छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास द्वारा हाल ही में दिए गए एक फैसले ने भारतीय न्याय व्यवस्था में रेप की परिभाषा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि किसी मामले में महिला के साथ पूरा पेनिट्रेशन (प्रवेश) साबित नहीं होता और केवल प्राइवेट पार्ट को रगड़ा गया हो, तो इसे कानून की नजर में रेप नहीं माना जाएगा। बल्कि, यह कृत्य ‘अटेम्प्ट टू रेप’ (रेप की कोशिश) की श्रेणी में आएगा। इस आधार पर, कोर्ट ने एक रेप के आरोपी की सजा को आधी कर दिया – मूल रूप से 7 साल की सजा को घटाकर साढ़े 3 साल कर दिया गया। यह फैसला, जो 2004 के एक पुराने मामले पर आधारित है, कानूनी रूप से सही लग सकता है, लेकिन सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण से यह काफी विवादास्पद है। आइए इस मामले को आलोचनात्मक तरीके से समझते हैं, जहां कोर्ट की दलीलों की सराहना के साथ-साथ उनकी सीमाओं और संभावित नकारात्मक प्रभावों पर भी नजर डालते हैं
मामला क्या है? – तथ्यों का संक्षिप्त विवरण
यह मामला छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का है, जहां 21 मई 2004 को पीड़िता घर में अकेली थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने उसे जबरन अपने घर खींचकर ले गया, दोनों के कपड़े उतारे, और उसकी मर्जी के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की। आरोपों में यह शामिल था कि आरोपी ने पीड़िता को कमरे में बंद किया, उसके हाथ-पैर बांधे, और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया। कुछ देर बाद पीड़िता की मां ने पहुंचकर उसे छुड़ाया, जिसके बाद अर्जुनी थाने में FIR दर्ज हुई। जांच के बाद, 6 अप्रैल 2005 को ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(1) (रेप) और धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) के तहत दोषी ठहराया और 7 साल की सजा सुनाई।
आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की, और 16 फरवरी 2026 को जस्टिस व्यास की सिंगल बेंच ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया। कोर्ट ने माना कि आरोपी का इरादा गलत था, लेकिन मेडिकल और अन्य साक्ष्यों से पूरा पेनिट्रेशन साबित नहीं हुआ। इसलिए, इसे रेप नहीं बल्कि रेप की कोशिश (IPC धारा 376/511) माना गया।

हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं? – साक्ष्यों का आलोचनात्मक परीक्षण
अपीलकर्ता के वकीलों (राहिल अरुण कोचर और लीकेश कुमार) ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया। मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता का हाइमन (पर्दा) सुरक्षित पाया गया था, जो जबरन पूर्ण यौन संबंध की पुष्टि नहीं करता। उन्होंने बयान दर्ज करने में देरी, स्वतंत्र गवाहों की कमी, और पीड़िता की उम्र को लेकर स्पष्ट साक्ष्यों की अनुपस्थिति का भी हवाला दिया। स्कूल रजिस्टर के लेखक को गवाह के रूप में नहीं पेश किया गया, इसलिए उम्र के प्रमाण पर सवाल उठाए गए।
वहीं, राज्य की ओर से पैनल लॉयर मनीष कश्यप ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने मेडिकल रिपोर्ट का जिक्र किया, जिसमें पीड़िता के कपड़ों पर मानव शुक्राणु मिले थे, और प्राइवेट पार्ट में लालिमा पाई गई थी – जो जबरदस्ती की ओर इशारा करती है। फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) ने भी कपड़ों पर मानव शुक्राणु की पुष्टि की।
कोर्ट ने पीड़िता की गवाही का विस्तार से परीक्षण किया। पीड़िता ने शुरुआत में कहा था कि पेनिट्रेशन हुआ, लेकिन बाद में बयान बदला और बताया कि आरोपी ने अपना प्राइवेट पार्ट उसके प्राइवेट पार्ट के ऊपर करीब 10 मिनट तक रखा, लेकिन अंदर प्रवेश नहीं किया। मेडिकल जांच करने वाली डॉक्टर आशा त्रिपाठी ने गवाही दी कि हाइमन नहीं फटा था, और योनि में केवल उंगली का पोर ही प्रवेश कर सकता था – इससे पूर्ण पेनिट्रेशन की पुष्टि नहीं होती। रिपोर्ट में वल्वा में लालिमा और सफेद तरल पदार्थ की उपस्थिति दर्ज थी, जो FSL में शुक्राणु निकला।
कोर्ट ने माना कि आरोपी के कृत्य – पीड़िता को जबरन ले जाना, कपड़े उतारना, और जननांगों को रगड़ना – गंभीर हैं और अपराध की मंशा साफ दिखाते हैं। लेकिन सवाल था: क्या ये रेप की कानूनी परिभाषा में फिट बैठते हैं? कोर्ट ने कहा कि “पेनिट्रेशन रेप का साइन क्वा नॉन (अनिवार्य तत्व) है, न कि एजाकुलेशन। एजाकुलेशन विदाउट पेनिट्रेशन रेप नहीं बल्कि अटेम्प्ट है।”
- डेफिनिशन की पुरानी सोच: 2013 के आपराधिक कानून संशोधन के बाद रेप की परिभाषा ब्रॉडर हो गई है, जिसमें गैर-पेनिट्रेटिव असॉल्ट (जैसे ऑब्जेक्ट इंसर्शन) भी शामिल हैं। लेकिन यह केस पुराना होने से पुराने कानून पर आधारित है, जो सेक्शुअल असॉल्ट के कई रूपों को “केवल कोशिश” में डाउनग्रेड कर देता है। क्या यह पीड़िताओं को न्याय से वंचित नहीं करता?
- पीड़िता के बयानों पर संदेह: पीड़िता ने बयान बदला, जो ट्रॉमा या दबाव के कारण हो सकता है। कोर्ट ने इसे “डाउट” माना, लेकिन क्या यह सेक्शुअल असॉल्ट विक्टिम्स की मनोवैज्ञानिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं करता? कई अध्ययनों से पता चलता है कि ट्रॉमा से बयान बदल सकते हैं, लेकिन यहां इसे प्रमाण की कमी माना गया।
- सामाजिक प्रभाव: यह फैसला रेप विक्टिम्स को रिपोर्टिंग से हतोत्साहित कर सकता है, क्योंकि “रगड़ना” या “एजाकुलेशन” जैसे गंभीर कृत्यों को कम करके आंका गया। संगीतकार विशाल ददलानी ने इसे “रैपिस्ट बचाओ अभियान” कहा है, जो सार्वजनिक आक्रोश को दर्शाता है। क्या कोर्ट ने जेंडर जस्टिस को प्राथमिकता दी, या सिर्फ टेक्निकलिटी पर फोकस किया?
- जज व्यास के पैटर्न: यह पहला ऐसा फैसला नहीं है। हाल ही में, उन्होंने एक पति को पत्नी के साथ अननैचुरल सेक्स के आरोप से बरी किया, क्योंकि भारत में मार्शल रेप मान्य नहीं है। यह पैटर्न रेप कानूनों में रिफॉर्म की जरूरत को उजागर करता है, खासकर जब वैश्विक स्तर पर कंसेंट को प्राथमिकता दी जाती है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला? – ब्रॉडर इंप्लिकेशंस
यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि यह याद दिलाता है कि कानून साक्ष्यों और परिभाषाओं पर चलता है, न कि भावनाओं पर। लेकिन यह रेप कानूनों की कमियों को भी उजागर करता है – जैसे पेनिट्रेशन को साबित करने की मुश्किलें, जो अक्सर मेडिकल साक्ष्यों पर निर्भर होती हैं। अगर पेनिट्रेशन साबित नहीं होता, तो अपराध की श्रेणी बदल सकती है, लेकिन क्या इससे असॉल्ट की गंभीरता कम हो जाती है? यह फैसला विधायिका को रेप डेफिनिशन को और ब्रॉड करने के लिए प्रेरित कर सकता है, ताकि सभी प्रकार के सेक्शुअल वायलेंस को कवर किया जाए।
अंत में, जस्टिस व्यास का फैसला कानूनी रूप से मजबूत है, लेकिन यह समाज में रेप विक्टिम्स की लड़ाई को कमजोर कर सकता है। न्याय व्यवस्था को साक्ष्यों के साथ-साथ संवेदनशीलता की भी जरूरत है, वरना ऐसे फैसले “न्याय” की बजाय “टेक्निकलिटी” बनकर रह जाएंगे।


