उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव के सवाल पर बहस अक्सर आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो जाती है। लेकिन फैकल्टी प्रतिनिधित्व, आरक्षित पदों की रिक्तियां और SC/ST/OBC छात्रों के ड्रॉपआउट जैसे आंकड़े इस बहस को संस्थागत स्तर पर देखने की जरूरत बताते हैं।
नई दिल्ली। देश के प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों यानी IIT में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर सामने आए आंकड़े उच्च शिक्षा में आरक्षण के वास्तविक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। 21 IIT से मिले आंकड़ों के मुताबिक इन संस्थानों की फैकल्टी में करीब 80% लोग जनरल कैटेगरी से हैं, जबकि OBC की हिस्सेदारी 11.2%, SC की 6% और ST की महज 1.6% है। ये आंकड़े 2024 में दाखिल RTI जवाबों के आधार पर सामने आए थे।
सरकारी आरक्षण व्यवस्था के तहत केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में OBC के लिए 27%, SC के लिए 15% और ST के लिए 7.5% आरक्षण का प्रावधान है। ऐसे में उपलब्ध फैकल्टी आंकड़ों में OBC, SC और ST का प्रतिनिधित्व इन प्रतिशतों से काफी नीचे दिखाई देता है। हालांकि, आरक्षण प्रतिशत और किसी समय की वास्तविक फैकल्टी संरचना को सीधे समान मानना भी सही नहीं होगा, क्योंकि भर्ती, पदों की प्रकृति, आरक्षण लागू होने की तारीख और रिक्तियों जैसे कई प्रशासनिक कारक इसमें शामिल होते हैं।
21 IIT का आंकड़ा क्या बताता है?
RTI से मिले आंकड़ों के अनुसार 21 IIT में फैकल्टी का वर्गवार वितरण इस प्रकार बताया गया है:
- जनरल कैटेगरी — 80%
- OBC — 11.2%
- SC — 6%
- ST — 1.6%
दूसरी ओर, कई IIT में आरक्षित फैकल्टी पद खाली भी हैं। उपलब्ध RTI आंकड़ों में 11 IIT ने कुल 1,557 फैकल्टी रिक्तियों की जानकारी दी थी। इनमें 415 OBC, 234 SC और 129 ST के लिए आरक्षित पद शामिल थे।
इससे बहस केवल यह नहीं रह जाती कि वर्तमान फैकल्टी में अलग-अलग सामाजिक समूहों की हिस्सेदारी कितनी है, बल्कि यह भी सवाल उठता है कि आरक्षित पदों को समय पर भरा क्यों नहीं जा रहा है।
IIT में छात्रों के ड्रॉपआउट का भी बड़ा आंकड़ा
प्रतिनिधित्व का सवाल केवल फैकल्टी तक सीमित नहीं है। दिसंबर 2023 में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुभाष सरकार ने लोकसभा में BSP सांसद रितेश पांडे के सवाल के जवाब में बताया था कि पांच वर्षों में केंद्रीय विश्वविद्यालयों, IIT और IIM में 13,626 SC, ST और OBC छात्रों ने पढ़ाई छोड़ी थी।
सिर्फ IIT की बात करें तो आंकड़े थे:
| वर्ग | IIT में ड्रॉपआउट |
|---|---|
| OBC | 2,066 |
| SC | 1,068 |
| ST | 408 |
| कुल | 3,542 |
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में OBC के 4,596, SC के 2,424 और ST के 2,622 छात्रों के ड्रॉपआउट की जानकारी दी गई थी। IIM में भी OBC, SC और ST वर्गों के छात्रों के ड्रॉपआउट दर्ज किए गए थे।
हालांकि, सरकार ने यह भी बताया था कि उच्च शिक्षा में छात्र एक संस्थान से दूसरे संस्थान या एक पाठ्यक्रम से दूसरे पाठ्यक्रम में स्थानांतरित होते हैं। इसलिए हर ड्रॉपआउट को सीधे भेदभाव या संस्थागत उत्पीड़न का परिणाम मानना आंकड़ों से साबित नहीं होता।
2025 की संसदीय समिति ने भी उठाया फैकल्टी रिक्तियों का मुद्दा
मार्च 2025 में संसद की शिक्षा संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में फैकल्टी पदों की बड़ी संख्या में रिक्तियों पर चिंता जताई। रिपोर्ट के अनुसार IIT, IIM, NIT और IISER समेत संबंधित उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसर स्तर के 56.18% पद खाली थे। समिति ने भर्ती प्रक्रिया को तेज करने की सिफारिश की।
इसी संसदीय रिपोर्ट में आरक्षित फैकल्टी पदों की बड़ी संख्या खाली रहने का मुद्दा भी सामने आया। रिपोर्ट में 1,949 SC, 771 ST और 3,261 OBC आरक्षित फैकल्टी पदों का उल्लेख किया गया और मंत्रालय से भर्ती प्रक्रिया को और तेज करने की सिफारिश की गई।
समिति ने नियमित रूप से कर्मचारियों की जरूरत का आकलन करने और पारदर्शी तरीके से रिक्तियों को भरने पर भी जोर दिया।
सवाल सिर्फ आरक्षण का नहीं, संस्थागत माहौल का भी
इन आंकड़ों को एक साथ देखने पर उच्च शिक्षा में सामाजिक प्रतिनिधित्व की एक व्यापक तस्वीर सामने आती है। एक तरफ संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था के तहत SC, ST और OBC के लिए प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का प्रावधान है, वहीं दूसरी तरफ उपलब्ध आंकड़ों में IIT फैकल्टी में इन समूहों की हिस्सेदारी काफी कम दिखाई देती है।
दूसरी ओर, आरक्षित पदों का खाली रहना और वंचित सामाजिक समूहों से आने वाले छात्रों के ड्रॉपआउट के आंकड़े यह सवाल उठाते हैं कि प्रवेश मिलने के बाद संस्थानों में समान अवसर, अकादमिक सहायता, शिकायत निवारण और सुरक्षित वातावरण कितना प्रभावी है।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उपलब्ध आंकड़े अलग-अलग वर्षों, संस्थानों और डेटा-स्रोतों से आते हैं। इसलिए इन्हें एक ही समय की एकल तस्वीर मानना उचित नहीं होगा। फिर भी, ये आंकड़े प्रतिनिधित्व और भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सार्वजनिक बहस का आधार जरूर बनते हैं।
“जातिवाद कहां है?”—सवाल का जवाब आंकड़ों से तलाशने की जरूरत
उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव के सवाल पर बहस अक्सर आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो जाती है। लेकिन फैकल्टी प्रतिनिधित्व, आरक्षित पदों की रिक्तियां और SC/ST/OBC छात्रों के ड्रॉपआउट जैसे आंकड़े इस बहस को संस्थागत स्तर पर देखने की जरूरत बताते हैं।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि आरक्षण का प्रावधान मौजूद है या नहीं, बल्कि यह भी है कि उसकी वास्तविक निगरानी कैसे हो रही है, आरक्षित पद कब और किस प्रक्रिया से भरे जा रहे हैं, छात्रों के ड्रॉपआउट के कारणों का सामाजिक वर्गवार विश्लेषण कितना किया जाता है और शिकायतों पर संस्थान किस तरह कार्रवाई करते हैं।
IIT जैसे देश के शीर्ष तकनीकी संस्थानों में सामाजिक विविधता और समान अवसर का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये संस्थान भविष्य के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को तैयार करते हैं। उपलब्ध आंकड़े कम से कम इतना संकेत देते हैं कि प्रतिनिधित्व और आरक्षित पदों की स्थिति पर सरकार, संसद और संस्थानों को लगातार निगरानी की जरूरत है।