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बिहार विधानसभा में ब्राह्मणवादी मानसिकता’ पर पर चर्चा, BJP क्यों भड़की?

बिहार विधानसभा में ब्राह्मणवादी मानसिकता’ पर पर चर्चा, BJP क्यों भड़की?

पटना, 20 फरवरी 2026: बिहार विधानसभा के बजट सत्र के 14वें दिन उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव के मुद्दे पर गरमागरम बहस छिड़ गई। भाकपा (माले) के विधायक संदीप सौरभ ने कार्यस्थगन प्रस्ताव के तहत बिहार सरकार से यूजीसी (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस) रेगुलेशंस 2026 को तत्काल लागू करने की मांग की।

संदीप सौरभ ने कहा, “उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। रोहित वेमुला (2016, हैदराबाद यूनिवर्सिटी), पायल तड़वी (2019, मुंबई मेडिकल कॉलेज), दर्शन सोलंकी (2023, आईआईटी मुंबई) जैसी संस्थागत हत्याओं के दर्दनाक उदाहरण हैं। यूजीसी की अपनी रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से 2024 तक ऐसी घटनाओं में 118% की वृद्धि हुई है।”उन्होंने आगे आरोप लगाया कि “ब्राह्मणवादी मानसिकता” से प्रायोजित आंदोलनों के दबाव में सुप्रीम कोर्ट ने इन रेगुलेशंस पर अंतरिम रोक लगा दी, जो उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने और इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर स्थापित करने का प्रावधान करती हैं।

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इस ‘ब्राह्मणवादी मानसिकता’ शब्द पर सत्ता पक्ष भड़क उठा। उपमुख्यमंत्री और बीजेपी नेता विजय कुमार सिन्हा ने तीखा पलटवार करते हुए कहा, “आप लोग जातिवाद का जहर घोलना चाहते हैं। राष्ट्र को कमजोर करना चाहते हैं। यह आपकी सोच को दर्शाता है। मैं खुद भूमिहार ब्राह्मण हूं, मुजफ्फरपुर के टेक्निकल कॉलेज में पढ़ाई की, रैगिंग हुई, हॉस्टल से निकाला गया—फिर भी मैं किसी जाति का अपमान नहीं करता।”विजय सिन्हा ने आगे कहा, “संवैधानिक पद पर बैठे लोग संवैधानिक संस्थाओं के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं। हम हर समाज का सम्मान करते हैं।

ऐसे शब्द राष्ट्र-विरोधी हैं और समाज में जहर फैला रहे हैं।”हंगामा बढ़ता देख विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार ने हस्तक्षेप किया और ‘ब्राह्मण’ संबंधित विवादित शब्दों को सदन की कार्यवाही (प्रोसीडिंग्स) से हटाने का आदेश दिया। दोनों पक्षों के विधायकों ने नारेबाजी की, जिससे सदन का माहौल गरमाया रहा।बैकग्राउंड: यूजीसी के ये नए रेगुलेशंस जनवरी 2026 में नोटिफाई हुए थे, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों के विरोध और कानूनी चुनौतियों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को इन पर अंतरिम स्टे लगा दिया।

कोर्ट ने प्रावधानों को ‘अस्पष्ट’ और ‘दुरुपयोग की आशंका’ वाला बताया। विपक्ष इसे जातिगत न्याय के लिए जरूरी मानता है, जबकि सत्ता पक्ष इसे विभाजनकारी बताता है।यह घटना बिहार की राजनीति में जाति और शिक्षा के मुद्दे पर जारी तनाव को फिर उजागर करती है।

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