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‘ज्ञानेश कुमार सरकारी गवाह बन जाएं’, राहुल गांधी का बड़ा हमला; BJP ने पूछा- आरोपों का आधार क्या?

by Admin
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राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह और बीजेपी के संदर्भ में उन्हें लंबे समय से वैसी एंटी-इनकंबेंसी क्यों दिखाई नहीं देती जैसी दूसरे राजनीतिक दलों और नेताओं के मामले में दिखाई देती रही है। राहुल गांधी का यह हमला ऐसे समय आया है जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के कई फैसलों और कदमों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने और मतदाता डेटा के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे शामिल थे।

नई दिल्ली: चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और कथित ‘वोट चोरी’ को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच सियासी टकराव और तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने यहां तक कहा कि ज्ञानेश कुमार को ‘सरकारी गवाह’ बन जाना चाहिए और चुनाव आयोग के भीतर जो कुछ हुआ है, उसे सामने रखना चाहिए।

राहुल गांधी का यह हमला ऐसे समय आया है जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के कई फैसलों और कदमों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने और मतदाता डेटा के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे शामिल थे।

राहुल गांधी बोले- ‘चुनाव बुनियादी रूप से टूट चुके हैं’

राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वह पिछले करीब तीन वर्षों से चुनावी प्रक्रिया और कथित ‘वोट चोरी’ को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब चुनाव आयोग के भीतर से सामने आई कथित आपत्तियां उनके सवालों को और गंभीर बनाती हैं।

राहुल गांधी ने कहा कि लोकतंत्र की बुनियाद वोट है और वोट की सुरक्षा की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है। उनके मुताबिक अगर वोट की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े होते हैं तो उसका असर संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़ता है।

उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा देने की मांग करते हुए कहा कि उन्हें सामने आकर पूरी जानकारी देश के सामने रखनी चाहिए। राहुल गांधी ने उन्हें ‘सरकारी गवाह’ बनने की अपील भी की।

‘एंटी-इनकंबेंसी कहां गायब हो गई?’

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में चुनावों में ‘एंटी-इनकंबेंसी’ के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारत में सत्ता के खिलाफ नाराजगी लोकतांत्रिक राजनीति की एक सामान्य ताकत रही है और अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर सरकारें बदलती रही हैं।

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का उदाहरण देते हुए कहा कि 1971 के युद्ध के बाद उनकी लोकप्रियता काफी ऊंची थी, लेकिन कुछ वर्षों के भीतर राजनीतिक परिस्थितियां बदल गईं और उन्हें चुनावी चुनौती का सामना करना पड़ा।

राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह और बीजेपी के संदर्भ में उन्हें लंबे समय से वैसी एंटी-इनकंबेंसी क्यों दिखाई नहीं देती जैसी दूसरे राजनीतिक दलों और नेताओं के मामले में दिखाई देती रही है।

उन्होंने कहा कि इसी सवाल का जवाब खोजते हुए कांग्रेस लगातार चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और वोटों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे उठा रही है।

राहुल गांधी ने ‘वोट’ को संविधान से जोड़ा

राहुल गांधी ने कहा कि वोट केवल चुनाव जीतने या हारने का माध्यम नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी इकाई है। उनके अनुसार वोट की विश्वसनीयता पर सवाल उठने का मतलब संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठना है।

उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी होने पर नागरिकों के मतदान के अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है।

हालांकि, राहुल गांधी द्वारा लगाए गए चुनावी अनियमितताओं के आरोपों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच तीखा मतभेद है और इन आरोपों को स्थापित तथ्य के तौर पर नहीं, बल्कि कांग्रेस के दावे के रूप में देखा जाना चाहिए।

क्या कहती है ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट?

द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर चुनाव आयोग के कुछ कदमों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को लेकर यह सवाल उठाया कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया, मतदाता सूची से नाम हटाने और मतदाता डेटाबेस को केंद्रीय स्तर पर रखने जैसे मुद्दे शामिल थे।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ कदमों को ‘अनधिकृत’ और ‘गैरकानूनी’ बताया था। विपक्षी दलों ने इस रिपोर्ट को चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल के रूप में उठाया है।

हालांकि, द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियां अपने आप में चुनावों में ‘वोट चोरी’ साबित नहीं करतीं। ये चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और मतदाता सूची से संबंधित अधिकारियों के बीच मतभेदों को सामने लाती हैं।

बीजेपी ने राहुल गांधी पर किया पलटवार

राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के जवाब में बीजेपी की ओर से सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी सामने आए। उन्होंने राहुल गांधी के चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोपों और एंटी-इनकंबेंसी संबंधी तर्कों को चुनौती दी।

त्रिवेदी ने सवाल उठाया कि राहुल गांधी जिन मीडिया रिपोर्टों के आधार पर आरोप लगा रहे हैं, उनके पीछे ठोस और सत्यापित प्रमाण क्या हैं। बीजेपी ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया का बचाव करते हुए कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन और उसके राजनीतिक दावों पर भी सवाल उठाए।

बीजेपी की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि चुनावों में पारदर्शिता और चुनावी प्रक्रिया के कारण कांग्रेस को कई राज्यों में चुनावी नुकसान उठाना पड़ा है। इस तरह बीजेपी ने राहुल गांधी के ‘एंटी-इनकंबेंसी गायब होने’ वाले तर्क को राजनीतिक रूप से खारिज किया।

विवाद का केंद्र अब चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बहस अब केवल विपक्ष के चुनावी आरोपों तक सीमित नहीं है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज कराई गई आपत्तियों को भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना दिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, SIR के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने के बाद मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की भूमिका पर बहस और तेज हुई है।

अब मुख्य सवाल यह है कि चुनाव आयोग इन आंतरिक आपत्तियों पर किस तरह स्पष्टीकरण देता है और क्या इन आरोपों तथा आपत्तियों की स्वतंत्र जांच की मांग आगे बढ़ती है।

राहुल गांधी इसे लोकतंत्र और मताधिकार से जुड़ा गंभीर मुद्दा बता रहे हैं, जबकि बीजेपी इसे कांग्रेस के राजनीतिक आरोपों और चुनावी हार को सही ठहराने की कोशिश के रूप में देख रही है। इस विवाद में अंतिम निष्कर्ष के लिए सामने आए दस्तावेजों, चुनाव आयोग के आधिकारिक जवाब और किसी स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।

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