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सिंधु पर डायमर-भाषा बांध से बौद्ध विरासत पर संकट, भारत ने भी जताया कड़ा विरोध

by Admin
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इस्लामाबाद/गिलगित-बाल्टिस्तान: पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में सिंधु नदी पर निर्माणाधीन डायमर-भाषा बांध एक बार फिर विवादों में है। इस मेगा हाइड्रो प्रोजेक्ट को लेकर पर्यावरण और जल विशेषज्ञों के साथ-साथ पुरातत्व एवं सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विशेषज्ञ भी चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि बांध के कारण ऊपरी सिंधु घाटी में मौजूद हजारों साल पुरानी बौद्ध विरासत और ऐतिहासिक शिलालेखों को भारी नुकसान पहुंच सकता है।

यह इलाका प्राचीन सिल्क रूट का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। सदियों तक इस मार्ग के जरिए भारत, चीन, मध्य एशिया और फारस के बीच व्यापार के साथ-साथ धर्म, संस्कृति और विचारों का आदान-प्रदान हुआ। ऊपरी सिंधु नदी के आसपास आज भी बड़ी संख्या में प्राचीन शिलालेख, चट्टानी चित्र और बौद्ध स्मारकों के अवशेष मौजूद हैं।

पानी में समा सकती है प्राचीन विरासत

विशेषज्ञों के मुताबिक डायमर-भाषा बांध के जलाशय के निर्माण से बड़ी संख्या में पुरातात्विक स्थल प्रभावित हो सकते हैं। खास चिंता उन प्राचीन शिलालेखों को लेकर है, जिनमें ब्राह्मी, तिब्बती और अन्य प्राचीन लिपियों का इस्तेमाल हुआ है।

इतिहासकारों के लिए ये शिलालेख सिर्फ पत्थरों पर लिखे शब्द नहीं हैं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रसार, प्राचीन व्यापार मार्गों और विभिन्न सभ्यताओं के बीच संपर्क को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि एक बार ये स्थल जलमग्न हो गए तो उनका मूल संदर्भ और ऐतिहासिक महत्व हमेशा के लिए खो सकता है।

तक्षशिला को लेकर भी चिंता

पाकिस्तान की बौद्ध विरासत का सबसे प्रसिद्ध केंद्र तक्षशिला है। यह प्राचीन शहर दक्षिण एशिया के इतिहास में शिक्षा, व्यापार और बौद्ध संस्कृति के प्रमुख केंद्र के रूप में जाना जाता है।

विरासत संरक्षण को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच विशेषज्ञों का सवाल है कि जब तक्षशिला जैसे अपेक्षाकृत चर्चित और पहुंच में मौजूद ऐतिहासिक स्थल भी संरक्षण की चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तो दूरदराज के गिलगित-बाल्टिस्तान में स्थित पुरातात्विक स्थलों को बड़े बांध की परियोजना से कैसे सुरक्षित रखा जाएगा।

विशेषज्ञों ने जताई संतुलन की जरूरत

विरासत विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान के लिए जल संसाधनों और ऊर्जा की जरूरत महत्वपूर्ण है, लेकिन विकास परियोजनाओं के साथ ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण का संतुलन भी जरूरी है।

जल विशेषज्ञों के अनुसार सिंधु नदी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, कृषि और पारिस्थितिकी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। नदी के प्रवाह में बड़े बदलाव का असर केवल पानी और खेती पर ही नहीं पड़ता, बल्कि नदी घाटी में मौजूद ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों पर भी पड़ सकता है।

विशेषज्ञों ने पुरातात्विक स्थलों का व्यापक सर्वेक्षण, डिजिटल दस्तावेजीकरण और संरक्षण के ठोस उपाय किए जाने की जरूरत बताई है।

भारत का भी कड़ा विरोध

डायमर-भाषा बांध को लेकर भारत का विरोध एक अलग और महत्वपूर्ण पहलू है। भारत गिलगित-बाल्टिस्तान को जम्मू-कश्मीर का हिस्सा मानता है और पाकिस्तान के कब्जे वाले इस क्षेत्र में किसी भी तरह की ऐसी परियोजना का विरोध करता है।

भारत का कहना है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में पाकिस्तान या किसी तीसरे देश द्वारा कराया जा रहा निर्माण कार्य भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ी चिंताओं को जन्म देता है। चीन की भागीदारी वाले बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स को लेकर भी भारत ने लगातार आपत्ति जताई है।

विकास बनाम विरासत की बड़ी चुनौती

डायमर-भाशा बांध अब केवल बिजली, पानी और विकास की परियोजना नहीं रह गया है। इसके साथ एक बड़ा सवाल यह भी जुड़ गया है कि क्या आधुनिक विकास की कीमत हजारों साल पुरानी सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को खोकर चुकाई जाएगी?

विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यदि बांध से प्रभावित होने वाले पुरातात्विक स्थलों का समय रहते वैज्ञानिक तरीके से दस्तावेजीकरण और संरक्षण नहीं किया गया, तो सिंधु घाटी की बौद्ध विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दब सकता है।

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