मध्य प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आदिवासी समुदाय की विशिष्ट पहचान को बचाने के लिए एक बड़ा आह्वान किया है। उन्होंने जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग ‘धर्म कोड’ की मांग की है और आदिवासी समाज से एकजुट होकर अपनी सांस्कृतिक एवं धार्मिक पहचान सुरक्षित करने की अपील की है।
ह बयान हाल ही में अनूपपुर (या अमरकंटक क्षेत्र में आयोजित एक जनजातीय/होली संबंधित कार्यक्रम) में दिए गए एक जनसंपर्क कार्यक्रम में आया, जहां सिंघार ने आदिवासी समाज को संबोधित करते हुए कहा कि देश में चल रही जनगणना प्रक्रिया में फॉर्म के सातवें कॉलम (धर्म वाले कॉलम) में आदिवासियों को अपनी पहचान स्पष्ट रूप से दर्ज करानी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि आदिवासी लोग धर्म के स्थान पर ‘आदिवासी’ या ‘प्रकृति धर्म आदिवासी’ जैसा उल्लेख करें, ताकि उनकी अलग पहचान बनी रहे।
उमंग सिंघार ने चेतावनी दी कि यदि आदिवासियों को लगातार हिंदू, ईसाई या अन्य किसी धर्म की श्रेणी में गिना जाता रहा, तो उनकी मूल पहचान, परंपराएं, संस्कृति और अधिकार हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएंगे। उन्होंने कहा कि इससे आरक्षण, वन अधिकार, जमीन के पट्टे, सरकारी योजनाओं का लाभ और अन्य संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
उन्होंने आदिवासी समुदाय से एकजुट होने का आह्वान करते हुए कहा, “समय आ गया है कि हम सभी आदिवासी एकजुट हों। यदि अभी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों के आदिवासी समाज ने अपने अलग धर्म कोड की मांग के लिए अधिक से अधिक आवेदन नहीं भेजे, तो हमारी पहचान को किसी अन्य धर्म की श्रेणी में दर्ज कर दिया जाएगा।”
सिंघार ने एक ठोस लक्ष्य भी रखा और अपील की कि मध्य प्रदेश से अकेले कम से कम 50 लाख आवेदन राष्ट्रपति के नाम भेजे जाएं। उनका कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में आवेदन पहुंचने से दिल्ली में बैठी सत्ता को आदिवासियों की ताकत और उनकी मांग का अहसास होगा, जिससे अलग ‘धर्म कोड’ (जैसे सरना कोड या प्रकृति/आदिवासी धर्म) को मान्यता मिलने की संभावना बढ़ेगी।
यह मांग आदिवासी समुदाय में लंबे समय से चली आ रही ‘सरना कोड’ या अलग आदिवासी धार्मिक पहचान की मांग से जुड़ी हुई है, जहां कई आदिवासी समूह अपनी प्रकृति-पूजा आधारित परंपराओं को अलग धर्म के रूप में मान्यता चाहते हैं।

इस बयान से मध्य प्रदेश की राजनीति में भारी हलचल मच गई है। भाजपा ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि यह संविधान के खिलाफ है और समाज में विभाजन पैदा करने वाली बात है। कुछ भाजपा नेताओं ने इसे ‘षड्यंत्र’ करार दिया और कांग्रेस पर आदिवासी वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया है। वहीं, कांग्रेस का पक्ष है कि यह आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का मुद्दा है।
यह घटना आदिवासी बहुल क्षेत्रों में राजनीतिक बहस को और तेज करने वाली है, खासकर जहां आदिवासी आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 21-22% है। उमंग सिंघार का यह आह्वान आदिवासी समाज को संगठित करने और उनकी अलग पहचान की लड़ाई को नई गति देने का प्रयास माना जा रहा है।