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बाल यौन शोषण मामले में दंपती को फांसी की सजा, कोर्ट ने कहा- ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ केस

बाल यौन शोषण मामले में दंपती को फांसी की सजा, कोर्ट ने कहा- ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ केस

बुंदेलखंड की शांत गलियों में कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि एक सरकारी अफसर और उसकी पत्नी मिलकर ऐसा भयावह अपराध जाल बुन रहे हैं, जो न केवल स्थानीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध से भी जुड़ा होगा. यह कहानी है लालच, हवस और टेक्नोलॉजी के खतरनाक गठजोड़ की, जहां मासूमियत को पैसे में तौला गया और भरोसे को जाल बनाया गया. एक आंटी जो बच्चों के लिए सांता क्लोज थीं. हर दिन खाने को अच्छा-अच्छा सामान, खेलने के लिए गैजेट और न जाने क्या क्या देती थीं. पर मगर, यही आंटी राक्षस से कम नहीं निकलीं. आइए जानते हैं सबकुछ.

चित्रकूट: उत्तर प्रदेश के सूखे, शांत और आधे-अधूरे सपनों से भरे बुंदेलखंड में बसे शहर बांदा, चित्रकूट और हमीरपुर ने बहुत कुछ देखा है. गरीबी, पलायन, सूखा और संघर्ष… लेकिन जो सच साल 2020 के बाद धीरे-धीरे सामने आया, उसने इन शहरों की आत्मा तक को झकझोर दिया. यह कहानी सिर्फ एक अपराध की नहीं, बल्कि उस अंधेरे की है, जो इंसान के भीतर पलता है और मौका मिलते ही राक्षस बनकर बाहर आ जाता है. यह कहानी है सिंचाई विभाग के एक निलंबित जूनियर इंजीनियर रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती की, एक ऐसा दंपती जिसने भरोसे को हथियार बनाया, मासूमियत को जाल में फंसाया और इंसानियत को शर्मसार कर दिया.

जाने क्या है मामला
हम बात कर रहे हैं चित्रकूट में सिंचाई विभाग के निलंबित जूनियर इंजीनियर (जेई) रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती की. इस दंपति ने सबसे भयानक मिसाल पेश की है. 50 से ज्यादा मासूम बच्चों का यौन शोषण कर उनके वीडियो डार्क वेब और विदेशी पोर्न साइट्स पर बेचने वाले इस दरिंदे दंपती को आखिरकार अदालत ने फांसी की सजा सुना दी है. सीबीआई की जांच में सामने आया यह मामला सिर्फ बाल यौन शोषण का नहीं था, बल्कि मासूमों की आड़ में चल रहे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर क्राइम का भी पर्दाफाश था. आइए जानते हैं सबकुछ.

बच्चों को चॉकलेट का लालच
दुर्गावती ने अपने आसपास के गरीब परिवारों के बच्चों को निशाना बनाना शुरू किया. 5 से 16 साल उम्र के बच्चों को महंगा मोबाइल, घड़ी या चॉकलेट का लालच देती. बेचारे बच्चे समझते कितनी अच्छी आंटी हैं. उनके लिए ये सामान किसी खजाने से कम नहीं था. वह बच्चों से अपनापन जताती. कभी मिठाई देती, कभी पेन, कभी कपड़े. धीरे-धीरे बच्चे उसके घर आने लगे. पड़ोसियों को यह सब कुछ सामान्य लगता था. मगर, हर बार जब घर का दरवाजा बंद होता, तो एक बच्चे की मासूमियत छीन ली जाती थी.

लालच या हवस ?
रामभवन का मकसद केवल हवस को मिटाना नहीं था. बल्कि वह पैसे का भूखा था. उसने अपराध को कारोबार बना दिया था. घर के अंदर बच्चों की अश्लील तस्वीरें और वीडियो बनाए जाते. फिर वे फाइलें इंटरनेट के उस अंधेरे हिस्से में पहुंचाई जातीं, जहां पहचान छुपाकर गुनाह खरीदे-बेचे जाते हैं. वह डार्क वेब और विदेशी पोर्न साइट्स के जरिए इन वीडियो को बेचता था. ईमेल की जांच की गई तो सामने आया कि वह देश-विदेश के कई गिरोहों के संपर्क में था. यह कोई अकेला अपराध नहीं था- यह एक अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क से जुड़ा संगठित अपराध था. अगर कोई बच्चा किसी तरह का विरोध करता तो उसे उन्हीं तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेल किया जाता. साथ ही परिवारों को भी धमकी दी जाती. इस पर गरीब परिवार, जिनके पास इज्जत ही सबसे बड़ी पूंजी थी, खामोश हो जाते और इसी खामोशी में कई साल बीत गए.

इंटरपोल से आया पहला संकेत
17 अक्टूबर 2020 को भारत की प्रमुख जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को एक चौंकाने वाली सूचना मिली. यह सूचना अंतरराष्ट्रीय पुलिस संगठन इंटरपोल से आई थी. एक पेन ड्राइव में 34 बच्चों से जुड़े वीडियो और 679 तस्वीरें थीं. डिजिटल ट्रैकिंग से पता चला कि इनका स्रोत बुंदेलखंड का एक सरकारी इंजीनियर है. 31 अक्टूबर 2020 को नई दिल्ली में केस दर्ज हुआ. जांच की कमान डीएसपी अमित कुमार को सौंपी गई. अब तक जो अंधेरा घर की चारदीवारी में छुपा था, वह जांच की रोशनी में आने लगा.

इस दिन हुआ था गिरफ्तार
16 नवंबर 2020 को इस पूरे मामले से परदा हट गया. चित्रकूट की एसडीएम कॉलोनी को सीबीआई की 10 सदस्यीय टीम ने चुपचाप घेर लिया. दरवाजा खुला तो अंदर जो मिला, उसने जांच अधिकारियों तक को हिला दिया. 8 मोबाइल फोन, एक लैपटॉप, पेन ड्राइव, मेमोरी कार्ड, सेक्स टॉयज, 8 लाख रुपये नकद और डिजिटल फोल्डरों में छुपी 66 वीडियो और 600 से ज्यादा तस्वीरें. कुछ ही दिनों बाद दुर्गावती भी गिरफ्तार कर ली गई.

अब यह मामला केवल स्थानीय पुलिस का नहीं रहा था. यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अपराध का केस बन चुका था. जांच के दौरान कई बच्चों को मेडिकल जांच के लिए एम्स दिल्ली भेजा गया. डॉक्टरों की टीम ने जो देखा, उसने उन्हें अंदर तक हिला दिया. कोर्ट में जब उन्होंने गवाही दी, तो शब्द कांप रहे थे. कुछ बच्चों की आंखों में स्थायी डर था. कुछ शारीरिक रूप से गंभीर रूप से आहत थे. मगर, सबसे गहरा घाव उनके मन पर था. कई बच्चे अब भी अंधेरे कमरे से डरते थे. किसी अजनबी की मुस्कान उन्हें सिहरन दे जाती थी. कोर्ट में पेश हुए 25 पीड़ित बच्चों ने जब बयान दिए, तो पूरा माहौल भारी हो गया. यह केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, यह मासूमियत की चीख थी.

अब मिला न्याय
20 फरवरी 2026 का सबसे ज्यादा दिन अहम था. इसी दिन इन मासूमों को न्याय मिला. बांदा की विशेष पॉक्सो अदालत में 163 पन्नों का फैसला पढ़ा गया. जज प्रदीप कुमार मिश्रा ने कहा कि यह अपराध विरल से विरलतम की श्रेणी में आता है. कोर्ट ने दोनों दोषियों को मौत होने तक फांसी पर लटकाए जाने की सजा सुनाई. वहीं, हर पीड़ित बच्चे को एक-एक लाख रुपये की क्षतिपूर्ति दिए जाने को कहा. राज्य और केंद्र सरकार को 10-10 लाख रुपये सहायता देने का आदेश दिया. फैसले के समय कोर्ट में सन्नाटा था. यह केवल सजा नहीं थी. यह समाज की ओर से एक संदेश था कि मासूमियत के खिलाफ अपराध को बख्शा नहीं जाएगा.

बुंदेलखंड की सूखी हवा अब भी वैसी ही चलती है. मंदिरों की घंटियां अब भी बजती हैं. स्कूलों में बच्चे अब भी खेलते हैं. मगर, इस घटना ने सिखाया है कि राक्षस कभी-कभी साधारण चेहरे के पीछे छुपा होता है. यह कहानी डराती है, क्योंकि यह किसी भूत की नहीं, बल्कि इंसान के भीतर के अंधेरे की है और शायद यही सबसे बड़ा खौफ है कि कभी-कभी खतरा बाहर नहीं, हमारे बीच ही रहता है.

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