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‘जहां लोकतंत्र नहीं, वहां एंटी-इन्कंबेंसी भी नहीं’, राहुल गांधी का बड़ा हमला; CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

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राहुल गांधी ने दावा किया कि भारत में सरकारों के खिलाफ बनने वाली एंटी-इन्कंबेंसी लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण ताकत है। उन्होंने सवाल उठाया कि हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में लंबे समय से सत्ता में रहने के बावजूद एंटी-इन्कंबेंसी कमजोर कैसे हो गई।

नई दिल्ली। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को चुनावी व्यवस्था, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर केंद्र सरकार तथा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला। करीब सवा घंटे की देरी से शुरू हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि देश में चुनावी प्रक्रिया और वोट की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उन्होंने कहा कि मामला केवल चुनाव में छोटी-मोटी गड़बड़ी का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के बुनियादी ढांचे से जुड़ा है।

राहुल गांधी ने दावा किया कि भारत में सरकारों के खिलाफ बनने वाली एंटी-इन्कंबेंसी लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण ताकत है। उन्होंने सवाल उठाया कि हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में लंबे समय से सत्ता में रहने के बावजूद एंटी-इन्कंबेंसी कमजोर कैसे हो गई।

उन्होंने इसी संदर्भ में कहा कि जहां लोकतंत्र कमजोर या अनुपस्थित होता है, वहां एंटी-इन्कंबेंसी भी दिखाई नहीं देती। राहुल ने इराक और उत्तर कोरिया का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां चुनावी लोकतंत्र की स्थिति अलग है और इसलिए वहां एंटी-इन्कंबेंसी की सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया नहीं दिखाई देती।

‘वोट कमजोर हुआ तो संविधान भी कमजोर होगा’

राहुल गांधी ने अपने हमले को केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने वोट, संविधान, कानून और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संबंध बताते हुए कहा कि यदि लोगों के वोट की ताकत कमजोर होती है तो संविधान और उसके आधार पर काम करने वाली संस्थाएं भी कमजोर हो सकती हैं।

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की मूल जिम्मेदारी लोगों के वोट की सुरक्षा करना है। राहुल ने दावा किया कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में गड़बड़ियों को लेकर उनके पास पर्याप्त तथ्य और सबूत हैं और आने वाले समय में वह इन्हें सार्वजनिक करेंगे।

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से तत्काल इस्तीफा देने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के भीतर उठे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यह विवाद उस रिपोर्ट के बाद और तेज हुआ है जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम-से-कम 14 बार आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट में ये आपत्तियां मतदाता सूची, SIR और मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया से जुड़े मामलों को लेकर बताई गई हैं।

राहुल गांधी ने इन कथित मतभेदों को चुनावी व्यवस्था की गंभीर समस्या से जोड़ते हुए कहा कि अगर वोट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं तो उसका असर लोकतंत्र की पूरी श्रृंखला पर पड़ता है।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने इन दावों को अलग तरीके से देखा है। आयोग का कहना है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग विचार और आपत्तियां सामने आना आंतरिक checks and balances का सामान्य हिस्सा है। आयोग ने यह भी कहा कि SIR समेत संबंधित फैसले अंततः सर्वसम्मति से लिए गए।

भाजपा ने भी विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर चर्चा या अलग राय होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक नहीं है।

‘वोट चोरी’ से ‘कानून चोरी’ तक राहुल का तर्क

राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक व्यापक राजनीतिक तर्क रखा। उनका कहना था कि यदि किसी चुनाव में मतदाताओं के वोट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा होता है तो उस चुनाव से बनी संसद और सरकार की वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं।

उन्होंने इसी क्रम में कहा कि वोट कमजोर होने के बाद कानून और फिर लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने का खतरा पैदा होता है। राहुल गांधी ने इसे केवल चुनावी विवाद नहीं बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे से जुड़ा मुद्दा बताया।

मोदी-शाह पर भी लगाए गंभीर आरोप

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि चुनावी व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों की जांच होने पर इन दोनों नेताओं की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी।

हालांकि ये राहुल गांधी द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोप हैं, जिनका भाजपा समर्थन नहीं करती। भाजपा और चुनाव आयोग दोनों ने विपक्ष के चुनावी प्रक्रिया को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को खारिज किया है।

विवाद की शुरुआत कहां से हुई?

मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़ी रिपोर्ट है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि दो चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। इसके बाद विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उनके इस्तीफे और जांच की मांग तेज कर दी।

कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा बताया है। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि आंतरिक deliberations में अलग-अलग विचार होना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम फैसले नियमानुसार लिए गए।

राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले सोशल मीडिया पर लिखा था कि “संविधान के दुश्मनों का पर्दाफाश हो गया है” और वह शाम को प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए इस मुद्दे पर बात करेंगे। बाद में उन्होंने चुनावी व्यवस्था को लेकर अपने पुराने ‘वोट चोरी’ के आरोपों को फिर दोहराया।

अब इस पूरे विवाद का केंद्र यह है कि चुनाव आयोग के भीतर दर्ज कथित आपत्तियों और SIR से जुड़े सवालों की वास्तविक प्रकृति क्या है, चुनाव आयोग की आंतरिक प्रक्रिया किस तरह चली और विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों के समर्थन में पेश किए जाने वाले दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच से क्या सामने आता है।

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