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सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील पर अभिजीत दिपके का बड़ा सवाल: ‘क्या अपने बच्चों को एक्सपायरी खाना खिलाएंगे?’

by Admin
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अभिजीत दिपके ने हैरानी जताते हुए सरकार और प्रशासन से सवाल किया कि जब बच्चों के लिए भोजन तैयार किया जा रहा है, तो खाद्य सामग्री की एक्सपायरी डेट की जांच करने की जिम्मेदारी किसकी है? उन्होंने मंत्रियों, विधायकों और अधिकारियों से सवाल किया कि क्या वे अपने बच्चों को ऐसी खाद्य सामग्री से बना खाना खिलाना स्वीकार करेंगे।

सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिलने वाले मिड-डे मील की गुणवत्ता और स्कूलों में मौजूद बुनियादी सुविधाओं को लेकर अभिजीत दिपके ने गंभीर सवाल उठाए हैं। दिपके ने एक बयान में दावा किया कि उन्होंने सुबह स्कूल में मिड-डे मील के लिए इस्तेमाल की जा रही खाद्य सामग्री देखी, जिसकी एक्सपायरी डेट छह से सात महीने पहले ही निकल चुकी थी। इस दावे ने स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता और खाद्य सामग्री की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अभिजीत दिपके ने इस स्थिति पर हैरानी जताते हुए सरकार और प्रशासन से सवाल किया कि जब बच्चों के लिए भोजन तैयार किया जा रहा है, तो खाद्य सामग्री की एक्सपायरी डेट की जांच करने की जिम्मेदारी किसकी है? उन्होंने मंत्रियों, विधायकों और अधिकारियों से सवाल किया कि क्या वे अपने बच्चों को ऐसी खाद्य सामग्री से बना खाना खिलाना स्वीकार करेंगे।

‘क्या अपने बच्चों को एक्सपायरी खाना खिलाएंगे?’

अभिजीतदिपके ने अपने बयान में कहा कि सुबह उन्होंने जो स्थिति देखी, उससे वह पूरी तरह हैरान रह गए। उनके मुताबिक, मिड-डे मील में इस्तेमाल होने वाली खाद्य सामग्री कथित तौर पर छह-सात महीने पहले ही एक्सपायर हो चुकी थी।

उनका सवाल सीधे तौर पर उन लोगों से है जो सरकारी स्कूलों और मिड-डे मील व्यवस्था की निगरानी करते हैं। दिपके का कहना है कि बच्चों को दिया जाने वाला भोजन सिर्फ पेट भरने का माध्यम नहीं है, बल्कि उनके स्वास्थ्य और पोषण से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में भोजन तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की गुणवत्ता और उसकी वैधता की नियमित जांच बेहद जरूरी है।

हालांकि, एक्सपायरी खाद्य सामग्री मिलने के दावे की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग की जांच के बाद ही हो सकती है। इसलिए इस मामले में प्रशासन का पक्ष और जांच रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी।

सिर्फ भोजन नहीं, स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं पर भी सवाल

अभिजीत दिपके ने अपने बयान में सरकारी स्कूलों की स्थिति के दूसरे पहलुओं को भी उठाया। उन्होंने कहा कि आज भी कई सरकारी स्कूलों में बच्चों को पीने के पानी, इस्तेमाल करने योग्य शौचालय और बैठने के लिए बेंच जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

उन्होंने सवाल किया कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी अगर सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा साफ पानी के लिए परेशान है, शौचालय की उचित व्यवस्था नहीं है और उसे बैठने के लिए बेंच तक नहीं मिलती, तो फिर शिक्षा व्यवस्था के विकास के दावों का वास्तविक असर जमीन पर कितना पहुंचा है?

दिपके ने इसी संदर्भ में सरकार, जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल उठाया।

बच्चों की शिक्षा के साथ स्वास्थ्य भी जरूरी

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए मिड-डे मील एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है। इसका उद्देश्य बच्चों को स्कूल में भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ उनके पोषण में मदद करना और स्कूल में उनकी उपस्थिति को बढ़ावा देना है।

ऐसे में खाद्य सामग्री की गुणवत्ता से जुड़ी किसी भी शिकायत को गंभीरता से लिया जाना जरूरी है। भोजन में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की खरीद, भंडारण, एक्सपायरी डेट की जांच और वितरण की पूरी प्रक्रिया में निगरानी महत्वपूर्ण होती है।

इसी तरह, पीने का पानी, स्वच्छ शौचालय, पर्याप्त फर्नीचर और सुरक्षित कक्षाएं भी बच्चों के लिए बुनियादी जरूरतें हैं। यदि इनमें कमी रहती है तो इसका सीधा असर बच्चों के स्कूल अनुभव और पढ़ाई के माहौल पर पड़ सकता है।

अब प्रशासन की जांच और जवाब का इंतजार

अभिजीत दिपके के आरोपों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संबंधित विभाग इस मामले की जांच करेगा और यह पता लगाएगा कि कथित तौर पर एक्सपायरी खाद्य सामग्री स्कूल तक कैसे पहुंची?

यदि जांच में खाद्य सामग्री की एक्सपायरी की पुष्टि होती है, तो यह भी तय करना होगा कि इसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर थी और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।

फिलहाल, अभिजीत दिपके के बयान ने मिड-डे मील की गुणवत्ता के साथ-साथ सरकारी स्कूलों में उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक जवाबदेही पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

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