नई दिल्ली: राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिब्बल ने चुनाव आयोग के कामकाज, मतदाता सूची में बदलाव, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई।
सिब्बल का आरोप है कि चुनाव आयोग जिस तरह से कुछ मामलों को संभाल रहा है, उससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर सवाल पैदा हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में केवल चुनाव कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मतदाताओं को यह भरोसा भी होना चाहिए कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संचालित हो रही है।
‘चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल क्यों न उठें?’
सिब्बल ने चुनाव आयोग की संवैधानिक भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों से दूरी बनाए रखते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करना चाहिए। उनके मुताबिक यदि किसी संस्था के फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं, तो उन सवालों का पारदर्शी तरीके से जवाब दिया जाना चाहिए।
उन्होंने चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विभिन्न मामलों का हवाला देते हुए आयोग की जवाबदेही और पारदर्शिता पर जोर दिया।
मतदाता सूची को लेकर सबसे बड़ा सवाल
सिब्बल ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। उनका कहना है कि चुनाव से पहले बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम जुड़ने या हटने की स्थिति में यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसके पीछे क्या प्रक्रिया अपनाई गई और प्रभावित मतदाताओं को अपनी आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर मिला या नहीं।
यह मुद्दा खास तौर पर Special Intensive Revision (SIR) जैसी मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रियाओं के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हो गया है। मतदाता सूची में बदलाव को लेकर राजनीतिक दलों के बीच लगातार बहस चलती रही है।
‘चुनाव सिर्फ मतदान का दिन नहीं है’
सिब्बल के तर्क का केंद्रीय बिंदु यह है कि चुनाव को सिर्फ मतदान और नतीजों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। मतदाता सूची तैयार करने से लेकर उम्मीदवारों के नामांकन, प्रचार, मतदान और परिणाम घोषित करने तक पूरी प्रक्रिया में समान अवसर और पारदर्शिता जरूरी है।
उनके मुताबिक यदि चुनावी प्रक्रिया के किसी भी चरण पर संदेह पैदा होता है तो उसका समाधान संस्थागत तरीके से होना चाहिए।
चुनाव आयोग की नियुक्ति और स्वतंत्रता भी सवालों के घेरे में
सिब्बल लंबे समय से चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते रहे हैं। उनका तर्क है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता को मजबूत करने के लिए नियुक्ति और कामकाज की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी भी राजनीतिक पक्ष के प्रभाव की आशंका कम हो।
चुनावी सुधारों पर अपने पहले के लेखों और सार्वजनिक बयानों में भी सिब्बल ने राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च, मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव आयोग की निष्पक्षता जैसे मुद्दे उठाए हैं।
सिब्बल के आरोप बनाम चुनाव आयोग का पक्ष
हालांकि, सिब्बल द्वारा लगाए गए आरोपों को अंतिम तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। चुनाव आयोग अपने अधिकारों और चुनावी प्रक्रियाओं को संवैधानिक तथा कानूनी प्रावधानों के तहत संचालित करने की बात कहता रहा है।
इसलिए मौजूदा विवाद का मूल सवाल यही है कि क्या चुनाव आयोग की प्रक्रियाएं पर्याप्त रूप से पारदर्शी और जवाबदेह हैं, और क्या मतदाताओं को अपने नाम, मतदान अधिकार तथा चुनावी प्रक्रिया से जुड़े फैसलों के संबंध में पर्याप्त जानकारी और आपत्ति का अवसर मिल रहा है?
लोकतंत्र में भरोसे का सवाल
कपिल सिब्बल की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने एक बार फिर चुनाव आयोग की भूमिका और चुनावी सुधारों की बहस को सामने ला दिया है। विवाद किसी एक राजनीतिक दल या चुनाव तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि देश की चुनावी व्यवस्था में मतदाता का भरोसा, संस्थागत स्वतंत्रता, पारदर्शिता और जवाबदेही किस तरह सुनिश्चित की जाए।
आखिर लोकतंत्र में चुनाव की विश्वसनीयता केवल नतीजे से नहीं, बल्कि उस नतीजे तक पहुंचने वाली पूरी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे से तय होती है।