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‘ पत्नी के घर संभालने के कार्य को अनप्रॉडक्टिव समझना अवास्तविक ‘, महिला को बेरोजगार कहने पर हाईकोर्ट की दो टूक

‘ पत्नी के घर संभालने के कार्य को अनप्रॉडक्टिव समझना अवास्तविक ‘, महिला को बेरोजगार कहने पर हाईकोर्ट की दो टूक

दिल्ली हाई कोर्ट ने खाली बैठी पत्नी के मिथक को तोड़ते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि गृहिणी का घरेलू श्रम ही पति को बाहर कमाने के योग्य बनाता है इसलिए इसे आलस्य कहना गलत है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने खाली बैठी पत्नी के मिथक को तोड़ते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि गृहिणी का घरेलू श्रम ही पति को बाहर कमाने के योग्य बनाता है इसलिए इसे आलस्य कहना गलत है. अदालत के अनुसार भरण-पोषण तय करते समय पत्नी के गैर-वित्तीय योगदान और आर्थिक मूल्य को पहचानना अनिवार्य है. घर संभालने वाली महिला के श्रम को नजरअंदाज करना पूरी तरह अन्यायपूर्ण और अवास्तविक है.

एक घर को संभालने वाली पत्नी कभी खाली नहीं बैठती. वह उस अदृश्य श्रम को अंजाम देती है जो घर की आर्थिक धुरी को थामे रखता है. दिल्ली हाई कोर्ट की यह टिप्पणी उन लाखों महिलाओं के सम्मान में एक ऐतिहासिक गर्जना है जिन्हें समाज अक्सर बेरोजगार या पति पर निर्भर कहकर उनके वजूद को कमतर आंकता है. अदालत ने साफ कर दिया है कि घरेलू काम को आलस्य समझना न केवल संकीर्ण मानसिकता है बल्कि न्याय के सिद्धांतों के भी खिलाफ है.
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 16 फरवरी 2026 को दिए एक फैसले में खाली बैठी पत्नी के मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया. अदालत ने कहा कि जब भरण-पोषण तय करने की बात आती है तो पत्नी के उस योगदान को नजरअंदाज करना अन्यायपूर्ण होगा जो उसने विवाह के दौरान घर को सुचारू रूप से चलाने के लिए दिया है.

  1. बेरोजगारी का मतलब आलस्य नहीं
    अदालत ने माना कि एक पत्नी का रोजगार में न होना उसकी सचेत निर्भरता या आलस्य नहीं है. जस्टिस शर्मा ने कहा, “यह मान लेना कि गैर-कमाऊ जीवनसाथी खाली है, घरेलू योगदान की गलत समझ को दर्शाता है. गैर-रोजगार को आलस्य कहना आसान है लेकिन एक घर को चलाने में लगने वाले श्रम को पहचानना कहीं अधिक कठिन है
  2. पति की सफलता में पत्नी का आर्थिक योगदान
    कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एक गृहिणी वह श्रम करती है जो कमाने वाले साथी को प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम बनाता है. यदि पत्नी घर की जिम्मेदारियां न संभाले तो पति के लिए बाहर जाकर पैसा कमाना असंभव होगा. इसलिए भरण-पोषण की राशि तय करते समय कानून को न केवल वित्तीय आय बल्कि घरेलू संबंधों के दौरान किए गए आर्थिक मूल्य के योगदान को भी मान्यता देनी चाहिए.
  3. कानूनी मान्यता की आवश्यकता
    जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि रखरखाव के दावों का फैसला करते समय वास्तविक परिस्थितियों को देखना होगा. पत्नी के घर संभालने के कार्य को अनप्रॉडक्टिव समझना अवास्तविक है. अदालत का यह रुख आने वाले समय में वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण के मामलों में एक नजीर बनेगा.

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