ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा पेशवा गुट के बीच 1818 में हुई लड़ाई की याद में हर साल एक जनवरी को बड़ी तादाद में लोग ‘जय स्तंभ’ पर एकत्र होते हैं. आखिर 2018 में ऐसा क्या हुआ कि यहां दंगा भड़क गया. ऐसी कौन सी लड़ाई हुई, जो आज भी प्रासंगिक बनी हुई है? भीमा कोरेगांव आज भी क्यों संवेदनशील मुद्दा है?
2026 के जश्न और बधाई संदेशों के बीच एक खबर आती है कि महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार, वंचित बहुजन आघाडी के प्रमुख नेता प्रकाश आंबेडकर और कई अन्य नेताओं ने कोरेगांव भीमा की लड़ाई के 208 साल होने पर गुरुवार यानी कि एक जनवरी को ‘जय स्तंभ’ पर श्रद्धांजलि दीं. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा पेशवा गुट के बीच 1818 में हुई इस लड़ाई की याद में हर साल एक जनवरी को बड़ी तादाद में लोग यहां ‘जय स्तंभ’ पर एकत्र होते हैं. आखिर 2018 में ऐसा क्या हुआ कि यहां दंगा भड़क गया. ऐसी कौन सी लड़ाई हुई, जो आज भी प्रासंगिक बनी हुई है? भीमा कोरेगांव आज भी क्यों संवेदनशील मुद्दा है? भीमा कोरेगांव के साथ इतिहास बनाम वर्तमान राजनीति, दलित अस्मिता बनाम राष्ट्रवादी नैरेटिव की बहस राष्ट्रीय मुद्दे के केंद्र में बनी हुई है. इस पूरे मुद्दे का हर पहलू समझते हैं.
भीमा-कोरेगांव की यह लड़ाई केवल एक सैन्य टकराव नहीं थी, बल्कि बाद के वर्षों में यह सामाजिक न्याय, जाति व्यवस्था और दलित अस्मिता का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गई. सबसे पहले तो यह समझते हैं कि आखिर 1818 में भीमा कोरेगांव की लड़ाई में क्या हुआ था? 1817–18 में अंग्रेजों और मराठों के बीच तीसरा आंग्ल-मराठा युद्ध चल रहा था. पेशवा बाजीराव द्वितीय अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे, जिन्हें मराठा साम्राज्य के अंतिम प्रभावशाली शासक के तौर पर माना जाता है.
भीमा कोरेगांव क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?
भीमा कोरेगांव की पहचान यह है कि महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित एक छोटा सा गांव है. लेकिन भारत के आधुनिक इतिहास और फिर बीते कुछ सालों से समकालीन राजनीति में इसका महत्व बहुत बड़ा है. यहां 1 जनवरी 1818 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा साम्राज्य के पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेनाओं के बीच एक ऐतिहासिक लड़ाई हुई थी. इस जगह पर दोनों तरफ की सेनाओं के टकराने की वजह से भीमा कोरेगांव की लड़ाई कहा जाता है.
दोनों तरफ के सेनाओं की स्थिति
ब्रिटिश सेना में लगभग 500 सैनिक थे, जिनमें बड़ी संख्या महार (दलित) समुदाय के सैनिकों की थी. वहीं पेशवा की सेना में करीब 28,000 से अधिक सैनिक थे. भीमा नदी के किनारे स्थित कोरेगांव गांव में यह टकराव हुआ. युद्ध का नतीजा यह हुआ कि संख्या में बेहद कम होने के बावजूद ब्रिटिश सेना ने पेशवा की सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. कुछ ही समय बाद बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और पेशवाई का अंत हो गया. अब मुख्य बात इसमें यह है कि महार यानी दलितों ने इस लड़ाई में अंग्रेजों का साथ दिया था और मराठा सेना को हराने में यही महार एक्स फैक्टर साबित हुए.
यह लड़ाई दलितों के लिए प्रतीक क्यों बनी?
दरअसल, मराठा पेशवाओं के शासन में महार समुदाय को गंभीर सामाजिक भेदभाव और अत्याचारों का सामना करना पड़ता था. उन्हें गांवों में प्रवेश, हथियार रखने और सम्मानजनक जीवन से वंचित किया गया था. छुआछूत बंद नहीं होने से नाराज होकर महारों ने भीमा कोरेगांव की लड़ाई में ब्रिटिश सेना का साथ दे दिया. महार सैनिकों ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी और पेशवा की सेना को पीछे हटने पर मजबूर किया. इसी कारण यह युद्ध ब्राह्मणों के वर्चस्व वाली पेशवाई के खिलाफ प्रतिरोध और दलित आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया.
जीत के बाद बना विजय स्तंभ
अंग्रेजों ने 1822 में यहां एक विजय स्तंभ बनवाया. भीमा-कोरेगांव की जीत को ऐतिहासिक बताते हुए ब्रिटिश सेना जिस पर महार सैनिकों के नाम खुदे हैं. यही स्तंभ आज भी हर साल विवाद और श्रद्धा का केंद्र बनता है. साल 1927 में भीमराव आंबेडकर ने इस वॉर मेमोरियल का दौरा किया और श्रद्धांजलि दी. इसके बाद महार समुदाय ने अगड़ी जाति के पेशवाओं पर मिली जीत की याद में एक जनवरी को शौर्य दिवस के रूप में दिन को मनाना शुरू किया. हजारों दलित, बहुजन और अंबेडकरवादी संगठन भीमा कोरेगांव पहुंचते हैं और इस लड़ाई की वर्षगांठ मनाते हैं.


