Home » ‘आरक्षण ही नहीं चाहिए तो वापस ले लेंगे!’ महिला वकीलों के विरोध पर CJI सूर्यकांत की दो टूक, सुप्रीम कोर्ट में गरमाई 30% कोटे की बहस

‘आरक्षण ही नहीं चाहिए तो वापस ले लेंगे!’ महिला वकीलों के विरोध पर CJI सूर्यकांत की दो टूक, सुप्रीम कोर्ट में गरमाई 30% कोटे की बहस

by Admin
0 comments 54 views

सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त और 9 सितंबर को स्टेट बार काउंसिल्स में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े निर्देश जारी किए थे। इन निर्देशों के विरोध में कुछ महिला वकील मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन के लिए पहुंचीं और सोशल मीडिया पर भी अभियान चलाया।

नई दिल्ली: स्टेट बार काउंसिल्स में महिला वकीलों के लिए 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को लेकर मंगलवार, 22 सितंबर को अदालत में तीखी बहस देखने को मिली। कुछ महिला वकीलों द्वारा इस व्यवस्था को ‘असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक’ बताए जाने और इसके खिलाफ प्रदर्शन किए जाने पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर महिला वकील खुद इस प्रतिनिधित्व को नहीं चाहतीं, तो अदालत अपने 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व के आदेश को वापस लेने पर विचार कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त और 9 सितंबर को स्टेट बार काउंसिल्स में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े निर्देश जारी किए थे। इन निर्देशों के विरोध में कुछ महिला वकील मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन के लिए पहुंचीं और सोशल मीडिया पर भी अभियान चलाया।

CJI बोले- ‘जब महिलाएं ही नहीं चाहतीं तो हम क्यों लागू करें?’

सुनवाई शुरू होते ही CJI सूर्यकांत ने विरोध प्रदर्शन का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अदालत को जानकारी मिली है कि कुछ महिला वकील इस आदेश को असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक बता रही हैं।

CJI ने कहा कि अगर महिला वकील स्वयं 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व की व्यवस्था नहीं चाहतीं, तो अदालत इसे लागू क्यों करे। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व संबंधी आदेश वापस लेने पर विचार किया जा सकता है।

हालांकि, यह टिप्पणी फिलहाल अंतिम आदेश नहीं है। अदालत ने अभी 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को रद्द नहीं किया है।

महिला वकीलों की आपत्ति- ‘BCI की स्वायत्तता प्रभावित हो रही है’

विरोध कर रही महिला वकीलों की मुख्य आपत्ति केवल आरक्षण की अवधारणा को लेकर नहीं, बल्कि इसके लिए अपनाई गई न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भी है।

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने एक पत्र का उल्लेख किया और कहा कि इसमें कुछ महिला वकीलों ने Bar Council of India (BCI) की स्वायत्तता को लेकर चिंता जताई है।

उनकी आपत्ति यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश कहीं BCI और स्टेट बार काउंसिल्स की वैधानिक शक्तियों को प्रभावित तो नहीं कर रहे।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर महिला वकीलों का प्रदर्शन

30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व संबंधी निर्देश के विरोध में मंगलवार को बड़ी संख्या में महिला वकील सुप्रीम कोर्ट के बाहर जुटीं। विरोध के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर अभियान चलाया गया।

विरोध करने वाली वकीलों का तर्क है कि प्रतिनिधित्व बढ़ाने का उद्देश्य अलग विषय है, लेकिन बार काउंसिल्स की संरचना और अधिकारों से संबंधित निर्णय लेने की प्रक्रिया में संबंधित वैधानिक संस्थाओं की भूमिका और स्वायत्तता का सम्मान होना चाहिए।

‘यह तो अवमानना है, मीलॉर्ड!’

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने विरोध प्रदर्शन से जुड़े एक फ्लायर का हवाला देते हुए कहा कि उसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ‘असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक’ बताया गया है और इसे अदालत की अवमानना माना जा सकता है।

इस पर पीठ के दूसरे सदस्य जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने अलग दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि लोग अदालत के फैसले की आलोचना कर सकते हैं और विरोध दर्ज कराने के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्होंने इस संदर्भ में ब्रिटिश न्यायाधीश लॉर्ड डेनिंग का भी उल्लेख किया।

इस दौरान अदालत के फैसलों की आलोचना और अवमानना के बीच की सीमा को लेकर भी चर्चा हुई।

BCI के गठन का मामला भी जुड़ा

शोभा गुप्ता ने अदालत को बताया कि संबंधित आवेदन योगमाया एम.जी. बनाम भारत संघ मामले में दाखिल किया गया है। उनके मुताबिक, यह आवेदन स्टेट बार काउंसिल्स में 30 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया से जुड़ी कार्यवाही की अगली कड़ी है।

उन्होंने कहा कि BCI के गठन से जुड़े एक अन्य मामले की सुनवाई भी अगले दिन होनी है और दोनों मामलों को साथ लेकर चलना उपयोगी होगा।

गुप्ता ने रोटेशन के जरिए दो वर्ष की प्रक्रिया से जुड़ा एक प्रस्ताव भी अदालत के सामने रखने की बात कही।

CJI ने मामले को लिस्ट करने का दिया निर्देश

दलीलें सुनने के बाद CJI सूर्यकांत ने संबंधित आवेदन को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।

अब इस पूरे विवाद में तीन बड़े सवाल सामने हैं—

  • क्या स्टेट बार काउंसिल्स में महिलाओं के लिए 30% प्रतिनिधित्व की व्यवस्था जारी रहेगी?
  • क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्देश BCI और स्टेट बार काउंसिल्स की स्वायत्तता को प्रभावित करते हैं?
  • अदालत के आदेश की तीखी सार्वजनिक आलोचना और अवमानना के बीच कानूनी सीमा क्या है?

फिलहाल 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व का आदेश वापस नहीं लिया गया है। CJI की टिप्पणी सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी है, जबकि आगे की कार्यवाही में अदालत इस मुद्दे पर क्या निर्णय लेती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

You may also like

Leave a Comment