वैशाली। बिहार के वैशाली जिले के भगवानपुर प्रखंड अंतर्गत किरतपुर राजाराम गांव में 9 अगस्त 2026 को एक ऐसी श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई, जिसने सामाजिक कुरीतियों और अनावश्यक खर्च से मुक्ति की दिशा में नई बहस को जन्म दिया। पेरियार दिलीप यादव ने अपने दिवंगत पिता राम एकबाल राय की स्मृति में पारंपरिक मृत्यु भोज के बजाय बौद्ध धम्म विधि से श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया।
कार्यक्रम को मनोज बौद्ध के सहयोग से भंते एम. के. राजन ने बौद्ध धम्म की विधि के अनुसार संपन्न कराया। कार्यक्रम में बिहार के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों से सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, धम्म अनुयायी, वक्ता और बड़ी संख्या में महिला-पुरुष शामिल हुए।

मृत्यु भोज के बजाय सादगीपूर्ण आयोजन
इस आयोजन की सबसे प्रमुख विशेषता यह रही कि दिवंगत व्यक्ति की स्मृति में पारंपरिक मृत्यु भोज का आयोजन नहीं किया गया। इसके स्थान पर लोगों के लिए प्रसाद के रूप में खीर और शाम को खिचड़ी की व्यवस्था की गई।
आयोजकों के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य मृत्यु के बाद होने वाले बड़े खर्च, सामाजिक दबाव और दिखावे से बचते हुए दिवंगत व्यक्ति को सम्मानपूर्वक श्रद्धांजलि देना और समाज में वैकल्पिक परंपराओं को प्रोत्साहित करना था।
कार्यक्रम में मुंडन की परंपरा भी नहीं अपनाई गई। इसके बजाय श्रद्धांजलि, विचार-विमर्श और सामाजिक चेतना को आयोजन का केंद्र बनाया गया।
बुद्ध, आंबेडकर और दिवंगत राम एकबाल राय को श्रद्धांजलि
कार्यक्रम के मंच पर भगवान बुद्ध, बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर और दिवंगत राम एकबाल राय के चित्र रखे गए। उपस्थित लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
पूरे पंडाल को बहुजन महापुरुषों और सामाजिक परिवर्तन से जुड़े महान व्यक्तित्वों के चित्रों से सजाया गया था। इस सजावट के माध्यम से सामाजिक समानता, शिक्षा, मानवतावाद और सामाजिक परिवर्तन के विचारों को सामने रखने का प्रयास किया गया।
कार्यक्रम में शामिल लोगों का पंचशील के पट्टे से सम्मानपूर्वक स्वागत भी किया गया।
देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक
श्रद्धांजलि सभा में अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, वक्ताओं और बुद्धिजीवियों की मौजूदगी रही।
कार्यक्रम में गया के पूर्व विधायक मान्यवर सतीश दास, मुंबई से शूद्र शिव शंकर यादव, आगरा से प्रो. नागेंद्र प्रसाद यादव (PhD), कबीर पंथी रामाशंकर साहेब, पटना हाई कोर्ट के अधिवक्ता अरुण मौर्या, डॉ. मुंशी प्रसाद, डॉ. यशपाल, जया यशपाल, गोरखपुर से जादूगर अशोक यादव, बेगूसराय से भंते बुद्ध प्रकाश, रंजीत राज सहित बड़ी संख्या में सामाजिक चिंतक और वक्ता उपस्थित रहे।

परंपरा बनाम सामाजिक सुधार की बहस
मृत्यु भोज भारतीय समाज के कई हिस्सों में लंबे समय से चली आ रही परंपरा है। हालांकि, इसके स्वरूप और सामाजिक प्रभाव को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। कई सामाजिक संगठन और सुधारवादी विचारधाराएं मृत्यु के बाद होने वाले अनावश्यक खर्च, दिखावे और सामाजिक दबाव को कम करने की बात करती रही हैं।
किरतपुर राजाराम में आयोजित यह कार्यक्रम इसी विमर्श को आगे बढ़ाने वाला प्रयास बताया गया। आयोजकों ने मृत्यु के बाद खर्चीले भोज के स्थान पर श्रद्धांजलि, धम्म, सामाजिक जागरूकता और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देने का संदेश दिया।
परिवार से शुरू होकर समाज तक पहुंचने वाली पहल
दिवंगत राम एकबाल राय की स्मृति में आयोजित यह सभा केवल पारिवारिक श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रही। इसे सामाजिक बदलाव और वैकल्पिक परंपराओं को सामने रखने के अवसर के रूप में भी देखा गया।
कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके सम्मान का आधार बड़ा भोज या आर्थिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उसके प्रति सम्मान, परिवार के प्रति संवेदना और समाज के प्रति सकारात्मक योगदान भी हो सकता है।
सामाजिक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश
किरतपुर राजाराम का यह आयोजन इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यहां शोक की पारंपरिक अभिव्यक्ति के बजाय सादगी, बौद्ध धम्म और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखा गया।
मृत्यु भोज का खर्च बचाकर उसे शिक्षा, सामाजिक कार्य, जरूरतमंदों की मदद या अन्य जनहितकारी कार्यों में लगाने की सोच को बढ़ावा देना भविष्य में सामाजिक सुधार की दिशा में उपयोगी कदम साबित हो सकता है।
हालांकि किसी भी सामाजिक परंपरा में बदलाव व्यापक सामाजिक संवाद और स्थानीय समुदाय की स्वीकृति से ही स्थायी रूप लेता है, लेकिन इस तरह के व्यक्तिगत प्रयास उस संवाद की शुरुआत जरूर कर सकते हैं।
किरतपुर राजाराम की यह श्रद्धांजलि सभा इसलिए चर्चा में है कि यहां शोक को भोज और दिखावे से नहीं, बल्कि विचार, सादगी और सामाजिक चेतना से जोड़ने का प्रयास किया गया।