चर्चा के दौरान मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि देश के शिक्षा संस्थानों में ऐसी सोच रखने वाले लोगों का प्रभाव बढ़ रहा है, जो मनुस्मृति की विचारधारा को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा सामग्री और कुछ वैचारिक हस्तक्षेपों के जरिए ऐसी सोच को संस्थानों में स्थान दिया जा रहा है।
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में पब्लिक एग्जामिनेशन (अनफेयर मीन्स की रोकथाम) संशोधन विधेयक पर चर्चा के बीच उस समय जोरदार हंगामा खड़ा हो गया, जब कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने शिक्षा व्यवस्था और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए ‘मनुस्मृति’ का उल्लेख किया। उनके बयान पर सत्ता पक्ष ने कड़ा विरोध दर्ज कराया, जिसके बाद सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने विवादित टिप्पणी को सदन की कार्यवाही से हटाने का निर्देश दिया।
यह पूरा घटनाक्रम उस समय हुआ, जब सदन में पेपर लीक रोकने से जुड़े संशोधन विधेयक पर चर्चा चल रही थी। हालांकि बहस जल्द ही शिक्षा व्यवस्था, इतिहास और सामाजिक न्याय के मुद्दों की ओर मुड़ गई।
खड़गे ने क्या कहा?
चर्चा के दौरान मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि देश के शिक्षा संस्थानों में ऐसी सोच रखने वाले लोगों का प्रभाव बढ़ रहा है, जो मनुस्मृति की विचारधारा को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा सामग्री और कुछ वैचारिक हस्तक्षेपों के जरिए ऐसी सोच को संस्थानों में स्थान दिया जा रहा है।
खड़गे ने कहा कि कुछ प्राचीन ग्रंथों में ऐसे उल्लेख मिलते हैं, जिनमें शूद्रों को शिक्षा और वेद अध्ययन से वंचित रखने तथा कठोर दंड का वर्णन किया गया है। उनका कहना था कि आधुनिक भारत की शिक्षा व्यवस्था संविधान के मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि ऐसी विचारधाराओं पर जो सामाजिक समानता के विपरीत हों।
उनके इस बयान पर सत्ता पक्ष के सांसदों ने तत्काल आपत्ति जताई और सदन में शोर-शराबा शुरू हो गया।
जेपी नड्डा का जवाब – “तथ्य पेश कीजिए”
भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने खड़गे के आरोपों को तथ्यों से परे बताते हुए कहा कि इस प्रकार के बयान समाज में भ्रम और अशांति फैला सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, तो उनके समर्थन में प्रमाण भी प्रस्तुत किए जाने चाहिए।
नड्डा ने कहा कि यदि मनुस्मृति से जुड़े दावों का हवाला दिया जा रहा है, तो उसका मूल स्रोत सदन के सामने रखा जाए। उन्होंने यह भी कहा कि ऐतिहासिक और धार्मिक ग्रंथों पर चर्चा तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, न कि राजनीतिक आरोपों के आधार पर।
सभापति ने रिकॉर्ड से हटवाया बयान
लगातार हंगामे के बीच राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सदन की गरिमा बनाए रखना सभी सदस्यों की जिम्मेदारी है। उन्होंने खड़गे की विवादित टिप्पणी को कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाने के निर्देश दिए, जिसके बाद सदन में स्थिति कुछ हद तक सामान्य हुई।
सुधांशु त्रिवेदी ने इतिहास का दिया हवाला
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने बहस के दौरान कहा कि मनुस्मृति के संदर्भ में कई दावे ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाते। उन्होंने सर विलियम जोन्स द्वारा किए गए अनुवाद का उल्लेख करते हुए अपनी बात रखी और डॉ. भीमराव अंबेडकर की पुस्तक “Who Were the Shudras?” का भी हवाला दिया।
उन्होंने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने आधुनिक अनुसूचित जातियों और वैदिक काल के शूद्रों के बीच सीधे संबंध को अलग संदर्भ में समझाया है।
तथ्यों पर भी हुई बहस
बहस के दौरान कई ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए।
चर्चा में यह भी कहा गया कि शूद्रों को वेद अध्ययन पर दंड से जुड़े जिन उद्धरणों का उल्लेख किया गया, वे मनुस्मृति के बजाय गौतम धर्मसूत्र में पाए जाते हैं। बाद में खड़गे ने भी अपने वक्तव्य में गौतम ऋषि का उल्लेख किया।
विलियम जोन्स के अनुवाद को लेकर भी बहस हुई। ऐतिहासिक रूप से मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद 1794 में “Institutes of Hindu Law, or the Ordinances of Menu” शीर्षक से प्रकाशित हुआ था और यह आज भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।
डॉ. अंबेडकर की पुस्तक “Who Were the Shudras?” के संदर्भ में भी अलग-अलग व्याख्याएं सामने आईं। पुस्तक में प्राचीन वैदिक काल के शूद्रों और आधुनिक सामाजिक वर्गों के बीच ऐतिहासिक अंतर पर विस्तार से चर्चा की गई है।
प्रमोद तिवारी ने भी सरकार को घेरा
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने सदन में एक पुस्तक दिखाते हुए कहा कि यदि सरकार ऐसे साहित्य पर आपत्ति जताती है, तो यह भी देखना चाहिए कि वह वर्षों से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार को आपत्ति थी, तो इतने लंबे समय तक उस पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
पेपर लीक कानून पर भी सरकार को घेरा
मनुस्मृति विवाद के साथ-साथ खड़गे ने पेपर लीक कानून को लेकर भी सरकार पर कई सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि:
सरकार छात्रों के आंदोलन और जनदबाव के कारण नए संशोधन लाने को मजबूर हुई।
केवल जुर्माना और सजा बढ़ाने से पेपर लीक नहीं रुकेंगे, बल्कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार आवश्यक हैं।
पिछले कुछ वर्षों में 152 परीक्षाओं में पेपर लीक के मामले सामने आए, लेकिन दोषियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) में संस्थागत सुधार और पारदर्शिता की जरूरत है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री से जवाब मांगा और कहा कि सरकार को छात्रों की आवाज सुननी चाहिए।
राजनीतिक बहस तेज
राज्यसभा में हुई यह बहस केवल पेपर लीक कानून तक सीमित नहीं रही, बल्कि शिक्षा नीति, इतिहास, सामाजिक न्याय और वैचारिक राजनीति जैसे व्यापक मुद्दों तक पहुंच गई। एक ओर विपक्ष सरकार पर शिक्षा व्यवस्था के वैचारिकरण और पारदर्शिता की कमी का आरोप लगा रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि विपक्ष ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है।