बेंगलुरु, 23 जनवरी 2026: कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने ऑनर किलिंग और जाति-आधारित हिंसा को रोकने के लिए एक नया विधेयक तैयार किया है। इस विधेयक का नाम ‘कर्नाटक फ्रीडम ऑफ चॉइस इन मैरिज एंड प्रिवेंशन एंड प्रोहिबिशन ऑफ क्राइम्स इन द नेम ऑफ ऑनर एंड ट्रेडिशन बिल, 2026’ है, जिसे ‘इवा नम्मावा, इवा नम्मावा’ के रूप में भी जाना जा रहा है। विधेयक में ऑनर किलिंग के लिए न्यूनतम 5 साल की सजा का प्रावधान है, साथ ही अंतरजातीय जोड़ों के लिए सुरक्षा घर और अन्य संरक्षण की व्यवस्था की गई है।
यह विधेयक हाल ही में हुई घटनाओं से प्रेरित है, जैसे कि एक लिंगायत महिला की उसके पिता द्वारा दलित पुरुष से शादी करने पर हत्या। विधेयक में कहा गया है कि जाति-आधारित भेदभाव कर्नाटक में अभी भी हिंसक रूपों में मौजूद है, खासकर युवाओं के अंतरजातीय विवाहों में। विधेयक का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मजबूत करना है, जहां परिवार, जाति या समुदाय की सहमति की जरूरत नहीं है। जातिवाद मिटाने की दिशा में यह एक अहम् और ऐतिहासिक कदम है
कानून के प्रमुख प्रावधान:
- ऑनर किलिंग पर सजा: जोड़े या किसी व्यक्ति की ‘ऑनर’ के नाम पर हत्या करने पर कम से कम 5 साल की कठोर कारावास और जुर्माना। यह सजा आजीवन कारावास तक बढ़ सकती है।
- गंभीर चोट पहुंचाने पर: 10 साल से आजीवन कारावास तक की सजा और 3 लाख रुपये तक का जुर्माना।
- अन्य अपराध: साधारण चोट, धमकी, अपहरण, सामाजिक बहिष्कार, जबरन अनुष्ठान, संपत्ति हस्तक्षेप, यौन हिंसा आदि पर 2 से 5 साल की सजा और 1 से 2 लाख रुपये का जुर्माना।
- जोड़ों की सुरक्षा: राज्य सरकार को ऐसे जोड़ों के लिए सुरक्षित आश्रय प्रदान करने का दायित्व। पुलिस को शिकायत मिलने पर 6 घंटे के अंदर सुरक्षा प्रदान करनी होगी।
- अपराध की परिभाषा: विधेयक में ‘ऑनर क्राइम’ को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है, जिसमें जाति, संस्कृति या परंपरा के नाम पर कोई भी हिंसा शामिल है। यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) में मौजूदा प्रावधानों को मजबूत करता है, लेकिन मकसद पर फोकस करता है।
सामाजिक कल्याण मंत्री एच सी महादेवप्पा ने कहा कि राज्य सरकार जाति-आधारित हत्याओं को रोकने के लिए सख्त कानून की जरूरत पर विचार कर रही है। यह विधेयक SC/ST एक्ट से अलग है, क्योंकि यह पीड़ित की पहचान के बजाय अपराध के मकसद पर केंद्रित है।

यह कदम कर्नाटक में बढ़ती ऑनर किलिंग की घटनाओं के बीच उठाया गया है, जो सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विधेयक अभी मसौदा स्तर पर है और जल्द ही विधानसभा में पेश किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून न केवल दंड देगा बल्कि समाज में जागरूकता भी फैलाएगा। कर्नाटक में बढ़ती ऑनर किलिंग की घटनाओं को रोकने के लिए विगत कई सालों से लोग संघर्ष कर रहे थे.


