कोलंबो, श्रीलंका की राजधानी में स्थित प्रसिद्ध गंगारामया मंदिर में भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरी अवशेष एक हफ्ते तक रखे गए थे। 4 फरवरी से 11 फरवरी 2026 तक चली इस प्रदर्शनी में 10 लाख से ज्यादा श्रद्धालु इन अवशेषों के दर्शन करने पहुंचे। संस्कृति मंत्रालय ने यह जानकारी दी। यह पहली बार था जब ये पवित्र अवशेष भारत से बाहर किसी देश में प्रदर्शित किए गए।
यह प्रदर्शनी कैसे शुरू हुई? अप्रैल 2025 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्रीलंका गए थे, तब उन्होंने इस प्रदर्शनी की घोषणा की थी। प्रधानमंत्री ने कहा था कि ये अवशेष श्रीलंका के लोगों को दिखाए जाएंगे, ताकि दोनों देशों के बीच का पुराना रिश्ता और मजबूत हो। इस फैसले ने भारत और श्रीलंका के बीच सदियों पुराने आध्यात्मिक और सांस्कृतिक बंधनों को नई ऊर्जा दी।
भारत वैश्विक स्तर पर बौद्ध विरासत का संरक्षक है और श्रीलंका के साथ लोगों के बीच के संबंधों को गहरा करने के लिए लगातार काम कर रहा है। इस प्रदर्शनी ने उसी प्रतिबद्धता को दिखाया।
अवशेष कहां से आए और कैसे ले जाया गया? ये पवित्र अवशेष गुजरात के वडोदरा में महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में रखे हुए हैं। देवनीमोरी गुजरात का एक बहुत महत्वपूर्ण बौद्ध पुरातात्विक स्थल है। यहां खुदाई के दौरान एक बड़ा स्तूप (बौद्ध स्मारक) और कई पवित्र अवशेष मिले थे। ये अवशेष भगवान बुद्ध से सीधे जुड़े माने जाते हैं।
4 फरवरी 2026 को इन अवशेषों को भारतीय वायुसेना के विशेष विमान से श्रीलंका ले जाया गया। पूरे राजकीय सम्मान के साथ इन्हें गंगारामया मंदिर पहुंचाया गया। उद्घाटन समारोह में श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके, गुजरात के राज्यपाल और उपमुख्यमंत्री मौजूद थे।
कितने लोग आए और क्या महसूस किया? सात दिन की प्रदर्शनी में पूरे श्रीलंका से लाखों लोग आए। मंदिर में उपासक तथा उपासकों की भीड़ लगी रही। लोग फूल, अगरबत्ती चढ़ाकर दर्शन कर रहे थे। कई मंत्री, सांसद और पूर्व राष्ट्रपति भी आए। श्रीलंका के लोग बहुत खुश थे कि भारत ने उन्हें ये दुर्लभ अवशेष दिखाने का मौका दिया।
इसके साथ दो और प्रदर्शनियां भी लगाई गईं – एक पिपरहवा (उत्तर प्रदेश) के अवशेषों पर और दूसरी समकालीन भारत की सांस्कृतिक भागीदारी पर। इससे दोनों देशों की साझी बौद्ध विरासत को और उजागर किया गया।
अवशेष वापस कैसे लाए गए? 11 फरवरी को प्रदर्शनी खत्म होने के बाद अवशेषों को वापस भारत लाया गया। मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल और अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चोवना मीन के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय भारतीय टीम ने इन्हें वापस लाया। वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु और अधिकारी भी साथ थे।
मंदिर से एयरपोर्ट तक पूरे सम्मान के साथ ले जाया गया। श्रीलंका सरकार ने भारत का शुक्रिया अदा किया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी राष्ट्रपति दिसानायके को धन्यवाद दिया।
इसका क्या महत्व है? यह प्रदर्शनी सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक कूटनीति का बड़ा उदाहरण थी। भारत और श्रीलंका दोनों बौद्ध देश हैं। भगवान बुद्ध का संदेश शांति और करुणा का है। ये अवशेष दोनों देशों के लोगों के दिलों को जोड़ते हैं।
देवनीमोरी अवशेष अब वापस वडोदरा पहुंच गए हैं, लेकिन इस यात्रा ने भारत-श्रीलंका रिश्ते को और मजबूत कर दिया है। लाखों लोगों ने बुद्ध के दर्शन किए और शांति का संदेश महसूस किया।


