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‘₹6 हजार भी 5-7 महीने की देरी से, पंचायत सहायक घर कैसे चलाएं?’ लखनऊ में डटे कर्मचारी

by Admin
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में पंचायत स्तर पर सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक कामकाज में भूमिका निभाने वाले पंचायत सहायकों का आंदोलन अब राजधानी लखनऊ तक पहुंच चुका है। 7 सितंबर से पंचायत सहायक ईको गार्डन में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। प्रदेश के अलग-अलग जिलों से पहुंचे कर्मचारी मानदेय बढ़ाने, सेवा सुरक्षा और संविदा व्यवस्था खत्म करने समेत कई मांगों को लेकर सरकार से ठोस निर्णय की मांग कर रहे हैं।

पंचायत सहायकों का कहना है कि उन्हें वर्तमान में महज ₹6,000 प्रतिमाह मानदेय मिलता है। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग है कि इसे बढ़ाकर ₹30,000 प्रतिमाह किया जाए। कुछ संगठनों ने इसे ग्राम पंचायत सचिव के समकक्ष करने या कम से कम न्यूनतम कुशल मजदूरी के स्तर पर लाने की मांग भी रखी है।

‘इतने कम मानदेय में परिवार कैसे चले?’

पंचायत सहायकों की शिकायत केवल मानदेय कम होने तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक भुगतान में देरी भी आर्थिक संकट बढ़ाती है। आंदोलनकारियों का सवाल है कि अगर इतनी कम राशि भी समय पर न मिले तो परिवार का राशन, बच्चों की पढ़ाई, किराया और इलाज जैसे खर्च कैसे पूरे किए जाएं।

उनकी ओर से सरकार से सवाल किया जा रहा है—“राशन उधार लें, बच्चों की फीस रोकें या इलाज छोड़ दें?”

हालांकि, मानदेय में 5-7 महीने की देरी का दावा प्रदर्शनकारियों की शिकायत के रूप में ही सामने रखा जाना चाहिए; उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में ₹6,000 मानदेय और आंदोलन की पुष्टि है, लेकिन भुगतान में देरी की इस अवधि की स्वतंत्र सरकारी पुष्टि नहीं मिली है।

सिर्फ ₹6 हजार नहीं, सेवा सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा

पंचायत सहायकों की मांग केवल वेतन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। प्रदर्शनकारी संविदा व्यवस्था खत्म कर स्थायी सेवा नियमावली लागू करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि लंबे समय से पंचायतों में काम करने के बावजूद उन्हें स्थायी सेवा की सुरक्षा नहीं मिल रही है।

कई ज्ञापनों में पंचायत सहायकों ने ‘समान काम के लिए समान वेतन’ का सिद्धांत लागू करने की मांग भी उठाई है। इसके अलावा महिला पंचायत सहायकों के लिए मातृत्व अवकाश और स्थानांतरण की व्यवस्था, नगर पंचायतों से प्रभावित सहायकों के समायोजन तथा आगे होने वाली संबंधित भर्तियों में अनुभव का लाभ देने जैसी मांगें भी सामने आई हैं।

आंदोलन लखनऊ से जिलों तक पहुंचा

आंदोलन का असर दूसरे जिलों में भी दिखाई दिया है। फिरोजाबाद के टूंडला में पंचायत सहायकों ने लखनऊ आंदोलन के समर्थन में कार्य बहिष्कार कर खंड विकास कार्यालय पर प्रदर्शन किया और ज्ञापन सौंपा। उन्होंने भी ₹30 हजार मानदेय, संविदा समाप्त कर स्थायी नौकरी, डीबीटी के माध्यम से भुगतान और महिला सहायकों को मातृत्व अवकाश देने जैसी मांगें रखीं।

7 सितंबर को लखनऊ के हजरतगंज में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाकर ईको गार्डन भेज दिया, जिसके बाद आंदोलनकारियों ने वहीं अपना धरना जारी रखा।

58 हजार से ज्यादा पंचायत सहायकों का दावा

11 सितंबर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पंचायत सहायकों के प्रतिनिधिमंडल ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में 58,672 पंचायत सहायक इस आंदोलन से जुड़े हैं और 7 सितंबर से ईको गार्डन में अनिश्चितकालीन धरना दे रहे हैं।

इस बीच 14 सितंबर को अपना दल (कमेरावादी) की नेता और सिराथू विधायक डॉ. पल्लवी पटेल भी ईको गार्डन में चल रहे धरने में पहुंचीं और पंचायत सहायकों की मांगों का समर्थन किया।

सरकार के सामने अब बड़ा सवाल

पंचायत सहायकों का तर्क है कि सरकार उनसे पंचायत स्तर पर काम और जिम्मेदारियां तो चाहती है, लेकिन उनके मानदेय और सेवा सुरक्षा के सवाल पर ठोस फैसला नहीं हो रहा। आंदोलनकारियों की मांग है कि उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि सम्मानजनक मानदेय, समय पर भुगतान और नौकरी की सुरक्षा मिले।

फिलहाल पंचायत सहायकों का धरना जारी है और उनकी प्रमुख मांगों में ₹30 हजार मासिक मानदेय, संविदा व्यवस्था खत्म करना, स्थायी सेवा नियमावली, समान काम के लिए समान वेतन और महिला कर्मचारियों के लिए आवश्यक सेवा सुविधाएं शामिल हैं। अब नजर इस बात पर है कि राज्य सरकार इन मांगों पर क्या निर्णय लेती है।

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