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‘क्या भारत 14वीं सदी की ओर लौट रहा है?’ छुआछूत के मुद्दे पर राजेंद्र पाल गौतम का BJP पर हमला

by Admin
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गौतम ने अपने पोस्ट में सवाल किया कि क्या BJP भारत को 14वीं सदी की सामाजिक व्यवस्था की ओर ले जा रही है? उन्होंने छुआछूत को देश के सामने मौजूद गंभीर सामाजिक सवाल बताते हुए कहा कि वंचित वर्गों के बच्चों की शिक्षा और सामाजिक सम्मान भी इससे प्रभावित हो रहे हैं

नई दिल्ली: देश में छुआछूत और जातिगत भेदभाव को लेकर कांग्रेस नेता एवं पूर्व दिल्ली सरकार के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने BJP सरकारों पर तीखा हमला बोला है। सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट में गौतम ने सवाल उठाया कि पिछले करीब 12 वर्षों में देश में छुआछूत और जातिवाद की स्थिति को लेकर गंभीर चिंताएं क्यों बढ़ रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा लगता है कि BJP के शासन में भारत सामाजिक बराबरी की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय पीछे की ओर जा रहा है।

गौतम ने अपने पोस्ट में सवाल किया कि क्या BJP भारत को 14वीं सदी की सामाजिक व्यवस्था की ओर ले जा रही है? उन्होंने छुआछूत को देश के सामने मौजूद गंभीर सामाजिक सवाल बताते हुए कहा कि वंचित वर्गों के बच्चों की शिक्षा और सामाजिक सम्मान भी इससे प्रभावित हो रहे हैं

हालांकि, छुआछूत और जातिगत भेदभाव भारतीय समाज में आज भी कानून और सामाजिक न्याय की बहस का गंभीर विषय हैं।

छुआछूत: संविधान के सामने सबसे बड़ा सामाजिक सवाल

भारत का संविधान छुआछूत को स्पष्ट रूप से समाप्त करता है। संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता को समाप्त घोषित किया गया है और किसी भी रूप में इसका पालन कानूनन अपराध है।

इसके बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर जातिगत भेदभाव, सार्वजनिक स्थानों पर भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और दलितों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें सामने आती रही हैं।

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें राजेंद्र पाल गौतम का बयान राजनीतिक महत्व रखता है। उनका सवाल मूल रूप से यह है कि संविधान लागू होने के दशकों बाद भी अगर जाति के आधार पर किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत तय होती है, तो सामाजिक बराबरी का लक्ष्य आखिर कितना हासिल हुआ?

‘क्या छुआछूत फिर बढ़ रही है?’

गौतम ने अपने पोस्ट में सीधे तौर पर कहा कि पिछले करीब 12 वर्षों में छुआछूत और जातिवाद काफी बढ़ गया है। उनका आरोप है कि BJP सरकारों के दौर में सामाजिक भेदभाव को लेकर चिंता कम होने के बजाय बढ़ी है।

हालांकि, इस दावे को पूरे देश के लिए स्थापित तथ्य मानने से पहले आधिकारिक आंकड़ों और अलग-अलग वर्षों के तुलनात्मक आंकड़ों को देखना जरूरी होगा।

यही वजह है कि इस मुद्दे पर वास्तविक बहस केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सवाल यह होना चाहिए कि जातिगत भेदभाव के मामलों की संख्या, पुलिस कार्रवाई, दोषसिद्धि और पीड़ितों को न्याय मिलने की स्थिति में पिछले वर्षों में क्या बदलाव आया है।

सरकारी स्कूल और छुआछूत को गौतम ने जोड़ा

राजेंद्र पाल गौतम ने अपने पोस्ट में सरकारी स्कूलों को भी छुआछूत और सामाजिक बराबरी के मुद्दे से जोड़ा है।

उनका आरोप है कि BJP सरकारें सरकारी स्कूल बंद या कमजोर कर रही हैं और इसका असर सबसे ज्यादा वंचित वर्गों के बच्चों पर पड़ सकता है। उनका तर्क है कि गरीब, दलित, आदिवासी और अन्य वंचित परिवारों के बड़ी संख्या में बच्चे सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं।

इसलिए यदि सरकारी स्कूलों का विलय, बंद होना या उनकी पहुंच कम होना गरीब परिवारों के बच्चों को शिक्षा से दूर करता है, तो इसका सीधा असर सामाजिक बराबरी पर पड़ सकता है।

हालांकि, सरकारी स्कूलों को बंद करने का उद्देश्य वंचित वर्गों के बच्चों को शिक्षा से रोकना है, यह एक राजनीतिक आरोप है और इसे साबित करने के लिए ठोस नीतिगत या आधिकारिक प्रमाण जरूरी होंगे। सरकारें स्कूलों के विलय या पुनर्गठन के लिए छात्र संख्या, संसाधन और प्रशासनिक कारण भी बताती रही हैं।

शिक्षा और जाति का रिश्ता क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत जैसे समाज में शिक्षा केवल रोजगार हासिल करने का माध्यम नहीं है। ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के लिए शिक्षा सामाजिक गतिशीलता और बराबरी हासिल करने का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता रही है।

यही कारण है कि जब सरकारी स्कूलों, छात्रवृत्ति, छात्रावास, उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों में बदलाव होता है, तो उसका असर सामाजिक न्याय के सवाल से भी जुड़ जाता है।

गौतम का राजनीतिक तर्क इसी बिंदु पर केंद्रित है कि यदि एक तरफ जातिगत भेदभाव मौजूद है और दूसरी तरफ गरीब एवं वंचित बच्चों के लिए सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था कमजोर होती है, तो सामाजिक असमानता और गहरी हो सकती है।

’14वीं सदी में ले जाने’ वाला बयान क्यों महत्वपूर्ण?

राजेंद्र पाल गौतम का भारत को ’14वीं सदी में ले जाने’ वाला बयान महज एक राजनीतिक तंज नहीं है। इसके जरिए उन्होंने आधुनिक भारत और पुरानी जातिगत सामाजिक व्यवस्था के बीच तुलना खड़ी की है।

उनका संकेत है कि भारत ने संविधान के जरिए समान नागरिकता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय का रास्ता चुना है। ऐसे में जाति के आधार पर भेदभाव या छुआछूत की कोई भी घटना उस संवैधानिक यात्रा पर सवाल खड़े करती है।

दूसरी तरफ, BJP सरकारें स्वयं विकास, आधुनिकता और ‘विकसित भारत’ की राजनीति पर जोर देती हैं। ऐसे में विपक्षी नेताओं का सवाल है कि आर्थिक और तकनीकी विकास के साथ सामाजिक बराबरी भी उतनी ही जरूरी है।

असली सवाल: कानून है, लेकिन सामाजिक मानसिकता कितनी बदली?

छुआछूत के खिलाफ कानून मौजूद हैं और संविधान इसे प्रतिबंधित करता है। लेकिन सामाजिक भेदभाव केवल कानून बनाने से समाप्त नहीं होता। इसके लिए सामाजिक मानसिकता में बदलाव, शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कानून का प्रभावी क्रियान्वयन भी जरूरी है।

यही वजह है कि राजेंद्र पाल गौतम का बयान एक बड़े सवाल को सामने लाता है—क्या भारत में विकास की रफ्तार सामाजिक बराबरी की रफ्तार के साथ चल रही है?

यदि देश आर्थिक और तकनीकी रूप से आगे बढ़ रहा है, लेकिन किसी व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अपमान, भेदभाव या सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है, तो विकास के मॉडल की सामाजिक सफलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

BJP से जवाब मांगने की कोशिश

गौतम के बयान का राजनीतिक संदेश स्पष्ट है। उन्होंने BJP सरकारों से यह सवाल करने की कोशिश की है कि छुआछूत और जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए सरकारें जमीन पर क्या कर रही हैं और वंचित वर्गों के बच्चों को शिक्षा के समान अवसर कैसे सुनिश्चित किए जा रहे हैं।

हालांकि, इस मुद्दे पर BJP या केंद्र तथा संबंधित राज्य सरकारों का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा। सरकार की ओर से यदि छुआछूत के खिलाफ उठाए गए कदम, सरकारी स्कूलों की स्थिति और सामाजिक न्याय से जुड़ी योजनाओं के आंकड़े सामने रखे जाते हैं तो बहस का दूसरा पक्ष भी स्पष्ट होगा।

फिलहाल राजेंद्र पाल गौतम की पोस्ट ने एक बार फिर छुआछूत बनाम संवैधानिक समानता के पुराने लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सवाल को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

कानून ने छुआछूत को खत्म कर दिया, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या समाज ने भी उसे पूरी तरह खत्म कर दिया है? यही वह सवाल है जिसे गौतम ने अपने बयान के जरिए BJP सरकारों के सामने खड़ा किया है।

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