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नए UGC नियमों को लेकर BJP के भीतर नाराज़गी और इस्तीफे ?

नए UGC नियमों को लेकर BJP के भीतर नाराज़गी और इस्तीफे ?

कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए यूजीसी नियमों को वापस लेने की मांग कुछ बीजेपी नेता कर रहे हैं. उच्च जाति के छात्र कह रहे हैं कि ये नियम एक तरफा हैं और इससे उनके खिलाफ ‘रिवर्स बायस’ हो सकता है.

नई दिल्ली: कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) द्वारा बनाए गए नए नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों में भारी नाराज़गी देखने को मिली है. इन नियमों की आलोचना अब भारतीय जनता पार्टी के भीतर से भी हो रही है. कुछ उच्च जाति के पार्टी नेताओं ने असंतोष जताया है और कुछ स्थानीय नेताओं ने पार्टी पदों से इस्तीफा भी दे दिया है.

यूजीसी, जो शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाला एक स्वायत्त निकाय है, उसने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, 2026 लागू किए हैं. ये नियम देशभर के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) पर लागू होंगे.

रोहित वेमुला और पायल ताडवी केस का संदर्भ
गौरतलब है कि यूजीसी ने यह कदम सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के बाद उठाया है, जो रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया था। कोर्ट ने यूजीसी से पूछा था कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म करने के लिए उसके पास क्या ठोस तंत्र है।

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सभी छात्रों और कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करने और जाति आधारित भेदभाव खत्म करने के उद्देश्य से बनाए गए इन नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव को किसी व्यक्ति के साथ केवल उसकी जाति या जनजाति के कारण किए गए किसी भी तरह के अनुचित व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है. समाज के एक वर्ग ने इन नए नियमों की कड़ी आलोचना की है और कई लोग इन्हें वापस लेने की मांग कर रहे हैं.
नियमों के खिलाफ विरोध करते हुए उच्च जाति के छात्रों ने आरोप लगाया है कि ये नियम एकतरफा हैं और भेदभाव रोकने के नाम पर उनके खिलाफ “रिवर्स बायस” को बढ़ावा दे सकते हैं.

नए नियमों का दुरुपयोग हो सकता है

उच्च जाति और सामान्य वर्ग के छात्रों के कुछ वर्गों का दावा है कि नए नियमों का दुरुपयोग हो सकता है. उनका कहना है कि भेदभाव रोकने के लिए संस्थान प्रमुख द्वारा बनाई जाने वाली इक्विटी कमेटियों में केवल आरक्षित वर्गों का ही प्रतिनिधित्व होगा. उनका यह भी कहना है कि नियमों में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से बचाव के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान साफ तौर पर नहीं बताए गए हैं. कुछ छात्रों और शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि ये नियम कैंपस में निगरानी की संस्कृति को बढ़ावा दे सकते हैं.

बढ़ती आलोचना के बीच कई बीजेपी नेताओं का कहना है कि यह कदम उल्टा असर डालेगा और इससे समाज का उच्च जाति वर्ग बीजेपी से और दूर हो सकता है.उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा, “पहले ही सरकार ऐसे फैसले ले चुकी है, जो सवर्ण (उच्च जाति) समाज के खिलाफ माने जाते हैं और अब इसका असर हमारे बच्चों, यानी युवा पीढ़ी पर पड़ेगा. आज के समय में, जब आरक्षण के प्रावधानों को ही चुनौती दी जा रही है, हम ऐसे नियम ला रहे हैं! यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है.”

इन नियमों की आलोचना करनी सेना (एक राजपूत संगठन) ने भी की है. संगठन ने कहा कि ये नियम सवर्ण समाज को दबाने के लिए लाए गए हैं. करनी सेना ने चेतावनी दी है कि अगर नियम वापस नहीं लिए गए तो वह बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू करेगी.

प्रधानमंत्री को पत्र
इस फैसले से नाराज़ होकर कुछ स्थानीय बीजेपी नेताओं ने गुस्सा जताया है और पार्टी पदों से इस्तीफा दे दिया है. रायबरेली के सलोन में बीजेपी किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा और अपने पार्टी पद से इस्तीफा दे दिया.

2019 में बीजेपी में शामिल हुए त्रिपाठी ने दिप्रिंट से कहा, “मैंने विरोध के तौर पर अपने पद से इस्तीफा दिया है. मैं अब भी पार्टी का प्राथमिक सदस्य हूं, लेकिन जो नियम लाए गए हैं, वे पूरी तरह से अन्यायपूर्ण हैं और सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ हैं.”

25 जनवरी को प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में त्रिपाठी ने कहा कि वह ऊंची जातियों के बच्चों के खिलाफ लाए गए यूजीसी नियमों जैसे “काले कानूनों” की वजह से अपने पद से इस्तीफा दे रहे हैं.

उन्होंने आगे कहा, “यह कानून समाज के लिए बेहद नुकसानदायक है और समाज को बांटने वाला है. मैं इसका पूरी तरह विरोध करता हूं. मैं ऐसे अनैतिक नियमों का समर्थन नहीं कर सकता, क्योंकि ये मेरे आत्मसम्मान और विचारधारा के बिल्कुल खिलाफ हैं.”

कई उच्च जाति के नेताओं को लगता है कि पार्टी उन्हें हल्के में ले रही है.

एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा, “पार्टी की सीटें घटकर 240 रह गईं और जो निष्कर्ष निकाला गया, वह यह था कि एससी और एसटी समुदायों ने बीजेपी का समर्थन नहीं किया. उनके कल्याण के लिए एक के बाद एक योजनाएं लाई जा रही हैं और हम चुप बैठे रहे, लेकिन अब बात हमारे बच्चों के भविष्य की है और यह फैसला पूरी तरह भेदभावपूर्ण है. अगर इसे वापस नहीं लिया गया, तो पार्टी को इसके नतीजे भुगतने पड़ेंगे.”

उन्होंने आगे कहा, “वे उच्च जातियों की एकजुटता को कम आंक रहे हैं. अगर वे एकजुट हो गए, तो कोई भी हमें रोक नहीं पाएगा. पार्टी को आत्ममंथन करने की ज़रूरत है.”

क्या है EOC, इसका मुख्य कार्य क्या है?
समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre) EOC केवल शिकायत निवारण केंद्र नहीं होंगे, बल्कि वंचित वर्गों के लिए बनी योजनाओं पर कितना अमल हुआ इसकी निगरानी करेंगे। जरूरतमंद छात्रों को कानूनी सहायता दिलाने के लिए जिला और राज्य लिगल सर्विस ऑथरिटीज से कॉर्डिनेट करेंगे। कैंपस में सामाजिक समावेश को बढ़ावा देने के लिए सेमिनार और ऑनलाइन पोर्टल बनाएंगे।

उत्तर प्रदेश विधान परिषद के वरिष्ठ सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने भी यूजीसी नियमों पर गंभीर आपत्ति जताई है. सिंह ने 22 जनवरी को यूजीसी को एक पत्र लिखा, जिसमें चेतावनी दी कि यह कदम देशभर में “सामाजिक सौहार्द को तोड़ सकता है और जातिगत टकराव को बढ़ा सकता है.”

उन्होंने यूजीसी से इस ढांचे पर दोबारा विचार करने की अपील की. सिंह ने कहा कि जिस तरह से ये नियम बनाए गए हैं, वे सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकते हैं और जाति आधारित विभाजन को और गहरा कर सकते हैं. उन्होंने जोर दिया कि समानता ज़रूरी है, लेकिन इससे सामाजिक एकता कमज़ोर नहीं होनी चाहिए और किसी भी वर्ग के छात्रों को हाशिए पर नहीं डालना चाहिए.

सिंह ने पत्र में लिखा, “यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन द्वारा लिया गया फैसला सामाजिक सौहार्द को नष्ट कर देगा और समाज में जातिगत संघर्ष को बढ़ाएगा. इससे समाज में गहरी खाई पैदा होगी और विश्वविद्यालयों व उच्च शिक्षा संस्थानों का पढ़ाई का माहौल खत्म हो जाएगा. इस नियम का दुरुपयोग होने की पूरी संभावना है.” उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि अब तक उन्होंने केवल यूजीसी से ही संवाद किया है.

UGC Bill New Regulations Controversy:  विवाद की असली जड़ क्या है?
  1. Equity Committees और Equity Squads: निगरानी का नया तंत्र UGC ने हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में Equity Committee और Equity Squad बनाना अनिवार्य कर दिया है। नियमों के अनुसार, इन कमेटियों में SC, ST, OBC, महिलाओं और दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है, लेकिन सामान्य वर्ग (General Category) के प्रतिनिधित्व का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। छात्रों का आरोप है कि ‘Equity Squad’ को परिसर और हॉस्टल में संवेदनशील जगहों की निगरानी के लिए अत्यधिक अधिकार दिए गए हैं, जिससे सामान्य सामाजिक मेलजोल भी जांच के दायरे में आ सकता है।
  2. 24×7 हेल्पलाइन और ‘झूठी शिकायत’ का डर नए नियमों के तहत संस्थानों को एक चौबीसों घंटे चलने वाली हेल्पलाइन और Equal Opportunity Centre स्थापित करना होगा। तर्क है कि 2026 के इन नियमों से ‘झूठी या द्वेषपूर्ण शिकायतों’ के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान हटा दिया गया है, जो 2025 के ड्राफ्ट में मौजूद था। शिक्षकों और छात्रों का मानना है कि बिना किसी सबूत या दंड के भय के कोई भी छात्र किसी पर भी आरोप लगा सकता है, जिससे निर्दोषों का करियर और प्रतिष्ठा दांव पर लग सकती है।
  3. SC/ST/OBC पर केंद्रित परिभाषा और ‘सवर्ण’ समाज का गुस्सा UGC ने ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की परिभाषा को संशोधित किया है, जिसके तहत केवल अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों के खिलाफ होने वाले कृत्यों को ही इस दायरे में रखा गया है। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इन नियमों के विरोध में इस्तीफा तक दे दिया है। उनका और कई संगठनों का कहना है कि यह कानून सामान्य वर्ग के छात्रों को ‘स्वघोषित अपराधी’ मानता है। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि कानून ‘समावेशी’ होना चाहिए और सभी वर्गों के छात्रों को समान सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए।
  4. फंड रोकने और मान्यता रद्द करने का ‘ब्रह्मास्त्र’ अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन करने में विफल रहता है, तो UGC के पास उनकी मान्यता रद्द करने या सरकारी फंड (अनुदान) रोकने का अधिकार है।शिक्षण संस्थानों का मानना है कि यह नियम उन पर अनावश्यक प्रशासनिक दबाव डालता है। विरोध कर रहे लोगों को डर है कि सरकार इस वित्तीय शक्ति का उपयोग संस्थानों को नियंत्रित करने या अपनी बात मनवाने के लिए ‘हथियार’ के रूप में कर सकती है।

उन्होंने आगे कहा, “आपके द्वारा बनाया गया यह नियम सामान्य वर्ग के उत्पीड़न का एक मजबूत हथियार बन जाएगा. यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन 2026 (नियमों) का उद्देश्य दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों पर होने वाले अत्याचार को रोकना होना चाहिए, न कि सामान्य वर्ग के छात्रों को असुरक्षित बनाना.”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से बीजेपी नेता मृगेन्द्र उपाध्याय ने भी इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने यूजीसी नियमों को ब्राह्मण विरोधी और सामान्य वर्ग के खिलाफ बताया.

पार्टी को बाहर और अंदर से मिल रही आलोचना को देखते हुए बीजेपी सांसद और वरिष्ठ नेता निशिकांत दुबे ने इस मुद्दे पर सफाई देने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, तब तक सामान्य वर्ग के बच्चों को कोई नुकसान नहीं होगा.

उन्होंने 24 जनवरी को पोस्ट करते हुए कहा, “मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद उच्च जाति समाज को सुप्रीम कोर्ट से मान्यता दिलाई और 10 प्रतिशत आरक्षण दिया—यह सच्चाई है.”
पत्रकार महासंगठन ने राष्ट्रपति को भेजा चार सूत्रीय ज्ञापन :मिल्कीपुर में SDM को सौंपा गया ज्ञापन, यूजीसी फैसलों पर पुनर्विचार की मांग

राष्ट्रपति को संबोधित एक चार सूत्रीय ज्ञापन

मिल्कीपुर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नीतियों के विरोध में राष्ट्रपति को संबोधित एक चार सूत्रीय ज्ञापन भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महा संगठन ने उप जिलाधिकारी को सौंपा है । संगठन का आरोप है कि यूजीसी की वर्तमान और प्रस्तावित नीतियां देश के उच्च शिक्षा तंत्र,शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।

महासंगठन ने अपने ज्ञापन में कहा है कि वे शिक्षा, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े विषयों पर सदैव सजग रहे हैं।उनका मानना है कि इन नीतियों से शिक्षा की गुणवत्ता,पारदर्शिता और समान अवसर की भावना को गंभीर क्षति पहुंचने की आशंका है। संगठन ने जोर दिया कि शिक्षा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती है और इसमें असंतुलित या जल्दबाजी में लिया गया निर्णय दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकता है।

संगठन ने बताया कि यूजीसी के वर्तमान निर्णयों को लेकर देशभर में शिक्षाविदों, छात्रों और सामाजिक संगठनों के बीच गहरी चिंता और असंतोष व्याप्त है।
भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंगठन के जिला अध्यक्ष बलराम तिवारी ने इस अवसर पर कहा कि विद्यालयों जैसी संस्थाओं को जाति, धर्म या लिंग के आधार पर छात्रों को बांटने से बचना चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि जब कोई बालक विद्यालय जाता है, तो वह केवल एक छात्र होता है, वहां कोई जाति, धर्म या लिंग नहीं होता। तिवारी ने इस विषय पर महान शिक्षाविदों और शोध छात्रों से भी राय लेने की आवश्यकता बताई।

महासंगठन ने राष्ट्रपति से चार प्रमुख बिंदुओं पर विचार करने का आग्रह किया है। इनमें यूजीसी से संबंधित विवादित नीतियों/प्रस्तावों पर पुनर्विचार करना, शिक्षकों, छात्रों एवं विशेषज्ञों से व्यापक परामर्श के बाद ही अंतिम निर्णय लेना, उच्च शिक्षा की स्वायत्तता, गुणवत्ता एवं समानता को प्राथमिकता देना, और शिक्षा व्यवस्था को व्यवसायीकरण से मुक्त रखते हुए जनहित में निर्णय सुनिश्चित करना शामिल है।

संगठन ने विश्वास व्यक्त किया है कि राष्ट्रपति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन होने के नाते इस गंभीर विषय पर संज्ञान लेंगे और राष्ट्रहित में उचित दिशा-निर्देश प्रदान करेंगे।इस मौके पर वेद प्रकाश तिवारी,नरसिंह विनय गुप्ता,देवराज मिश्र,राहुल पाण्डेय, सूरज कौशल,उमाशंकर तिवारी,सुनील तिवारी, राकेश मिश्रा,दिनेश जायसवाल, शिव कुमार पाण्डेय,सर्वेश पाण्डेय,सुनील दुबे,अधिवक्ता अमित कुमार मिश्र सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

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