साहिल के परिवार की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की मांग; 10-11 अक्टूबर से परीक्षाएं दोबारा शुरू, नकल के मामलों में पुराने नियम बहाल
मुंबई: IIT बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की मौत के मामले में न्याय की मांग अब भी महत्वपूर्ण सवाल बनी हुई है। एक ओर साहिल के माता-पिता रवींद्र वाकोडे और सोनाली वाकोडे ने अपने बेटे की मौत की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई है, वहीं दूसरी ओर संस्थान ने परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल से जुड़े नियमों में बदलाव किया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि परीक्षा प्रक्रिया में सुधार के साथ साहिल के परिवार की न्याय संबंधी मांगों पर क्या कार्रवाई हुई है।
इंडियन एक्सप्रेस की 9 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, IIT बॉम्बे में 10 और 11 अक्टूबर को परीक्षाएं दोबारा शुरू होने वाली हैं। संस्थान ने परीक्षा में निगरानी सख्त रखने के साथ-साथ अनुचित साधनों के इस्तेमाल के मामलों में जुलाई 2026 के नियमों की जगह अप्रैल 2015 के नियम फिर लागू किए हैं। हालांकि, इन बदलावों से साहिल के परिवार की मांगों का समाधान हुआ है या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
परिवार की मांग: निष्पक्ष जांच हो, जवाबदेही तय की जाए
साहिल की मौत के बाद उनके माता-पिता ने न्याय की मांग को लेकर अनशन किया था। परिवार ने मामले की निष्पक्ष जांच और FIR में नामजद अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई। परिवार का कहना रहा है कि मामले की जांच पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए और जिन लोगों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं, उनकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
इस मामले में परिवार की मांगों और जांच में सामने आने वाले तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगना अपने आप में दोष सिद्ध होना नहीं है। इसलिए मामले की निष्पक्ष जांच और साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई महत्वपूर्ण है।
फिलहाल, 9 अक्टूबर तक उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट पुष्टि नहीं हो सकी है कि साहिल के माता-पिता का अनशन जारी है या समाप्त हो गया है। परिवार की मांगों पर प्रशासन या पुलिस की ओर से किसी नए समझौते अथवा अंतिम निर्णय की भी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
परीक्षा के नियम बदले, लेकिन न्याय की मांग अलग मुद्दा
IIT बॉम्बे ने अकादमिक गड़बड़ी से जुड़े नियमों में बदलाव करते हुए जुलाई 2026 के सख्त प्रावधानों की जगह अप्रैल 2015 के नियम फिर लागू किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मोबाइल फोन परीक्षा हॉल में ले जाने और परीक्षा के दौरान उसका इस्तेमाल करने पर अलग-अलग दंड का प्रावधान है।
जुलाई के नियमों में मोबाइल फोन ले जाने पर फेल करने, दोबारा परीक्षा देने और एक सेमेस्टर के निलंबन जैसी सजा का प्रावधान बताया गया था। 2015 के नियमों के तहत फोन ले जाने पर एक ग्रेड कम करने और परीक्षा में उसका इस्तेमाल करने पर फेल कर दोबारा परीक्षा देने का प्रावधान बताया गया है।
परीक्षाओं के दौरान निगरानी सख्त रखने और छात्रों तथा परीक्षा पर्यवेक्षण में लगे टीचिंग असिस्टेंट को आधा घंटा पहले पहुंचने के निर्देश भी दिए गए हैं।
हालांकि, परीक्षा संबंधी नियमों में बदलाव को साहिल के मामले में न्याय की मांग पूरी होने के बराबर नहीं माना जा सकता। परिवार की मांगें जांच, जवाबदेही और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई से जुड़ी हैं।
छात्र की बात सुनने के लिए नई SOP का प्रस्ताव
संस्थान परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल के आरोपों पर कार्रवाई की प्रक्रिया में बदलाव करने के लिए नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार कर रहा है। प्रस्तावित मसौदे में कार्रवाई से पहले छात्र को अपना पक्ष रखने, विभागाध्यक्ष से बात करने और मेंटर से मार्गदर्शन लेने का अवसर देने पर विचार किया गया है।
परीक्षा पर्यवेक्षकों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने और अनुशासनात्मक मामलों से जुड़ी समितियों में छात्रों की भागीदारी बढ़ाने के प्रस्ताव भी चर्चा में हैं।
ये बदलाव छात्रों के अधिकारों और निष्पक्ष प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन इनके अंतिम स्वरूप और लागू होने की स्थिति की पुष्टि जरूरी है। साथ ही, इन प्रस्तावों को साहिल के मामले की जांच का विकल्प नहीं माना जा सकता।
मानसिक स्वास्थ्य और संस्थागत जवाबदेही पर सवाल
साहिल की मौत के बाद संस्थानों में पढ़ाई के दबाव, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और अनुशासनात्मक कार्रवाई के तरीकों को लेकर सवाल उठे हैं। छात्र कल्याण व्यवस्था में सुधार, छात्रावासों में वेलनेस प्रतिनिधियों की व्यवस्था और खेल तथा मनोरंजन के लिए साझा स्थान बढ़ाने जैसे प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई है।
छात्रों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर व्यवस्था जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही किसी गंभीर घटना की निष्पक्ष जांच और परिवार को उचित जानकारी देना भी महत्वपूर्ण है।
परिवार को न्याय कब मिलेगा?
साहिल के मामले में अब दो सवाल अहम हैं—पहला, परिवार की न्याय संबंधी मांगों पर जांच एजेंसियों और संस्थान ने क्या कार्रवाई की है; दूसरा, छात्रों के कल्याण और परीक्षा संबंधी सुधारों को किस तरह लागू किया जाएगा।
परीक्षा के नियम बदलना संस्थान की एक प्रशासनिक पहल है, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि परिवार की मांगें पूरी हो गई हैं। साहिल के माता-पिता के लिए न्याय का सवाल जांच की पारदर्शिता, साक्ष्यों के आधार पर जवाबदेही और उनकी शिकायतों पर उचित कार्रवाई से जुड़ा है।
फिलहाल, परिवार के अनशन की मौजूदा स्थिति और उनकी मांगों पर किसी नए आधिकारिक निर्णय की पुष्टि का इंतजार है।