डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को 15वीं बार पैरोल मिली है. बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों के इस दोषी को इस बार 40 दिन की राहत दी गई है. एक लोकतांत्रिक देश में किसी अपराधी के लिए जेल के दरवाजे किसी ‘रिवॉल्विंग डोर’ की तरह काम करने लगें, तो सिस्टम की नीयत पर सवाल उठना लाजिमी है.
बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को एक बार फिर 40 दिनों की खुली हवा में सांस लेने की ‘आजादी’ मिल गई है. खबर यह नहीं है कि उसे पैरोल मिली है, खबर यह है कि राम रहीम को 15वीं बार यह राहत दी गई है. यह सिलसिला अब इतना सामान्य हो चुका है कि जनता ने भी इस पर चौंकना बंद कर दिया है. लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में जब एक अपराधी के लिए जेल के दरवाजे किसी ‘रिवॉल्विंग डोर’ की तरह काम करने लगें, तो सिस्टम की नीयत पर सवाल उठना लाजिमी है.
भारत की जेलों में लाखों ऐसे कैदी बंद हैं, जो अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार या बच्चों की शादी के लिए चंद दिनों की पैरोल पाने को एड़ियां रगड़ देते हैं. उनकी फाइलें महीनों धूल खाती हैं और अक्सर ‘कागजी कार्रवाई’ के बोझ तले दम तोड़ देती हैं. लेकिन राम रहीम के मामले में प्रशासन की तत्परता हैरान करने वाली है. 15 सितंबर 2025 को मिली पैरोल के कुछ ही महीनों बाद अब इस साल जनवरी में एक फिर से उसे 40 दिन की राहत दे दी गई.
‘हार्डकोर क्रिमिनल’ का ‘गुड कंडक्ट’ कैसे?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विरोधाभास सरकार का वह तर्क है, जो उसने कोर्ट में दिया है. सरकार का कहना है कि राम रहीम ‘हार्डकोर क्रिमिनल’ (पेशेवर अपराधी) नहीं है और वह एक ‘अच्छे चाल-चलन’ वाला कैदी है. जिस व्यक्ति पर अपनी ही दो साध्वियों के साथ दुष्कर्म का दोष सिद्ध हो चुका हो… जिसने एक पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या करवाई हो और जो अपने ही मैनेजर की हत्या का दोषी हो… उसका ‘चाल-चलन’ अच्छा कैसे हो सकता है? अगर हत्या और बलात्कार करने वाला व्यक्ति ‘हार्डकोर क्रिमिनल’ नहीं है, तो फिर इस परिभाषा में कौन आता है? क्या कानून की नजर में अपराध की गंभीरता अपराधी के रसूख के आगे बौनी हो जाती है?
न्याय का मजाक और पीड़ितों का दर्द
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने पहले भी राम रहीम के पैरोल पर सवाल उठाते हुए कहा था कि राम रहीम कोई सामान्य कैदी नहीं, बल्कि एक हार्ड क्रिमिनल है, जिसे इस तरह की रियायतें नहीं मिलनी चाहिए. अंशुल का दर्द सिर्फ उनका नहीं, बल्कि हर उस नागरिक का है जो न्याय व्यवस्था पर भरोसा करता है. जब एक दोषी साल में 90 दिन (जो कि अधिकतम सीमा है) जेल से बाहर बिताता है, तो यह उस लंबी कानूनी लड़ाई का अपमान है जो पीड़ितों ने दशकों तक लड़ी. बार-बार मिलने वाली यह ‘आजादी’ पीड़ितों को डराने और उनके मनोबल को तोड़ने के लिए काफी है. पैरोल कैदी का अधिकार हो सकता है, लेकिन यह ‘विशेषाधिकार’ नहीं बनना चाहिए. राम रहीम को मिल रही यह सुविधाएं यह संदेश देती हैं कि अगर आपके पास ‘वोट बैंक’ की ताकत है, तो सलाखें आपके लिए उतनी मजबूत नहीं हैं जितनी एक आम आदमी के लिए. यह पैरोल सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि उस भरोसे पर चोट है जो आम जनता ‘कानून के राज’ पर करती है. जेल का मतलब ‘प्रायश्चित’ होता है, ‘पिकनिक’ नहीं.


