Home » SC-ST आरक्षण पर चिराग पासवान का बड़ा बयान, ‘क्रीमी लेयर’ के समर्थकों से बोले- पहले खुद लाभ छोड़ें

SC-ST आरक्षण पर चिराग पासवान का बड़ा बयान, ‘क्रीमी लेयर’ के समर्थकों से बोले- पहले खुद लाभ छोड़ें

by Admin
0 comments 59 views

पासवान का कहना है कि यदि कोई नेता SC आरक्षण में क्रीमी लेयर या उप-कोटा लागू करने की वकालत करता है, तो उसे पहले खुद आरक्षण से मिलने वाले लाभ को छोड़ने की मिसाल पेश करनी चाहिए।उन्होंने विशेष रूप से कहा कि यदि मांझी SC आरक्षण में क्रीमी लेयर के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं तो उन्हें पहले केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए और संतोष सुमन को भी अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए।

पटना: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ और उप-वर्गीकरण (Sub-classification) को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने इस मुद्दे पर अपना रुख एक बार फिर स्पष्ट करते हुए कहा है कि SC/ST आरक्षण को आर्थिक आधार से जोड़ना इसके मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।

चिराग पासवान ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि संविधान में SC/ST के लिए आरक्षण केवल अवसर देने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव, छुआछूत और असमानता के खिलाफ सामाजिक न्याय का सुरक्षा कवच है। उनका कहना है कि जब तक समाज में भेदभाव और असमानता मौजूद है, तब तक वंचित और शोषित वर्गों के अधिकारों की रक्षा की लड़ाई जारी रहनी चाहिए।

‘क्रीमी लेयर’ पर चिराग पासवान का सीधा विरोध

चिराग पासवान ने अपने बयान में SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग पर सवाल उठाया। उनका तर्क है कि SC/ST आरक्षण का आधार केवल आर्थिक कमजोरी नहीं बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और छुआछूत है।

उनके मुताबिक, किसी व्यक्ति या परिवार की आर्थिक स्थिति बदल जाने से सामाजिक भेदभाव अपने आप खत्म नहीं हो जाता। इसलिए SC/ST आरक्षण को केवल आर्थिक मानकों से देखने से उस सामाजिक वास्तविकता की अनदेखी हो सकती है जिसके कारण संविधान में इन वर्गों के लिए विशेष प्रावधान किए गए।

पासवान ने कहा कि जो लोग SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर की वकालत कर रहे हैं, उन्हें पहले स्वयं आरक्षण का लाभ छोड़कर नैतिक उदाहरण पेश करना चाहिए। यही बात उनके ताजा सोशल मीडिया पोस्ट का सबसे प्रमुख संदेश है।

मांझी और संतोष सुमन से क्यों भिड़े चिराग?

चिराग पासवान का यह बयान ऐसे समय आया है जब NDA के भीतर ही आरक्षण को लेकर दो सहयोगी दलों के बीच खुला मतभेद सामने आया है।

पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) SC/ST आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा और इसके भीतर उप-कोटा यानी ‘कोटे में कोटा’ की मांग कर रही है।

मांझी के बेटे और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन का तर्क है कि आरक्षण का लाभ समाज के उन समुदायों तक भी पहुंचना चाहिए जो अभी तक इससे पर्याप्त रूप से लाभान्वित नहीं हो पाए हैं।

HAM का कहना है कि SC समुदाय के भीतर भी सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़े समूह हैं, जिनकी सरकारी नौकरियों और अन्य अवसरों में पर्याप्त भागीदारी नहीं है। इसी असमानता को दूर करने के लिए उप-वर्गीकरण की मांग की जा रही है।

‘पहले इस्तीफा दें’—चिराग का मांझी पर हमला

विवाद उस समय और तीखा हो गया जब चिराग पासवान ने जीतन राम मांझी और संतोष सुमन के इस्तीफे की मांग कर दी।

पासवान का कहना है कि यदि कोई नेता SC आरक्षण में क्रीमी लेयर या उप-कोटा लागू करने की वकालत करता है, तो उसे पहले खुद आरक्षण से मिलने वाले लाभ को छोड़ने की मिसाल पेश करनी चाहिए।

उन्होंने विशेष रूप से कहा कि यदि मांझी SC आरक्षण में क्रीमी लेयर के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं तो उन्हें पहले केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए और संतोष सुमन को भी अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए।

चिराग बोले—आरक्षण का आधार आर्थिक नहीं, सामाजिक भेदभाव

चिराग पासवान ने आरक्षण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर जोर देते हुए कहा कि SC समुदाय को संविधान में इसलिए विशेष संरक्षण मिला क्योंकि इस वर्ग ने लंबे समय तक छुआछूत और सामाजिक बहिष्कार का सामना किया।

उनके मुताबिक, आज भी कई क्षेत्रों में सामाजिक भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं। इसलिए केवल आर्थिक स्थिति को आधार बनाकर आरक्षण के स्वरूप में बदलाव करना उचित नहीं होगा।

चिराग का कहना है कि SC समुदाय के अलग-अलग समूहों को आपस में बांटने से सामाजिक न्याय की व्यापक लड़ाई कमजोर हो सकती है। उनके अनुसार, आरक्षण का उद्देश्य सिर्फ नौकरी या शिक्षा में अवसर देना नहीं, बल्कि उन समुदायों को प्रतिनिधित्व और सम्मान दिलाना भी है जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक व्यवस्था में पीछे रखा गया।

मांझी खेमे का तर्क—सबसे कमजोर तक पहुंचे आरक्षण

दूसरी तरफ जीतन राम मांझी और उनकी पार्टी का तर्क बिल्कुल अलग है। HAM का कहना है कि वह आरक्षण खत्म करने की मांग नहीं कर रही, बल्कि यह चाहती है कि आरक्षण का लाभ सबसे ज्यादा वंचित और पिछड़े SC समुदायों तक पहुंचे।

संतोष कुमार सुमन ने तर्क दिया है कि अगर पिछड़े वर्गों के भीतर अत्यंत पिछड़े समूहों के लिए अलग व्यवस्था की जा सकती है और सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए अलग प्रावधान हो सकता है, तो SC वर्ग के भीतर सबसे ज्यादा वंचित समुदायों की पहचान करके उनके लिए अलग व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?

मांझी का राजनीतिक आधार बिहार के मुसहर समुदाय से भी जुड़ा है, जिसे राज्य के अत्यंत वंचित दलित समूहों में गिना जाता है। HAM का आरोप है कि SC आरक्षण का लाभ कुछ अपेक्षाकृत प्रभावशाली दलित समुदायों तक ज्यादा पहुंचा है, जबकि कई बेहद गरीब समुदाय अभी भी प्रतिनिधित्व में पीछे हैं।

विवाद की जड़ में 2024 का सुप्रीम कोर्ट फैसला

SC/ST आरक्षण में उप-वर्गीकरण को लेकर मौजूदा बहस की एक बड़ी पृष्ठभूमि 2024 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में राज्यों को SC और ST के भीतर उप-वर्गीकरण करने की अनुमति दी थी, ताकि आरक्षण का लाभ उन समूहों तक भी पहुंच सके जिन्हें अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिला है।

इसी फैसले का हवाला देते हुए उप-वर्गीकरण के समर्थक इसे सामाजिक न्याय के भीतर अधिक समान वितरण की दिशा में कदम बताते हैं। दूसरी ओर, चिराग पासवान जैसे नेता आशंका जता रहे हैं कि SC समुदाय को अलग-अलग उप-समूहों में बांटने से व्यापक सामाजिक एकता और आरक्षण के मूल उद्देश्य पर असर पड़ सकता है।

‘क्रीमी लेयर’ और ‘सब-क्लासिफिकेशन’ एक ही चीज नहीं

इस बहस में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। Sub-classification का मतलब SC/ST आरक्षण के भीतर अलग-अलग समुदायों के लिए हिस्सेदारी तय करना है, जबकि Creamy Layer का सवाल यह है कि किसी आरक्षित वर्ग के अपेक्षाकृत सामाजिक/आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके लोगों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाए या नहीं।

दोनों मुद्दे राजनीतिक बहस में एक साथ उठ रहे हैं, लेकिन इनके कानूनी और नीतिगत पहलू अलग हैं।

2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति को लेकर बहस हुई थी। वहीं क्रीमी लेयर के मुद्दे पर केंद्र सरकार का रुख यह रहा है कि SC/ST आरक्षण को OBC की तरह क्रीमी लेयर के सिद्धांत से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

NDA में बढ़ी अंदरूनी खींचतान

इस पूरे विवाद का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दोनों ही NDA के सहयोगी हैं और दोनों केंद्र सरकार में मंत्री हैं।

आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर दोनों नेताओं के आमने-सामने आने से NDA के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। 29 अगस्त को दोनों पक्षों के बीच बयानबाजी इतनी तीखी हो गई कि एक-दूसरे के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गई।

चिराग पासवान जहां इसे SC समुदाय की एकता और सामाजिक न्याय से जोड़ रहे हैं, वहीं मांझी खेमे का कहना है कि आरक्षण का लाभ उन समुदायों तक भी पहुंचना चाहिए जो अब तक अपेक्षाकृत पीछे रह गए हैं।

संसद में गंभीर चर्चा की मांग

चिराग पासवान ने इस विषय पर राजनीतिक बयानबाजी के बजाय संसद में गंभीर चर्चा की जरूरत पर भी जोर दिया है। उनका कहना है कि आरक्षण जैसा संवेदनशील मुद्दा व्यापक चर्चा और सामाजिक प्रभावों को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए।

उनका तर्क है कि बिना व्यापक सामाजिक चर्चा के किसी भी तरह का बदलाव दलित और आदिवासी समुदायों के भीतर नई असमानता या विभाजन पैदा कर सकता है।

आने वाले दिनों में और गरमा सकता है मुद्दा

SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर और उप-वर्गीकरण का मुद्दा अब केवल कानूनी या सामाजिक बहस तक सीमित नहीं रह गया है। यह बिहार की राजनीति के साथ-साथ NDA के भीतर भी महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।

एक तरफ चिराग पासवान इसे सामाजिक न्याय, संविधान और दलित एकता से जोड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ मांझी और उनका दल आरक्षण के लाभ के अधिक समान वितरण की मांग कर रहे हैं।

ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार इस विवाद पर क्या रुख अपनाती है और क्या NDA के दोनों सहयोगी दल किसी साझा समाधान पर पहुंच पाते हैं।

चिराग पासवान के बयान का सार

चिराग पासवान का स्पष्ट संदेश है कि SC/ST आरक्षण को केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, जब तक सामाजिक भेदभाव, असमानता और छुआछूत पूरी तरह खत्म नहीं होती, तब तक आरक्षण वंचित वर्गों के अधिकार और प्रतिनिधित्व का महत्वपूर्ण माध्यम बना रहेगा।

वहीं, विरोधी पक्ष का सवाल है कि यदि SC समुदाय के भीतर भी कुछ समूह लगातार पीछे रह गए हैं, तो आरक्षण का लाभ उन तक सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था में बदलाव क्यों न किया जाए?

यही सवाल अब SC/ST आरक्षण की बहस के केंद्र में है—आरक्षण की एकता कायम रखी जाए या उसके भीतर ‘कोटे में कोटा’ के जरिए सबसे पिछड़े समूहों के लिए अलग हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए।

You may also like

Leave a Comment