नई दिल्ली। देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही कुछ महत्वपूर्ण किताबों और अकादमिक पाठ्यक्रमों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। 26 सितंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक गुमनाम अकाउंट से कुछ पुस्तकों और लेखकों को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज किए जाने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की ओर से पूछताछ किए जाने की खबर है। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग ने 27 सितंबर को कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों से संबंधित पाठ्यक्रमों पर अपनी टिप्पणी और उनमें नामांकित छात्रों की संख्या मांगी। शिक्षा मंत्रालय का यह पत्र ‘अति आवश्यक’ श्रेणी में भेजा गया था।
गुमनाम पोस्ट में किन किताबों पर उठाए गए सवाल?
विवाद की शुरुआत 26 सितंबर को X पर प्रकाशित एक पोस्ट से हुई। पोस्ट में दावा किया गया कि विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को पितृसत्ता, जाति-विनाश और इतिहास के ‘डी-ब्राह्मणीकरण’ जैसे विषयों से जुड़ी किताबें पढ़ाकर उनके दिमाग में ‘जहर’ भरा जा रहा है। पोस्ट में इसे कथित तौर पर ‘वामपंथी’ शिक्षकों और समूहों से जोड़ते हुए शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की मांग की गई। इसके बाद इसी विषय पर छह और पोस्ट का एक थ्रेड साझा किया गया।
इस थ्रेड के साथ करीब 35 पुस्तकों और अकादमिक रचनाओं की सूची भी साझा की गई थी। इनमें डॉ. बी.आर. अंबेडकर की ‘Annihilation of Caste’, ज्योतिराव फुले की ‘Gulamgiri’, शर्मिला रेगे की ‘Against the Madness of Manu’, गेल ओमवेट की ‘Dalits and the Democratic Revolution’, ब्रज रंजन मणि की ‘Debrahmanising History’ और कांचा इलैया शेफर्ड की ‘Why I Am Not a Hindu’ जैसी रचनाएं शामिल थीं।
सूची में रामायण और महाभारत जैसी रचनाओं का भी उल्लेख था। पोस्ट में पेरियार, आर.एस. शर्मा, सावित्रीबाई फुले, उमा चक्रवर्ती, सुवीरा जायसवाल, आलोका पाराशर, शिरीन रत्नागर, जी. अलोसियस और अनुपमा राव जैसे लेखकों की रचनाओं को भी शामिल किया गया।
27 सितंबर को विश्वविद्यालयों को भेजा गया ‘अति आवश्यक’ पत्र
इस सोशल मीडिया पोस्ट के अगले ही दिन, 27 सितंबर को उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारी राज कमल कुमार की ओर से कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों के रजिस्ट्रारों को ईमेल भेजा गया। रिपोर्टों के मुताबिक इसमें PMO से प्राप्त संचार का हवाला देते हुए विश्वविद्यालयों से पोस्ट पर ‘टिप्पणी’ देने को कहा गया। साथ ही पोस्ट में जिन पाठ्यक्रमों का उल्लेख था, उनमें नामांकित छात्रों की संख्या की जानकारी भी मंत्रालय को देने को कहा गया।
यह पत्र विश्वविद्यालयों जैसे हैदराबाद विश्वविद्यालय, पांडिचेरी विश्वविद्यालय, राजीव गांधी विश्वविद्यालय, तेजपुर विश्वविद्यालय, मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी और English and Foreign Languages University समेत अन्य केंद्रीय संस्थानों को भेजे जाने की रिपोर्ट है।
हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों में यह नहीं कहा गया है कि इन पुस्तकों या लेखकों को पाठ्यक्रम से हटाने का कोई अंतिम सरकारी आदेश जारी हो चुका है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार विश्वविद्यालयों से टिप्पणियां और नामांकन संबंधी जानकारी मांगी गई है।
किन विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों का किया गया उल्लेख?
गुमनाम X थ्रेड में दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), केंद्रीय पंजाब विश्वविद्यालय और कोलकाता विश्वविद्यालय से संबद्ध आशुतोष कॉलेज के पाठ्यक्रमों का उल्लेख किया गया था। इसमें स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के विभिन्न पाठ्यक्रमों में शामिल रीडिंग्स के स्क्रीनशॉट साझा किए गए थे।
उदाहरण के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के एमए अंग्रेजी के एक पाठ्यक्रम में डॉ. अंबेडकर की ‘Annihilation of Caste’, शर्मिला रेगे द्वारा संपादित ‘Against the Madness of Manu’ और ज्योतिराव फुले की ‘Gulamgiri’ का उल्लेख किया गया था।
क्या ये सभी लेखक ‘वामपंथी’ हैं?
यहीं से विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। पोस्ट में जिन लेखकों और विचारकों को कथित ‘वामपंथी’ अकादमिक नेटवर्क से जोड़कर निशाना बनाया गया, उनके राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण एक-दूसरे से काफी अलग रहे हैं। कई अंबेडकरवादी और जाति-विरोधी चिंतकों ने पारंपरिक भारतीय वामपंथ की वर्ग-केंद्रित राजनीति की आलोचना भी की है। रिपोर्टों में इसी बिंदु को लेकर अकादमिक जगत से सवाल उठाए गए हैं।
कांचा इलैया शेफर्ड ने उठाए PMO की भूमिका पर सवाल
लेखक और शिक्षाविद कांचा इलैया शेफर्ड, जिनकी ‘Why I Am Not a Hindu’ भी इस सूची में शामिल है, ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अंबेडकरवाद को सीधे वामपंथी विचारधारा के साथ जोड़ना उचित नहीं है और अंबेडकरवादी विचारधारा का पारंपरिक वर्ग-संघर्ष आधारित वामपंथ से अलग वैचारिक इतिहास रहा है।
इलैया ने विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में PMO की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उनका तर्क है कि पाठ्यक्रम से संबंधित विषय उच्च शिक्षा विभाग, विश्वविद्यालयों और UGC जैसी शैक्षणिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आने चाहिए।
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि यदि फुले और अंबेडकर की रचनाओं को पढ़ाए जाने पर आपत्ति की जा रही है, तो इसका सामाजिक न्याय और समानता की बहस पर क्या असर पड़ेगा। उनके बयान में SC, ST और OBC समुदायों के संदर्भ में भी यह मुद्दा उठाया गया।
विवाद अब राजनीतिक मुद्दा भी बना
इस मामले पर विपक्ष की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 30 सितंबर को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अंबेडकर की ‘Annihilation of Caste’ और फुले की ‘Gulamgiri’ जैसी पुस्तकों को ‘जहर’ बताने वाली पोस्ट के बाद केंद्र द्वारा केंद्रीय विश्वविद्यालयों से उनके पाठ्यक्रमों और छात्रों की संख्या की जानकारी मांगना गंभीर सवाल खड़े करता है।
असली सवाल: अकादमिक स्वायत्तता या पाठ्यक्रम की समीक्षा?
इस पूरे विवाद में फिलहाल दो अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं। एक तरफ सोशल मीडिया पोस्ट में इन पुस्तकों को लेकर वैचारिक और राजनीतिक आपत्तियां दर्ज की गईं। दूसरी तरफ, उसके बाद शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों से संबंधित पाठ्यक्रमों पर टिप्पणी और नामांकन संबंधी जानकारी मांगी।
इसलिए फिलहाल यह कहना कि सरकार ने इन किताबों को पाठ्यक्रम से हटाने का फैसला कर लिया है, उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर जल्दबाजी होगी। लेकिन PMO के संदर्भ के साथ विश्वविद्यालयों से जानकारी मांगे जाने की घटना ने विश्वविद्यालयों की अकादमिक स्वायत्तता, पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया और अंबेडकर-फुले समेत जाति-विरोधी साहित्य की शैक्षणिक भूमिका को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस जरूर शुरू कर दी है।