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CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की कोशिश पर मुकुल रोहतगी की दो टूक, बोले- ‘आरोप अस्पष्ट, संवैधानिक आधार नहीं’

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नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को हटाने की विपक्ष की प्रस्तावित कोशिश के बीच पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने इस कदम के संवैधानिक आधार पर सवाल उठाए हैं। रोहतगी ने कहा है कि केवल चुनाव आयोग के भीतर मतभेद या असहमति के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई नहीं की जा सकती। उनके मुताबिक, हटाने के लिए गंभीर, ठोस और स्थापित आधार जरूरी हैं।

रोहतगी की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब विपक्षी दल CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है और विपक्षी दलों के बीच इस मुद्दे पर सहमति बनाने की कोशिश जारी है।

14 आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद बढ़ा विवाद

विवाद की पृष्ठभूमि में द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें मतदाता सूची के संशोधन और SIR से जुड़े मुद्दे भी शामिल बताए गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने CEC को प्रशासनिक नोट भी भेजे और कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर कुछ प्रक्रियाओं और फैसलों को लेकर आपत्ति जताई। यही रिपोर्ट विपक्ष के प्रस्तावित नए कदम की प्रमुख वजहों में से एक बनी है।

हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से यह कहा गया है कि लिखित नोट, सुझाव और अलग-अलग राय आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। रिपोर्टों के अनुसार आयोग ने यह भी कहा कि SIR समेत उसके फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए।

‘असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा’

मुकुल रोहतगी ने चुनाव आयोग में मतभेद को लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया। उनका तर्क है कि तीन सदस्यीय आयोग में किसी मुद्दे पर अलग-अलग राय होना अपने आप में किसी संवैधानिक उल्लंघन का प्रमाण नहीं है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की बेंच का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार न्यायाधीशों के बीच किसी मामले पर मतभेद होता है और अलग-अलग राय सामने आती है। इसके बावजूद अंतिम फैसला संस्थागत प्रक्रिया के तहत लिया जाता है। उनके अनुसार, इसी तरह चुनाव आयोग में भी अलग राय होना अपने आप में CEC के खिलाफ कार्रवाई का आधार नहीं बनता।

रोहतगी ने कथित तौर पर कहा कि महाभियोग जैसे कदम के लिए आरोप स्पष्ट और ठोस होने चाहिए। उनका कहना है कि केवल अस्पष्ट आरोपों या आंतरिक असहमति के आधार पर ऐसी कार्रवाई नहीं हो सकती।

कैबिनेट सचिव को पत्र लिखने पर भी सवाल

पूर्व अटॉर्नी जनरल ने दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे जाने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कैबिनेट सचिव कार्यपालिका और नौकरशाही के प्रमुख होते हैं और चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। ऐसे में चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज में कैबिनेट सचिव की भूमिका को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि, इन पत्रों और कथित आपत्तियों से जुड़े सभी तथ्यों पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी सीमित है। रोहतगी ने यह भी सवाल उठाया कि आंतरिक नोट और पत्र सार्वजनिक कैसे हुए और उनकी पूरी प्रामाणिकता की स्वतंत्र पुष्टि किस स्तर पर हुई है।

क्या है CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया?

भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की सुरक्षा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान रखी गई है। यानी CEC को सामान्य प्रशासनिक आदेश से नहीं हटाया जा सकता। हटाने की प्रक्रिया संसद के जरिए होती है और इसके लिए सिद्ध दुर्व्यवहार (proved misbehaviour) या अक्षमता (incapacity) जैसे आधार जरूरी हैं।

संसद के दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होने के बाद ही राष्ट्रपति CEC को पद से हटाने की कार्रवाई कर सकते हैं। इस बहुमत में सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई का समर्थन शामिल होता है।

विपक्ष की तैयारी, आगे क्या?

विपक्ष इससे पहले भी ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर नोटिस दे चुका है। अब ताजा विवाद के बाद विपक्षी दल दोनों सदनों में नया नोटिस लाने की तैयारी कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, विपक्षी दलों के बीच इस मुद्दे पर संयुक्त रणनीति बनाने की चर्चा चल रही है।

वहीं, मुकुल रोहतगी का तर्क इस पूरे विवाद के दूसरे संवैधानिक पहलू को सामने रखता है—क्या चुनाव आयोग के भीतर दर्ज असहमति और प्रशासनिक आपत्तियां अपने आप में CEC को हटाने के लिए पर्याप्त आधार हैं, या इसके लिए संविधान में निर्धारित ‘सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता’ जैसे ठोस आधार स्थापित करना जरूरी होगा?

फिलहाल विपक्ष की ओर से प्रस्तावित नोटिस और उसमें दर्ज किए जाने वाले विस्तृत आरोप सामने आने के बाद ही इस सवाल पर तस्वीर और स्पष्ट होगी।

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