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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद भी चुनाव आयोग की अपनी जिद! वोटर लिस्ट से नाम कटे तो पुराने मतदाता भी भरें Form-6, 19 नवंबर को फिर होगी सुनवाई

by Admin
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दिल्ली SIR विवाद में चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव के हालात? 28 अक्टूबर को कोर्ट ने Form-8 का विकल्प सुझाया, 3 नवंबर को आयोग ने Form-6 पर जारी किया नया स्पष्टीकरण। अब सवाल—क्या पुराने मतदाताओं को नए वोटर की तरह आवेदन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है?

नई दिल्ली। दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है। सवाल यह है कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज थे, लेकिन SIR के दौरान ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए, उन्हें दोबारा नाम जुड़वाने के लिए नए मतदाताओं वाला Form-6 क्यों भरना पड़ रहा है?

दरअसल, 28 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से सवाल किए थे। अदालत ने मौखिक टिप्पणियों में कहा था कि जो मतदाता पहले से 2026 की वोटर लिस्ट में शामिल थे और केवल पता बदलने या अन्य कारणों से सूची से बाहर हुए हैं, उनके लिए Form-8 या एन्यूमरेशन फॉर्म का विकल्प उपलब्ध कराया जाना चाहिए। अदालत ने Form-6 के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए थे।

3 नवंबर को चुनाव आयोग का नया स्पष्टीकरण

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के कुछ दिन बाद, 3 नवंबर को चुनाव आयोग ने नया स्पष्टीकरण जारी किया। इसमें कहा गया कि जिन लोगों का नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में नहीं है, वे Form-6 भरकर अंतिम मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह व्यवस्था पहले से मतदाता रह चुके लोगों पर भी लागू होगी।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पहले से मतदाता सूची में नाम होने और अब Form-6 भरने के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ झूठी घोषणा का मामला नहीं बनाया जाएगा। हालांकि, इसके लिए यह शर्त है कि उसका नाम किसी अन्य लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में पहले से दर्ज न हो और आवेदन कानूनी शर्तों के अनुरूप हो।

4 नवंबर को फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

चुनाव आयोग के इस स्पष्टीकरण पर 4 नवंबर को अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठाए। उन्होंने याचिकाकर्ताओं अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी की ओर से दलील दी कि आयोग का 3 नवंबर का स्पष्टीकरण 28 अक्टूबर को अदालत की ओर से की गई टिप्पणियों के विपरीत है।

उन्होंने कहा कि पहले से मतदाता रहे लोगों को नए मतदाता की तरह Form-6 भरने के लिए बाध्य करने के बजाय Form-8 या एन्यूमरेशन फॉर्म के जरिए नाम बहाल करने का रास्ता दिया जाना चाहिए।

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से कहा कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है, अदालत मामले को देख रही है। पीठ ने याचिकाकर्ताओं से आयोग के नए स्पष्टीकरण को रिकॉर्ड पर लाने के लिए उचित आवेदन दाखिल करने को कहा और अगली सुनवाई 19 नवंबर तय कर दी।

अब सबसे बड़ा सवाल—जवाबदेही किसकी?

दिल्ली SIR के दौरान ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 47.56 लाख नाम बाहर हुए हैं। ऐसे में यह विवाद केवल फॉर्म भरने की प्रक्रिया का नहीं, बल्कि लाखों नागरिकों के मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया में उनकी भागीदारी से जुड़ा है।

सवाल उठ रहे हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही Form-6 के इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए Form-8 और एन्यूमरेशन फॉर्म का विकल्प सुझाया था, तो चुनाव आयोग ने 3 नवंबर को अलग स्पष्टीकरण क्यों जारी किया?

क्या चुनाव आयोग अदालत की टिप्पणियों की भावना के अनुरूप काम कर रहा है? क्या पुराने मतदाताओं की सुविधा और उनके मताधिकार की सुरक्षा को पर्याप्त प्राथमिकता दी जा रही है? और क्या 19 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट इस विवाद पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश देगा?

फिलहाल, अदालत ने चुनाव आयोग के नए स्पष्टीकरण की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। अब सबकी नजरें 19 नवंबर की सुनवाई पर टिकी हैं।

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