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गांव-गांव तक पहुंच रहा है बुद्ध का संदेश: वांग्मो डिक्से की पहल से भारत में बौद्ध धम्म के पुनर्जागरण को मिली नई ऊर्जा

by Admin
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बोधगया। भारत भगवान बुद्ध की ज्ञानभूमि है। यही वह पावन धरती है जहाँ सिद्धार्थ गौतम ने बुद्धत्व प्राप्त कर मानवता को करुणा, मैत्री, प्रज्ञा और समता का अमर संदेश दिया। यहीं से निकली धम्म की ज्योति ने एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया को प्रकाशित किया। आज, लगभग ढाई हजार वर्षों बाद, उसी धम्म ज्योति को पुनः जन-जन तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण अभियान लाइट ऑफ बुद्धधर्म फाउंडेशन इंटरनेशनल के माध्यम से चलाया जा रहा है।

फाउंडेशन की संस्थापक और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध धम्म प्रचारक वांग्मो डिक्से के नेतृत्व में देशभर के गाँवों, बस्तियों, विद्यालयों, बुद्ध विहारों, ध्यान केंद्रों और सामुदायिक संस्थाओं तक बुद्ध प्रतिमाएँ पहुँचाई जा रही हैं। दिसंबर 2025 में बोधगया में आयोजित इंटरनेशनल त्रिपिटक चैंटिंग समारोह के दौरान फाउंडेशन के दानदाताओं, सहयोगियों और शुभचिंतकों के समर्थन से 220 बुद्ध प्रतिमाएँ भारत के विभिन्न राज्यों को समर्पित की गईं। यह केवल प्रतिमाओं का वितरण नहीं, बल्कि भारत में बौद्ध धम्म के पुनर्जागरण का एक व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अभियान बनता जा रहा है।

प्रतिमा नहीं, धम्म का जीवंत संदेश

वांग्मो डिक्से का मानना है कि बुद्ध प्रतिमा केवल पूजा या सजावट का विषय नहीं है। वह बुद्ध के धम्म का दृश्य रूप है, जो करुणा, शांति, समता, अहिंसा और जागरूकता का संदेश देती है। जब किसी गाँव, विद्यालय या समुदाय में बुद्ध प्रतिमा स्थापित होती है, तो वह स्थान केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं रह जाता, बल्कि अध्ययन, चिंतन, संवाद और सामाजिक परिवर्तन का केंद्र बन जाता है।

उनका कहना है कि भारत के अनेक क्षेत्रों में नई पीढ़ी बुद्ध के विचारों से परिचित तो है, लेकिन उन्हें अपने जीवन में अपनाने के अवसर सीमित हैं। बुद्ध प्रतिमाओं की स्थापना के माध्यम से लोगों को बुद्ध के जीवन, उनके धम्म और मानवीय मूल्यों से जुड़ने का अवसर प्राप्त हो रहा है।

महाराष्ट्र: आंबेडकरवादी बौद्ध आंदोलन की धरती

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की कर्मभूमि महाराष्ट्र इस अभियान का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। नागपुर, भंडारा, लातूर, सांगली, अकोला, अमरावती, सातारा, शाहापुर और मुंबई सहित अनेक स्थानों पर बुद्ध प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। नागपुर के बुद्ध विहारों, ध्यान केंद्रों और बौद्ध बस्तियों में स्थापित प्रतिमाएँ नई पीढ़ी को आंबेडकरवादी बौद्ध आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत से जोड़ रही हैं।

दीक्षाभूमि से प्रेरित यह कार्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी विस्तार कर रहा है। अनेक स्थानों पर प्रतिमाओं की स्थापना के बाद नियमित बुद्ध वंदना, धम्म अध्ययन और सामुदायिक गतिविधियाँ प्रारंभ हुई हैं।

उत्तर प्रदेश: बुद्ध की विरासत से पुनः जुड़ता समाज

सबसे अधिक बुद्ध प्रतिमाएँ उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में स्थापित की गई हैं। कुशीनगर, कौशांबी, लखनऊ, उन्नाव, हरदोई, इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, जालौन, बलिया और नोएडा जैसे क्षेत्रों में बुद्ध विहारों, पार्कों और सामुदायिक केंद्रों को बुद्ध प्रतिमाएँ भेंट की गई हैं।

यह वही प्रदेश है जहाँ बुद्ध ने अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय व्यतीत किया और कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। आज इन प्रतिमाओं के माध्यम से गांव-गांव में त्रिशरण, पंचशील, ध्यान साधना और धम्म अध्ययन की नई परंपराएँ विकसित हो रही हैं।

बिहार: जहाँ से विश्व को मिला ज्ञान का प्रकाश

बोधगया और गया में स्थापित बुद्ध प्रतिमाएँ इस अभियान को विशेष महत्व प्रदान करती हैं। महाबोधि मंदिर क्षेत्र, बोधगया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी, अंतरराष्ट्रीय विहारों और ध्यान केंद्रों तक यह पहल पहुँची है। जिस भूमि पर बुद्ध को सम्यक सम्बोधि प्राप्त हुई, वहीं आज बुद्ध प्रतिमाओं के माध्यम से धम्म की नई चेतना का विस्तार हो रहा है।

कई विदेशी बौद्ध संस्थाओं और भिक्षु संघों ने भी इस पहल का स्वागत किया है, जिससे यह अभियान अंतरराष्ट्रीय बौद्ध समुदाय और भारतीय समाज के बीच एक सेतु का कार्य कर रहा है।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और दक्षिण भारत में बढ़ता प्रभाव

मध्य प्रदेश के बालाघाट क्षेत्र में बुद्ध विहारों, महिला बौद्ध संगठनों और सामुदायिक केंद्रों में बुद्ध प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। यहाँ महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

राजस्थान के अलवर स्थित पंचशील मेडिटेशन सेंटर, तेलंगाना के बुद्ध विहारों और केरल के मैत्रेय बुद्ध मेडिटेशन सेंटर तक बुद्ध प्रतिमाओं का पहुँचना इस बात का प्रमाण है कि बौद्ध धम्म अब नए क्षेत्रों में भी तेजी से विस्तार कर रहा है।

हिमालय से लेकर बंगाल तक धम्म की यात्रा

पश्चिम बंगाल के कोलकाता और अलीपुरद्वार, हिमाचल प्रदेश के मंडी तथा लद्दाख के महाबोधि जेतवन मठ, ननरी, विपश्यना केंद्रों और अन्य बौद्ध संस्थाओं तक बुद्ध प्रतिमाएँ पहुँचाई गई हैं।

विशेष रूप से लद्दाख में स्थापित प्रतिमाएँ हिमालयी बौद्ध परंपरा और भारत के नवयान बौद्ध आंदोलन के बीच एक सशक्त सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध स्थापित कर रही हैं। यह दर्शाता है कि बुद्ध का संदेश भौगोलिक सीमाओं से परे सम्पूर्ण मानवता को जोड़ने की क्षमता रखता है।

गांव-गांव में बन रहे हैं धम्म केंद्र

इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि बुद्ध प्रतिमाएँ केवल शहरों तक सीमित नहीं हैं। देश के सैकड़ों छोटे गाँवों, बस्तियों और ग्रामीण समुदायों तक बुद्ध प्रतिमाएँ पहुँच रही हैं। जिन स्थानों पर पहले धम्म गतिविधियाँ बहुत कम थीं, वहाँ आज बुद्ध वंदना, धम्म अध्ययन, ध्यान शिविर और सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

स्थानीय समुदाय स्वयं इन प्रतिमाओं की देखभाल कर रहे हैं और उन्हें सामाजिक एकता तथा सांस्कृतिक जागरण के केंद्र के रूप में विकसित कर रहे हैं। इससे बौद्ध धम्म केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान समाज की एक जीवंत शक्ति बनकर उभर रहा है।

वांग्मो डिक्से की दूरदर्शी पहल

वांग्मो डिक्से के नेतृत्व में चल रहा यह अभियान भारत में बौद्ध धम्म के पुनर्जागरण की एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। बुद्ध प्रतिमाओं के माध्यम से करुणा, मैत्री, प्रज्ञा और समता का संदेश उन समुदायों तक पहुँच रहा है जहाँ पहले धम्म की पहुँच सीमित थी।

आज ये 220 बुद्ध प्रतिमाएँ केवल पत्थर, धातु या फाइबर की संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि वे बुद्ध के जीवंत संदेश की वाहक बनकर लाखों लोगों को प्रेरित कर रही हैं। भारत की ज्ञानभूमि पर पुनः प्रज्ज्वलित हो रही यह धम्म ज्योति आने वाले समय में सामाजिक समरसता, शांति और मानवता के मूल्यों को और अधिक सशक्त बनाने का कार्य करेगी।

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