वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने राज्य सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में ओबीसी समुदाय को पहले 17 प्रतिशत आरक्षण मिलता था, जबकि उनकी आबादी के हिसाब से यह 27 प्रतिशत होना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि नए कानून के जरिए इसे घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह आरक्षण आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को मिलने वाले 10 प्रतिशत आरक्षण से भी कम है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा में सोमवार को ओबीसी आरक्षण से जुड़े दो महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पारित होने के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। सरकार का दावा है कि नए कानून से हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप ओबीसी आरक्षण व्यवस्था को कानूनी आधार मिला है। वहीं, आलोचकों का कहना है कि 50 प्रतिशत से अधिक ओबीसी आबादी वाले राज्य में सिर्फ 7 प्रतिशत आरक्षण देना सामाजिक न्याय की भावना के अनुरूप नहीं है।
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने राज्य सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में ओबीसी समुदाय को पहले 17 प्रतिशत आरक्षण मिलता था, जबकि उनकी आबादी के हिसाब से यह 27 प्रतिशत होना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि नए कानून के जरिए इसे घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह आरक्षण आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को मिलने वाले 10 प्रतिशत आरक्षण से भी कम है।
हालांकि, सरकार का कहना है कि यह दावा भ्रामक है। सरकार के अनुसार 7 प्रतिशत आरक्षण वर्ष 2010 से पहले ओबीसी सूची में शामिल 66 समुदायों के लिए निर्धारित व्यवस्था है, जिसे कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के बाद कानूनी रूप दिया गया है। सरकार का यह भी कहना है कि ओबीसी आरक्षण की पूरी व्यवस्था अब नए वर्गीकरण और पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों के आधार पर संचालित होगी।
विधानसभा से दो अहम विधेयक पारित
पश्चिम बंगाल विधानसभा ने ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) (संशोधन) विधेयक, 2026’ और ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग (संशोधन) विधेयक, 2026’ को पारित कर दिया। मतदान में 186 विधायकों ने समर्थन किया, जबकि 17 विधायकों ने विरोध किया। छह सदस्य मतदान में शामिल नहीं हुए।
क्या बदला नए कानून में?
सरकार के अनुसार बिना किसी फील्ड सर्वे के पहले ओबीसी सूची में जोड़ी गई 113 श्रेणियों को हटा दिया गया है, जबकि विभिन्न सर्वेक्षणों के आधार पर पहले से शामिल 66 समुदायों को बरकरार रखा गया है।
नए कानून के तहत:
वर्ष 2010 से पहले ओबीसी सूची में शामिल 66 समुदायों को 7 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा।
राज्य सरकार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर ओबीसी समुदायों का अलग-अलग वर्गीकरण कर सकेगी।
किसी नए समुदाय को ओबीसी सूची में शामिल करने का फैसला केवल पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग की जांच और सिफारिश के बाद ही होगा।
राज्य में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा के भीतर रहेगा।
हाई कोर्ट के फैसले के बाद आया कानून
मई 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने वर्ष 2010 से 2012 के बीच ओबीसी सूची में शामिल किए गए 77 समुदायों का ओबीसी दर्जा रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि इन समुदायों को शामिल करने में वैधानिक प्रक्रिया और पिछड़ा वर्ग आयोग की अनुशंसाओं का पालन नहीं किया गया।
अदालत ने 2010 के बाद जारी लगभग 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र भी रद्द कर दिए थे, हालांकि उनके आधार पर पहले से मिली सरकारी नौकरियों को सुरक्षित रखा गया था। साथ ही अदालत ने 2010 से पहले जारी ओबीसी प्रमाणपत्रों को वैध माना था।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि 19 मई को उसने धर्म आधारित वर्गीकरण समाप्त करते हुए वर्ष 2010 से पहले ओबीसी सूची में शामिल 66 समुदायों की मान्यता बहाल की थी। विधानसभा से पारित दोनों संशोधन विधेयकों ने अब उसी फैसले को कानूनी आधार प्रदान कर दिया है। सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था पूरी तरह हाई कोर्ट के निर्देशों और पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।
अब असली सवाल
विधानसभा में कानून पारित होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या 50 प्रतिशत से अधिक ओबीसी आबादी वाले पश्चिम बंगाल में 7 प्रतिशत आरक्षण पर्याप्त है, या फिर यह केवल 66 समुदायों के लिए अंतरिम व्यवस्था है और भविष्य में व्यापक पुनर्वर्गीकरण के बाद आरक्षण का स्वरूप बदलेगा? आने वाले दिनों में यही मुद्दा राज्य की राजनीति और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन सकता है।