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ब्राह्मणों में न्यायिक चरित्र नहीं होता – स्वामी प्रसाद मौर्य

ब्राह्मणों में न्यायिक चरित्र नहीं होता – स्वामी प्रसाद मौर्य

UGC की गाइडलाइन्स और इस पर लगी रोक का मामला शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। एक बार फिर यूपी के पूर्व कैबिनेट मंत्री और अपनी जनता पार्टी के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने यूसीसी कानून पर केंद्र और प्रदेश सरकार को घेरा। साथ ही उन्होंने ब्राह्मणों को अति जातिवादी कहा। साथ ही कहा कि ब्राह्मण हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक भरे पड़े हैं।

स्वामी प्रसाद मौर्य ने पोस्ट कर यूसीसी कानून से जुड़े मुद्दे को फिर भड़का दिया है। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा, अंग्रेज शासकों ने कहा था कि ब्राह्मण अति जातिवादी होता है। जाति के आधार पर फैसला लेता है। ब्राह्मणों का चरित्र न्यायिक नहीं होता है, इसीलिए ब्रिटिश शासन ने सन 1919 में ब्राह्मणों को न्यायिक सेवा में लिए जाने पर रोक लगाने का शासनादेश जारी किया था। हालांकि ग्रोक ने इस पोस्ट को पूरी तरह से सही नहीं पाया है. ग्रोक के मुताबिक इसमें सच्चाई हो सकती है. लेकिन संदर्भ काफी कम है.

उनके इस बयान पर काफी तीखी प्रतिक्रिया भी आ रही है. वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी उनकी इस सोच जातिगत कुंठा करार दिया है.

हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट में भरे पड़े ब्राह्मण: मौर्य
स्वामी प्रसाद मौर्य ने आगे लिखा कि सोचिए जरा, जिन ब्राह्मणों पर न्यायिक सेवा में लिए जाने पर रोक थी, वही ब्राह्मण आज सभी प्रकार की न्यायिक सेवाओं में, यहां तक की उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भी 70 से 80 प्रतिशत तक भरे पड़े हैं।

क्या ब्राह्मणों का चरित्र बदल गया
उन्होंने पूछा कि क्या अब ब्राह्मणों का न्यायिक चरित्र बदल गया है? यदि नहीं तो क्या अब उनके फैसले जातिवाद से प्रभावित नहीं होते? क्या इनके द्वारा लिए गए फैसले निष्पक्ष होते हैं? यह अपने आप में विचारणीय है। यद्यपि कि न्यायपालिका में हमारा विश्वास भी है और आस्था भी। हालांकि यूजीसी कानून 2026 मामले पर रोक, वरवस ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जारी शासनादेश सन 1919 पर विचार मंथन के लिए मजबूर अवश्य करता है।

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