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जावेद अख्तर का तालिबान पर हमला: धर्म की आड़ में महिलाओं पर हिंसा अमानवीय!

जावेद अख्तर का तालिबान पर हमला: धर्म की आड़ में महिलाओं पर हिंसा अमानवीय!

बॉलीवुड के प्रसिद्ध गीतकार, पटकथा लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता जावेद अख्तर ने अफगानिस्तान में तालिबान शासन द्वारा लागू किए गए नए दंड संहिता की तीखी आलोचना की है। इस कानून में घरेलू हिंसा को कुछ शर्तों के साथ वैध ठहराया गया है, जिसे अख्तर ने धर्म की आड़ में इंसानियत का अपमान करार दिया। उन्होंने भारतीय मुसलमानों के मौलवियों और मुफ्तियों से अपील की है कि वे इस कानून की बिना शर्त निंदा करें, क्योंकि यह सब उनके धर्म के नाम पर किया जा रहा है।

तालिबान की नई दंड संहिता: महिलाओं के अधिकारों पर प्रहार

  • तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबातुल्लाह अखुंदजादा द्वारा हस्ताक्षरित यह 90 पेज की दंड संहिता अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति को और बदतर बनाने वाली साबित हो रही है। कानून के अनुसार, यदि पति अपनी पत्नी को मारता है, लेकिन इससे हड्डी न टूटे या कोई खुला घाव न हो, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा। इतना ही नहीं, पीड़ित महिला को खुद यह साबित करना होगा कि कोई गंभीर चोट नहीं लगी है, अन्यथा दंड से बचाव मुश्किल होगा। इसके अलावा, यदि कोई महिला अपने पति की अनुमति के बिना अपने मायके या माता-पिता के घर जाती है, तो उसे तीन महीने की जेल की सजा हो सकती है।

यह कानून 2009 के EVAW (Elimination of Violence Against Women) कानून को पूरी तरह से निष्प्रभावी बना देता है, जो महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए बनाया गया था। अब महिलाओं के लिए न्याय प्राप्त करना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है, क्योंकि घरेलू हिंसा को सरकारी स्तर पर मान्यता मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी व्यापक निंदा हो रही है, क्योंकि यह महिलाओं को गुलामी और दमन की ओर धकेलता है

जावेद अख्तर की प्रतिक्रिया: सोशल मीडिया पर सख्त अपील

जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी पोस्ट में इस कानून को भयावह बताते हुए लिखा: “Talibans have legalised wife beating but with out any bone fracture. If a wife goes to her parent place with out the husband’s permission , she will be jailed for three months . I beseech the Mufties and mullas Of India to condemn it unconditionally because it all is being done in the name of their religion।” (तालिबान ने पत्नी की पिटाई को वैध कर दिया है, लेकिन बिना किसी हड्डी टूटने के। यदि पत्नी पति की अनुमति के बिना अपने माता-पिता के घर जाती है, तो उसे तीन महीने की जेल होगी। मैं भारत के मुफ्तियों और मौलवियों से निवेदन करता हूं कि वे इसकी बिना शर्त निंदा करें, क्योंकि यह सब उनके धर्म के नाम पर किया जा रहा है।)

अख्तर ने इस पोस्ट में जोर दिया कि यह कानून न केवल महिलाओं के खिलाफ एक सामाजिक चुनौती है, बल्कि धार्मिक व्याख्या की आड़ में मानवता का अपमान है। उन्होंने पूरे धार्मिक समुदाय से इस तरह के नियमों का विरोध करने की अपील की, ताकि धर्म के नाम पर ऐसी अमानवीय प्रथाओं को रोका जा सके।

विश्लेषकों और अन्य हस्तियों की राय

विश्लेषकों का मानना है कि यह दंड संहिता महिलाओं के कानूनी अधिकारों को कमजोर करती है और घरेलू हिंसा जैसी कुप्रथाओं को सरकारी समर्थन प्रदान करती है। इससे अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति और दयनीय हो गई है, जहां पहले से ही शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्रता पर पाबंदियां हैं। बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने भी इसकी निंदा की है, इसे “पूर्णतः घृणित” बताते हुए। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस कानून को महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने वाला करार दिया है।

निष्कर्ष: वैश्विक स्तर पर विरोध की जरूरत

यह घटना एक बार फिर तालिबान शासन की महिलाविरोधी नीतियों को उजागर करती है। जावेद अख्तर जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों की आवाज से उम्मीद है कि यह मुद्दा वैश्विक ध्यान आकर्षित करेगा और अफगान महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए दबाव बनेगा। भारत जैसे देशों में धार्मिक नेताओं की निंदा इस तरह के कानूनों को वैधता देने से रोक सकती है।

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