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जेएनयू पीएचडी प्रवेश में आरक्षित सीटों की कटौती पर भारी बवाल; बीएपीएसए का अनिश्चितकालीन धरना जारी, सांख्यिकीय और ऐतिहासिक आंकड़ों ने खोली प्रशासन की पोल

by Admin
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नई दिल्ली:
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में शैक्षणिक सत्र 2026-27 के पीएचडी प्रवेश में संवैधानिक आरक्षण नीतियों के कथित उल्लंघन और आरक्षित सीटों में की गई भारी कटौती को लेकर छात्र संगठनों का विरोध प्रदर्शन लगातार उग्र होता जा रहा है. बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन (BAPSA) के नेतृत्व में छात्रों का अनिश्चितकालीन धरना छठे दिन भी जारी रहा. इसके साथ ही ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और राष्ट्रीय आयोगों को विस्तृत सांख्यिकीय डेटा सौंपकर विश्वविद्यालय प्रशासन पर पिछले कई वर्षों से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और दिव्यांग (PwBD) श्रेणी के छात्रों की सीटों को व्यवस्थित रूप से कम करने का गंभीर आरोप लगाया है.

छात्र संगठनों द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए जेएनयू द्वारा कुल 711 नियमित पीएचडी सीटों के लिए ई-प्रोस्पेक्टस जारी किया गया है. केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम, 2006 के वैधानिक नियमों के तहत इन सीटों पर श्रेणीवार जो कोटा तय होना चाहिए था, और जो वास्तव में विज्ञापित किया गया है, उसमें सीटों की भारी कटौती सामने आई है. तय नियम के अनुसार कुल 711 सीटों का 7.5% यानी लगभग 53 सीटें एसटी वर्ग के लिए होनी चाहिए थीं, लेकिन प्रोस्पेक्टस में केवल 38 सीटें ही दी गई हैं, जिससे सीधे तौर पर 15 सीटें गायब कर दी गई हैं. इसी तरह अनुसूचित जाति (SC) के लिए तय 15% कोटे के मुताबिक कुल 107 सीटें आरक्षित होनी चाहिए थीं, परंतु केवल 103 सीटों को ही सीट मैट्रिक्स में जगह मिली है, यानी यहाँ भी 4 सीटें कम हैं. सबसे बड़ी कटौती दिव्यांग (PwBD) वर्ग में देखी गई है, जहां शारीरिक रूप से अक्षम उम्मीदवारों के लिए कम से कम 36 सीटें अनिवार्य थीं, लेकिन प्रशासन ने केवल 17 सीटें ही विज्ञापित की हैं, जिससे 19 सीटों का भारी शॉर्टफॉल दिखाई दे रहा है.

एआईएसए (AISA) द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को भेजे गए शिकायती पत्र में जेएनयू के पिछले छह प्रवेश चक्रों (मानसून 2022 से मानसून 2026) का एक ऐतिहासिक और तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, जिसके अनुसार इस अवधि के दौरान विश्वविद्यालय द्वारा कुल 4,288 पीएचडी सीटों का विज्ञापन निकाला गया था. यदि इन सभी वर्षों में आरक्षण के नियमों को पूरी तरह लागू किया जाता, तो एससी वर्ग को 643 और एसटी वर्ग को 322 सीटें मिलनी चाहिए थीं, लेकिन वास्तव में इस समय सीमा के भीतर एससी को केवल 601 और एसटी को मात्र 278 सीटें आवंटित की गईं, जिसका सीधा मतलब है कि बीते कुछ वर्षों में ही हाशिए पर मौजूद इन समुदायों की कुल 86 सीटें (42 एससी और 44 एसटी) जेएनयू के पीएचडी दाखिलों से गायब कर दी गईं.

छात्र नेताओं ने जेएनयू प्रशासन द्वारा अपनाई जाने वाली ‘माइक्रो-यूनिट’ सीट आवंटन प्रणाली को इस कटौती का मुख्य कारण बताया है, जिसके तहत आरक्षण प्रतिशत को पूरी यूनिवर्सिटी के बजाय व्यक्तिगत केंद्रों या छोटे विभागों के स्तर पर लागू किया जाता है. जब किसी विभाग में केवल 1 या 2 सीटें ही निकलती हैं, तो एसटी का हिस्सा दशमलव में आता है, जिसे प्रशासन द्वारा राउंड-ऑफ करके हमेशा ‘शून्य’ कर दिया जाता है. यही वजह है कि चालू सत्र के कुल 84 पीएचडी कार्यक्रमों में से 56 कार्यक्रमों में एसटी वर्ग के लिए एक भी सीट नहीं बची है. इस गंभीर विसंगति पर संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) ने जेएनयू प्रशासन को एक कड़ा अल्टीमेटम जारी किया है और चल रही साक्षात्कार (Viva-Voce) प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले इन कम की गई सीटों पर जवाब तलब किया है. आंदोलनकारी छात्रों की स्पष्ट मांग है कि चल रहे पीएचडी साक्षात्कारों को तुरंत रोका जाए, पूरी आरक्षण रोस्टर प्रणाली को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक किया जाए और रोहिता वेमुला न्याय अधिनियम (Rohith Act) व सुखदेव थोरात समिति की सिफारिशों को लागू कर सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जाए.

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