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निठारी कांड फिर सुर्खियों में: 18 बच्चों और एक युवती की मौत से खुले राज, आरोपी सुरेंद्र कोली की मौत ने पुराने सवाल किए जिंदा

by Admin
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नोएडा/हरिद्वार: करीब दो दशक पहले नोएडा के निठारी गांव में बच्चों और युवतियों के लगातार लापता होने से शुरू हुई कहानी ने पूरे देश को झकझोर दिया था। दिसंबर 2006 में निठारी की एक कोठी के पीछे नाले से मानव अवशेष मिलने के बाद यह मामला देश के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल हो गया। मामले में घरेलू सहायक सुरेंद्र कोली और कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर आरोपी बनाए गए थे।

अब सितंबर 2026 में यह मामला एक बार फिर चर्चा में है। सुरेंद्र कोली शुक्रवार को हरिद्वार में मृत पाया गया। शुरुआती पुलिस जानकारी के मुताबिक उसकी मौत आत्महत्या की प्रतीत होती है। अंतिम कारण पोस्टमार्टम और जांच के बाद स्पष्ट होगा। पुलिस के अनुसार घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है।

आखिर क्या था निठारी कांड?

निठारी गांव और आसपास के इलाके से वर्ष 2004-05 के दौरान बच्चों के लापता होने की शिकायतें सामने आने लगी थीं। परिजनों का आरोप था कि वे पुलिस के पास शिकायत लेकर गए, लेकिन उनकी शिकायतों पर अपेक्षित गंभीरता से कार्रवाई नहीं हुई।

मामला तब निर्णायक मोड़ पर पहुंचा जब पायल नाम की युवती के लापता होने के बाद उसके पिता ने उसकी तलाश के लिए पुलिस और अदालत का दरवाजा खटखटाया। पायल के लापता होने की जांच आगे बढ़ने पर पुलिस का ध्यान सेक्टर-31 स्थित डी-5 कोठी की ओर गया, जहां मोनिंदर सिंह पंढेर रहते थे और सुरेंद्र कोली घरेलू सहायक के रूप में काम करता था।

29 दिसंबर 2006 को इसी कोठी के पीछे नाले और आसपास के इलाके में मानव अवशेष मिलने के बाद सनसनी फैल गई। आधिकारिक रिकॉर्ड में इस मामले से संबंधित 19 एफआईआर और 18 बच्चों/महिलाओं की हत्याओं का उल्लेख मिलता है।

29 दिसंबर 2006 को सामने आया भयावह सच

निठारी में अवशेष मिलने के बाद पुलिस और बाद में सीबीआई की जांच का दायरा बढ़ा। मामले में सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर को गिरफ्तार किया गया।

कोली के खिलाफ अभियोजन का एक महत्वपूर्ण आधार उसका कथित इकबालिया बयान और उससे जुड़ी बरामदगी थी। लेकिन बाद की न्यायिक कार्यवाही में इन्हीं सबूतों की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता पर गंभीर सवाल उठे।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2023 में निठारी से जुड़े 12 मामलों में कोली को बरी करते हुए उसके कथित इकबालिया बयान और बरामदगी के साक्ष्यों को पर्याप्त विश्वसनीय नहीं माना। हाईकोर्ट ने जांच में गंभीर कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

निठारी से जुड़े मामलों में कोली को अलग-अलग मुकदमों में दोषी ठहराया गया था। एक मामले में उसकी मौत की सजा को 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था। बाद में 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दया याचिका के निस्तारण में हुई देरी को देखते हुए मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।

लेकिन अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 अन्य मामलों में कोली को बरी कर दिया। पंढेर को भी संबंधित मामलों में राहत मिली। सीबीआई और पीड़ित परिवारों ने इन बरी किए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इन अपीलों को खारिज करते हुए कोली और पंढेर की बरी होने की स्थिति बरकरार रखी। उस समय कोली केवल एक मामले में दोषसिद्धि के कारण जेल में था।

नवंबर 2025 में आखिरी मामले में भी बरी हुआ कोली

इसके बाद कोली ने उस अंतिम मामले में सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल की। उसका तर्क था कि जिस तरह के साक्ष्यों—कथित इकबालिया बयान और बरामदगी—के आधार पर उसकी एक मामले में दोषसिद्धि कायम थी, उन्हीं साक्ष्यों को दूसरे मामलों में अदालतें अविश्वसनीय मान चुकी थीं।

11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी क्यूरेटिव पिटीशन स्वीकार कर ली और आखिरी लंबित मामले में भी उसकी दोषसिद्धि रद्द कर दी। कोर्ट ने तत्काल रिहाई का आदेश दिया, बशर्ते किसी अन्य मामले में उसकी जरूरत न हो।

इस फैसले के साथ निठारी से जुड़े सभी आपराधिक मामलों में कोली की दोषसिद्धियां समाप्त हो गईं।

पंढेर भी सभी मामलों में बरी

मोनिंदर सिंह पंढेर भी निठारी से जुड़े मामलों में अंततः बरी हो चुका है। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उसके खिलाफ संबंधित मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट के बरी करने के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलें खारिज कर दी थीं।

इस तरह वह मामला, जिसने कभी देशभर में भय और आक्रोश पैदा किया था, अदालतों में अभियोजन के स्तर पर अलग-अलग चरणों से गुजरते हुए अंततः ऐसी स्थिति में पहुंचा जहां दोनों प्रमुख आरोपी दोषसिद्धि से मुक्त हो गए।

जांच और सबूतों पर उठे सवाल

निठारी कांड का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल हत्याओं के आरोप नहीं, बल्कि जांच की प्रक्रिया और सबूतों की विश्वसनीयता भी रही।

सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 के फैसले में इस बात पर जोर दिया कि गंभीर संदेह भी कानूनी प्रमाण का विकल्प नहीं हो सकता। कोर्ट के सामने यह सवाल भी था कि एक ही तरह के साक्ष्य के आधार पर अलग-अलग मामलों में परस्पर विरोधी न्यायिक परिणाम कैसे कायम रह सकते हैं।

2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी कहा था कि कोली के कथित इकबालिया बयान को स्वैच्छिक और विश्वसनीय मानने में गंभीर कठिनाइयां थीं तथा अभियोजन द्वारा पेश परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

18 बच्चों और एक युवती की कहानी अब भी क्यों परेशान करती है?

निठारी कांड की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि लंबे समय तक कई परिवार अपने बच्चों के लापता होने की खबर लेकर पुलिस और अधिकारियों के चक्कर लगाते रहे। बाद में जब मानव अवशेष बरामद हुए तो उन परिवारों के सामने एक भयावह सच्चाई आई।

सरकारी रिकॉर्ड में निठारी से जुड़े मामलों में 18 बच्चों/महिलाओं की हत्या से संबंधित 19 मामले दर्ज होने का उल्लेख है। कई पीड़ितों की पहचान डीएनए परीक्षण तथा अन्य साक्ष्यों के माध्यम से की गई थी।

इसी वजह से निठारी कांड केवल एक आपराधिक मुकदमे की कहानी नहीं रहा। यह लापता बच्चों की शिकायतों पर पुलिस की शुरुआती प्रतिक्रिया, जांच की गुणवत्ता, फोरेंसिक साक्ष्यों, कथित इकबालिया बयानों और न्यायिक प्रक्रिया पर लंबे समय तक सवाल खड़े करने वाला मामला बन गया।

सुरेंद्र कोली की मौत से फिर उठे पुराने सवाल

सुप्रीम कोर्ट से नवंबर 2025 में बरी होने के बाद कोली जेल से बाहर आया था। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक वह पिछले कुछ महीनों से हरिद्वार में रह रहा था और वहां चाय की दुकान चला रहा था। शुक्रवार को वह मृत पाया गया। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और मौत के अंतिम कारण की पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद होगी।

कोली की मौत के साथ निठारी कांड का नाम फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस पूरे प्रकरण का कानूनी निष्कर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है—अदालतों ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसे निठारी से जुड़े सभी मामलों में अंततः दोषमुक्त कर दिया।

यही वजह है कि निठारी कांड आज भी एक ऐसी गुत्थी के रूप में याद किया जाता है, जिसमें भयावह घटनाओं की जांच तो हुई, कई लोगों पर मुकदमे चले और सजा भी हुई, लेकिन बाद की न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर उठे सवालों के चलते प्रमुख आरोपियों की दोषसिद्धियां कायम नहीं रह सकीं।

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