Home » CJI से मिलने की मांग खारिज, अब सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे राहुल गांधी; SIR और ‘वोट चोरी’ पर आर-पार की लड़ाई

CJI से मिलने की मांग खारिज, अब सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे राहुल गांधी; SIR और ‘वोट चोरी’ पर आर-पार की लड़ाई

by Admin
0 comments 41 views

विपक्षी नेताओं को CJI से नहीं मिला मिलने का समय, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने ज्ञापन सौंपने के लिए मांगी थी मुलाकात; SIR रोकने, CEC के इस्तीफे और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग को लेकर बढ़ा टकराव

नई दिल्ली। देश में कथित ‘वोट चोरी’, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच विपक्ष और न्यायपालिका के बीच मुलाकात को लेकर नया घटनाक्रम सामने आया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने INDIA ब्लॉक के नेताओं के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करने और अपनी मांगों को लेकर याचिका दाखिल करने की बात कही है। वहीं, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया है कि विपक्ष की ओर से मुलाकात का अनुरोध मिलने के बाद उन्होंने जवाब दे दिया था कि किन कारणों से वह मुलाकात नहीं कर पाएंगे।

इस घटनाक्रम ने चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता, संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार को लेकर जारी बहस को और तेज कर दिया है।

CJI ने कहा—मुलाकात नहीं कर पाने की वजह पहले ही बता दी थी

मीडिया के सामने आए CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें विपक्षी नेताओं की ओर से मुलाकात का अनुरोध करने वाला पत्र मिला था। उन्होंने बताया कि वह इसका जवाब पहले ही दे चुके हैं और पत्र में मुलाकात नहीं कर पाने के कारणों का उल्लेख किया गया था।

CJI ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। हालांकि, किसी विशेष प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात और किसी मामले की न्यायिक सुनवाई अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। मुलाकात के लिए समय नहीं मिल पाने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के तहत अपनी बात रखने का अधिकार खो देता है।

विपक्षी नेताओं की मांग थी कि वे CJI को एक ज्ञापन सौंपकर चुनाव प्रक्रिया से जुड़े अपने सवालों और चिंताओं से अवगत कराएं।

राहुल गांधी और खरगे ने मांगा था मिलने का समय

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने CJI जस्टिस सूर्यकांत को पत्र लिखकर सोमवार शाम चार से पांच बजे के बीच मुलाकात का समय मांगा था।

विपक्षी नेता उन्हें एक ज्ञापन सौंपना चाहते थे। इसमें कथित वोट चोरी को रोकने, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को रोकने और चुनाव में दोबारा मतपत्र प्रणाली अपनाने जैसी मांगें शामिल थीं।

विपक्ष का तर्क है कि मतदाता सूची की शुद्धता और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता लोकतंत्र में जनता के विश्वास के लिए जरूरी है। वहीं, इन मांगों पर निर्वाचन आयोग और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा। वोट चोरी से जुड़े आरोपों को स्थापित तथ्य मानने के बजाय उनकी जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आकलन किया जाना आवश्यक है।

अब याचिका के जरिए अपनी बात रखेगा विपक्ष?

CJI से मुलाकात नहीं हो पाने के बाद राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करने और याचिका दाखिल करने की बात कही है। इससे संकेत मिलता है कि विपक्ष अपनी मांगों को राजनीतिक विरोध तक सीमित रखने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से भी उठाना चाहता है।

हालांकि, याचिका में कौन-कौन से मुद्दे शामिल होंगे, किन पक्षों को प्रतिवादी बनाया जाएगा और अदालत से किस तरह की राहत मांगी जाएगी, इसका स्पष्ट विवरण सामने आने के बाद ही मामले की कानूनी दिशा का आकलन किया जा सकेगा।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी याचिका का दाखिल होना और अदालत द्वारा उसमें मांगी गई राहत स्वीकार करना दो अलग-अलग बातें हैं। अदालत संबंधित कानून, उपलब्ध तथ्यों और अपने अधिकार क्षेत्र के आधार पर निर्णय लेती है।

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर भी CJI ने रखी बात

CJI सूर्यकांत ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सुप्रीम कोर्ट दौरे को रद्द किए जाने पर भी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने बताया कि इस मामले में हितों के टकराव की संभावना को लेकर अधिक कारण थे। इसी वजह से प्रशासनिक स्तर पर विचार-विमर्श करना पड़ा। उनके अनुसार, उनके और वरिष्ठ न्यायिक सहयोगियों की सामूहिक राय थी कि हितों के टकराव की किसी भी संभावित स्थिति से बचा जाना चाहिए।

यह टिप्पणी न्यायपालिका की संस्थागत निष्पक्षता और उसकी स्वतंत्रता को बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करती है। हालांकि, JPC के दौरे से संबंधित निर्णय और विपक्ष की मुलाकात की मांग दो अलग-अलग प्रसंग हैं।

प्रदर्शन स्थल और विरोध के अधिकार पर भी सवाल

विपक्ष के इस कदम के बीच दिल्ली में प्रदर्शन-पाबंदियों और जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शनों को लेकर जारी बहस भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी प्रदर्शन के लिए स्थान, अनुमति या अन्य प्रशासनिक शर्तों को लेकर विवाद है, तो उसका आकलन संबंधित आदेशों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर किया जाना चाहिए।

इस संदर्भ में यह सवाल उठता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध दर्ज कराने के लिए राजनीतिक दलों और नागरिकों के पास प्रभावी तथा कानूनी रास्ते कितने सुलभ हैं। साथ ही, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की प्रशासनिक जिम्मेदारी और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाता है, यह भी चर्चा का विषय है।

हालांकि, CJI की ओर से प्रदर्शन-पाबंदियों पर दिए गए कथित बयान का सटीक संदर्भ और आधिकारिक शब्दावली उपलब्ध होने पर ही उसकी विस्तृत व्याख्या की जा सकती है।

सबसे बड़ा सवाल: चुनावी पारदर्शिता पर भरोसा कैसे कायम होगा?

विपक्ष की मांगें अब चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़ी व्यापक बहस का हिस्सा बन गई हैं। एक ओर विपक्ष मतदाता सूची के पुनरीक्षण, कथित वोट चोरी और निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी ओर इन आरोपों की पुष्टि या खंडन तथ्यों, दस्तावेजों और उचित कानूनी प्रक्रिया के जरिए ही संभव है।

CJI से मुलाकात नहीं हो पाने के बाद अब सबकी नजर विपक्ष के अगले कदम और संभावित याचिका पर रहेगी। यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि अदालत के समक्ष कौन-से ठोस मुद्दे रखे जाते हैं और उन पर क्या कानूनी कार्रवाई होती है।

फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम का केंद्रीय प्रश्न यही है कि चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा मजबूत करने के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की दिशा में राजनीतिक दलों तथा संबंधित संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका क्या होगी।

You may also like

Leave a Comment