साहिल वाकोडे की मौत के बाद SOP में बदलाव का प्रस्ताव; मेंटर सपोर्ट, स्पष्ट दिशानिर्देश और अनुशासनात्मक समितियों में छात्रों की भागीदारी पर जोर
मुंबई: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे परीक्षा में कथित नकल और अनुचित साधनों के इस्तेमाल के मामलों में छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया में बदलाव करने की तैयारी कर रहा है। संस्थान ने इस संबंध में मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का नया मसौदा तैयार किया है। इसमें कार्रवाई से पहले छात्र को अपना पक्ष रखने, संबंधित विभाग के प्रमुख (HOD) से बात करने और मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर देने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं।
यह पहल बीटेक छात्र साहिल वाकोडे की 18 सितंबर को हुई मौत के बाद चर्चा में आई है। छात्रों पर पढ़ाई और परीक्षा से जुड़े दबाव तथा शैक्षणिक संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर उठ रहे सवालों के बीच प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य अनुशासनात्मक प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट, पारदर्शी और छात्र-केंद्रित बनाना है। हालांकि, SOP के अंतिम प्रावधानों पर संस्थान की संबंधित बैठक में फैसला होना बाकी है।
कार्रवाई से पहले छात्र को अपनी बात रखने का अवसर
प्रस्तावित SOP के तहत परीक्षा में गड़बड़ी या अनुचित साधनों के इस्तेमाल का संदेह होने पर छात्र के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जा सकता है। इसके साथ ही, छात्र को मेंटर से बातचीत और मार्गदर्शन की सुविधा उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है।
इस बदलाव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी मामले में केवल शुरुआती आरोप या परीक्षा हॉल में मौजूद अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर जल्दबाजी में निर्णय न लिया जाए। छात्र का पक्ष सुनने और मामले की परिस्थितियों को समझने के बाद ही नियमानुसार आगे की प्रक्रिया अपनाई जाए।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल पर कार्रवाई समाप्त कर दी जाएगी। प्रस्ताव का केंद्र कार्रवाई की प्रक्रिया को स्पष्ट करना और छात्र को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना है।
इन्विजिलेटर के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश
परीक्षा के दौरान संदिग्ध गतिविधि सामने आने पर इन्विजिलेटर यानी परीक्षा पर्यवेक्षक की भूमिका को लेकर भी अलग और अधिक स्पष्ट SOP तैयार करने का प्रस्ताव है।
इसके तहत यह निर्धारित किया जा सकता है कि परीक्षा हॉल में किसी छात्र पर संदेह होने की स्थिति में पर्यवेक्षक को क्या कदम उठाने चाहिए, किन बातों से बचना चाहिए और घटना से संबंधित किन तथ्यों को दर्ज करना जरूरी होगा।
इससे परीक्षा के दौरान होने वाली घटनाओं का रिकॉर्ड अधिक व्यवस्थित रखने और अलग-अलग मामलों में प्रक्रिया की एकरूपता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
उत्तर पुस्तिका पर परीक्षा के नियम स्पष्ट करने की तैयारी
प्रस्तावित बदलावों में उत्तर पुस्तिकाओं पर परीक्षा से संबंधित नियमों को स्पष्ट रूप से दर्ज करने का मुद्दा भी शामिल है। इसका उद्देश्य यह है कि छात्रों को परीक्षा के नियमों और अनुचित साधनों के इस्तेमाल से जुड़े प्रतिबंधों की जानकारी पहले से हो।
नियम स्पष्ट होने से परीक्षा के दौरान अनजाने में हुई गलती, नियमों की गलतफहमी और जानबूझकर की गई गड़बड़ी के बीच अंतर समझने में भी मदद मिल सकती है।
अनुशासनात्मक समितियों में छात्रों की भागीदारी पर जोर
SOP के मसौदे में छात्रों के प्रतिनिधित्व और उनके वेलनेस यानी समग्र कल्याण पर भी ध्यान दिया गया है। प्रस्ताव के अनुसार, अनुशासनात्मक मामलों से जुड़ी प्रक्रिया और SOP तैयार करने वाली समितियों में छात्रों की भागीदारी बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।
इसका उद्देश्य छात्रों के अनुभवों और समस्याओं को संस्थान की निर्णय प्रक्रिया में जगह देना है, ताकि परीक्षा और अनुशासन से जुड़े नियम बनाते समय केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण ही नहीं, बल्कि छात्रों की परिस्थितियों को भी समझा जा सके।
शिक्षा विशेषज्ञ ने उठाए कार्रवाई के तरीके पर सवाल
शिक्षा विशेषज्ञ महेश्वर पेरी ने छात्रों के साथ संवेदनशीलता से पेश आने की जरूरत पर जोर दिया है। उनका कहना है कि कॉलेजों और संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र भी परिवारों के बच्चे हैं। यदि कोई छात्र गलती करता है, तो उसके साथ व्यवहार करते समय उसकी स्थिति और परिस्थितियों को समझना जरूरी है।
पेरी के मुताबिक, परीक्षा हॉल में किसी छात्र से गलती होने पर शिक्षक को भी संवेदनशीलता के साथ मामले को संभालना चाहिए। किसी छात्र के खिलाफ कार्रवाई का फैसला केवल मौके पर मौजूद शिक्षक की व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर नहीं होना चाहिए। इसके लिए स्पष्ट नियम और संस्थागत प्रक्रिया होनी चाहिए।
उनकी टिप्पणी इस व्यापक सवाल को सामने रखती है कि शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन बनाए रखते हुए छात्रों की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को किस तरह सुरक्षित रखा जाए।
IIT में छात्रों की आत्महत्या के मामलों ने बढ़ाई चिंता
IIT बॉम्बे में छात्रों की आत्महत्या के मामलों और देश के दूसरे तकनीकी संस्थानों में सामने आई ऐसी घटनाओं ने शैक्षणिक दबाव, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और संस्थागत जवाबदेही पर बहस को तेज किया है।
उपलब्ध कराई गई रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष IIT बॉम्बे में आत्महत्या का यह तीसरा मामला बताया गया है, जबकि देश के IIT संस्थानों में कुल मामलों की संख्या नौ बताई गई है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि वर्ष 2025 में IIT संस्थानों में 16 छात्रों की आत्महत्या हुई थी।
ग्लोबल IIT एलुमनाई सपोर्ट ग्रुप के हवाले से पिछले 20 वर्षों में IIT के 160 छात्रों की आत्महत्या का आंकड़ा भी दिया गया है। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि और उनकी गणना की समयावधि स्पष्ट करना जरूरी है।
नियमों के साथ सहायता व्यवस्था भी जरूरी
साहिल वाकोडे की मौत के बाद प्रस्तावित SOP में बदलाव की चर्चा ने एक अहम मुद्दे को फिर सामने ला दिया है: परीक्षा में अनुशासन बनाए रखने के साथ-साथ छात्रों को निष्पक्ष सुनवाई और समय पर सहायता कैसे दी जाए।
यदि प्रस्तावित बदलाव लागू होते हैं, तो परीक्षा में गड़बड़ी के आरोपों से जुड़े मामलों में छात्र का पक्ष सुनने, पर्यवेक्षकों की जिम्मेदारी स्पष्ट करने और मेंटर सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है। हालांकि, इन बदलावों का वास्तविक प्रभाव उनके अंतिम स्वरूप, क्रियान्वयन और संस्थान में मानसिक स्वास्थ्य सहायता की उपलब्धता पर निर्भर करेगा।
फिलहाल SOP का मसौदा अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा में है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संस्थान छात्रों के अधिकारों, परीक्षा की निष्पक्षता और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों के बीच संतुलन बनाने के लिए कौन-से ठोस कदम उठाता है।