केंद्र सरकार की ओर से संसद में परिसीमन विधेयक 2026 पेश किया गया है। अगर यह बिल पास हो जाता है तो लोकसभा चुनाव 2029 में सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 हो सकती है।विपक्ष ने सरकार द्वारा लाये इस बिल पर कुछ प्रश्न उठाये हैं , विपक्ष का कहाँ अहइ कि दस साल पहले की नोटबंदी की तरह अचानक लिया जा रहा परिसीमन का फ़ैसला भारत के बड़े हिस्सों को राजनीतिक रूप से कमज़ोर कर देगा, साथ ही यह देश के लोकतंत्र की प्रकृति पर दूरगामी असर डाल सकता है. ये वही क्षेत्र हैं, जो अर्थव्यवस्था के केंद्र, रोज़गार देने वाले और सामाजिक प्रगति के प्रमुख उदाहरण रहे हैं.
नई दिल्ली। केंद्र सरकार की ओर से आज संसद में तीन बिलों को पेश किया गया। इसमें से दो बिल देश के लिए एतिहासिक होने वाले हैं। एक बिल का उद्देश्य लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करना और दूसरे बिल का उद्देश्य राज्यों की विधानसभा और निचले सदन लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाकर 33 फीसदी आरक्षण देना है।
कौन से हैं तीन विधेयक
केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026
परिसीमन विधेयक 2026 (Delimitation Bill 2026)
भारत में अब तक 4 बार हो चुका डीलिमिटेशन
अगर डीलिमिटेशन की बात की जाये तो आजादी के बाद से अब तक भारत में 4 बार Delimitation हो चुका है। परिसीमन लोकसभा और राज्य विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनर्निर्धारित करने की प्रक्रिया है ताकि जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
वर्ष 1952: परिसीमन आयोग अधिनियम 1952 के तहत स्थापित।
वर्ष 1963: 1962 अधिनियम के तहत डीलिमिटेशन किया गया।
वर्ष 1973: 1972 अधिनियम के तहत प्रक्रिया को पूरा किया गया।
वर्ष 2002: 2002 अधिनियम के तहत नए परिसीमन प्रक्रिया को 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया, जिसमें सीमाओं को समायोजित किया गया लेकिन सीटों की कुल संख्या में परिवर्तन नहीं किया गया।
परिसीमन विधेयक 2026
केंद्र सरकार की ओर से संसद के विशेष सत्र में देश में अहम बदलाव लाने के लिए विधेयक पेश किये गए हैं। यह विधेयक महिला आरक्षण को 2029 के लोकसभा चुनाव से प्रभावी रूप से लागू करने और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित हैं। इनमें संविधान विधेयक (131st Amendment Bill) 2026 परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 शामिल हैं। संविधान जा 131वां संशोधन विधेयक महत्वपूर्ण विधायी प्रस्ताव है।
इन तीन विधेयकों का विरोध करने वाले महिला आरक्षण के खिलाफ हैं, यह सही नहीं है.
महिला आरक्षण लागू करने के लिए संविधान संशोधन 2023 में सर्वसम्मति से पारित हुआ था. मौजूदा विधेयक अचानक लाए गए हैं.लोगो में भ्रम है कि अगर ये विधेयक गिरते हैं, तो महिला आरक्षण भी खत्म हो जाएगा मगर ऐसा नहीं है. अगर ये विधेयक वापस ले लिए जाते हैं या पास नहीं होते, तब भी महिला आरक्षण पर कोई असर नहीं पड़ेगा. महिला आरक्षण पहले से कानून है, जो 2026 की जनगणना के आंकड़े आने के बाद लागू होगा. वैसे, जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.
आबादी के आधार पर परिसीमन राज्य को नुकसान पहुंचाता है : जानकार
परिसीमन (सिर्फ आबादी के आधार पर) किसी राज्य को नुकसान नहीं पहुंचाता यह सरकार का दवा है जो की सरासर गलत है ऐसा जानकारों का मानना है. आबादी पर आधारित परिसीमन नुकसान पहुंचाता है. अगर 2011 की जनगणना को आधार बनाकर नए निर्वाचन क्षेत्र तय किए जाते हैं, तो तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के लगभग सभी राज्यों को नुकसान होगा. वहीं, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, उत्तराखंड और दिल्ली जैसे हिंदी भाषी राज्यों को लाभ मिलेगा. इसका मतलब है कि भले ही उनकी सीटों की संख्या नाममात्र बढ़ जाए, लेकिन लोकसभा में उनकी आवाज़ का अनुपात कम हो जाएगा.
अगर ऐसा होता है तो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और दिल्ली के पास फिलहाल 543 में से 207 सीटें हैं. इनकी संख्या बढ़कर 336 हो सकती है, यानी लगभग 77% की वृद्धि. इसके साथ ही इनकी हिस्सेदारी 38.1% से बढ़कर 43.1% हो जाएगी. वहीं दक्षिण भारत के राज्य- तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और पुडुचेरी के पास वर्तमान में 132 सीटें हैं, जो बढ़कर केवल 176 होंगी, यानी 33% की वृद्धि.
वही ध्यान देने की बात यह भी है कि ऐसा होने से पूर्वी राज्यों की हिस्सेदारी 14.4% से घटकर 13.7% रह जाएगी, जबकि पूर्वोत्तर की हिस्सेदारी 4.4% से घटकर 3.8% हो जाएगी. पश्चिमी और गैर-हिंदी भाषी उत्तरी राज्यों की स्थिति लगभग पहले जैसी ही बनी रहेगी, ऐसा विश्लेषकों का अनुमान है.
सभी राज्यों की सीटें 50% बढ़ेंगी, यह भ्रामक है.
यह बात विधेयकों में कहीं नहीं लिखी है. केवल ‘सूत्रों’ के हवाले से कही जा रही है. ऊपर से यह सभी राज्यों के लिए 50% बढ़ोतरी जैसा बराबरी का कदम लगता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है. भले ही हर राज्य की सीटें 50% बढ़ा दी जाएं, कुल जोड़ करने पर इसका झुकाव दक्षिणी राज्यों के खिलाफ ही रहेगा.
अब तक परिसीमन को जनगणना से जोड़कर ही किया जाता रहा है और इसके लिए एक परिसीमन आयोग तय सार्वजनिक आंकड़ों के आधार पर काम करता है. इसी प्रक्रिया ने लोगों का भरोसा बनाया है. यही संवैधानिक व्यवस्था भी है.
संविधान में ‘जनसंख्या’ की परिभाषा के तहत सीटों के आवंटन के लिए 1971 की जनगणना और सीमाओं के निर्धारण के लिए 2001 की जनगणना को आधार माना गया था. अब यह कहा जा रहा है कि जनसंख्या का आधार वह जनगणना होगी, जिसे संसद कानून बनाकर तय करेगी. इसका मतलब यह हुआ कि किस जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाए, यह संसद तय करेगी. इससे यह पूरी प्रक्रिया कार्यपालिका या बहुमत की इच्छा पर निर्भर हो सकती है और इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया पर से व्यापक जनविश्वास और स्वीकृति कम हो सकती है.
राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र का एक अहम वादा
भारत एक संघीय ढांचे वाला देश है, जहां राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र का एक अहम वादा है. सिर्फ हर क्षेत्र की जनसंख्या बराबर करने के आधार पर सीटें तय करना उन राज्यों को फायदा देगा जो अपनी जनसंख्या को स्थिर नहीं कर पाए हैं. इससे कुछ खास क्षेत्रों (जो संयोग से कम विकसित हैं, जहां सामाजिक-आर्थिक प्रगति सीमित रही है और जहां भाजपा को अधिक समर्थन मिलता है) को ज्यादा सीटें मिलेंगी. इससे उनके पास लंबे समय तक यह तय करने की ताकत आ सकती है कि देश में सरकार किसकी बनेगी.
भारत में इस तरह के फैसले लेने की एक स्थापित प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य संघीय संतुलन को बनाए रखना और उन राज्यों को नुकसान न पहुंचाना है जिन्होंने जनसंख्या को नियंत्रित करने में सफलता पाई है. उदाहरण के तौर पर, वित्त आयोग राज्यों को करों का बंटवारा तय करते समय जनसंख्या को एक कारक मानता है, लेकिन साथ ही ऐसे प्रावधान भी रखे जाते हैं जो जनसंख्या नियंत्रण और आर्थिक प्रगति को प्रोत्साहित करते हैं.
अगर लोकसभा की सीटें बढ़कर 850 हो जाती हैं, तो यह राज्यसभा की तुलना में लगभग 3.3 गुना बड़ी हो जाएगी, जबकि अभी यह अनुपात 2.2 गुना है. राज्यसभा, जो राज्यों की परिषद (काउंसिल ऑफ स्टेट्स) भी है, इससे काफी कमजोर हो जाएगी. यह संघीय संतुलन के लिए दोहरी चोट होगी. राज्यसभा को इसीलिए बनाया गया था ताकि विविध और बड़े देश में विचार-विमर्श की एक अतिरिक्त परत और संतुलन बना रहे. संयुक्त सत्र की स्थिति में भी लोकसभा में बहुमत रखने वाली पार्टी अपने विधेयकों को आसानी से पारित करा सकेगी.इसके अलावा, मंत्रिपरिषद का आकार भी बढ़ेगा. 2003 के संवैधानिक संशोधन के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा की कुल संख्या का 15% हो सकती है. ऐसे में मंत्रियों की संख्या 81 से बढ़कर 122 तक जा सकती है.
महिलाओं को मिलने वाले 33% आरक्षण के वास्तविक प्रभाव को कम करने की कोशिश
महिलाओं को मिलने वाले 33% आरक्षण के वास्तविक प्रभाव को कम करने की कोशिश सरकार कर रही है. 543 सीटों वाली लोकसभा में महिलाओं को एक-तिहाई सीटें देने का मतलब होता कि पार्टियों को प्रभावशाली पुरुष नेताओं से सत्ता का हिस्सा महिलाओं को देना पड़ता. लेकिन सीटों की संख्या बढ़ाकर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि बाहुबली नेता, जिनके पास अपार संपत्ति और गंभीर आपराधिक आरोप हैं, न सिर्फ अपनी जगह बनाए रखें बल्कि उनके जैसे और लोग भी सदन में आ सकें. यह महिलाओं को वास्तविक हिस्सेदारी देने जैसा नहीं है, बल्कि बड़ी संख्या में महिलाओं के प्रवेश से असहज शक्तिशाली पुरुषों को संतुलित करने की कोशिश जैसा है, कुछ वैसा ही जैसे जाति हिंदुओं द्वारा दलितों को मंदिरों में प्रवेश देने के बाद भी नियंत्रण बनाए रखने की कोशिशें.’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर ‘जनसंख्या विस्फोट’ को चिंता का विषय बताया था और कहा था कि इसे नियंत्रित करने के लिए योजनाओं की जरूरत है. इसके अगले साल, 2020 में उन्होंने कहा था कि ‘जनसंख्या नियंत्रण देशभक्ति का एक रूप है’ और छोटे परिवारों की सराहना की थी. 2024 के चुनावी भाषणों में, बांसवाड़ा में भी उन्होंने यह कहा था (हालांकि यह दावा गलत बताया गया) कि पिछली सरकार ज्यादा संसाधन ‘ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों’ को देना चाहती थी. हो सकता है कि ‘जनसंख्या विस्फोट’ के नारे सिर्फ कुछ खास समुदायों के लिए ही थे. मौजूदा प्रस्ताव को देखें तो स्पष्ट है कि इससे उन्हीं राज्यों को ज्यादा फायदा मिल रहा है जहां जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है.