहीं। क्योंकि शहादत में रैली निकलती है। ट्रैक्टर खींचे जाते हैं। बड़े नेता जाते हैं। लेकिन यहां? एक छोटा सा गांव। एक छोटी सी आंगनबाड़ी। एक छोटी सी महिला। उसका बलिदान “छोटा” है। क्योंकि वह “राष्ट्र-विरोधी” नहीं, लेकिन “राष्ट्र-केंद्रित” भी नहीं लगता। बस एक माँ का काम है — बच्चों को बचाना। और माँ का त्याग तो “स्वाभाविक” है न?

\तो आज जब आप लिखते हैं — अंगुली कटाने वालों को वजूद मिलता है, और बच्चों के लिए शहादत देने वाली को नजरअंदाज किया जा रहा है — तो जवाब यही है: क्योंकि यह देश अभी भी तय करता है कि कौन का बलिदान “शहीद” है, और कौन का “बस एक औरत का त्याग”। एक तरफ अंगुली काटकर सुर्खियां। दूसरी तरफ हजारों डंक सहकर बच्चों को बचाना “ममता”। सवाल वही रहता है — कब तक?


कब तक कंचन बाई जैसी दाधिची का कर्म अंधेरे में रहेगा?
कब तक दलित-गरीब-महिला का साहस “छोटा” गिना जाएगा?
कब तक हम पूछते रहेंगे… क्यों? और अगर सम्मान देना है, तो दे दीजिए। पूरा शहीदी सम्मान। राजकीय सम्मान। ताकि आने वाली पीढ़ियां देखें — इंसानियत किसी जाति, किसी पद की मोहताज नहीं होती।

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